हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंही दिनों में यदि गौड़ाधिप को न मार डालूँ तो स्वयं जल कर भस्म हो जाऊँगा।' हर्ष- चरित में राज्यवर्धन का व्यक्तित्व सर्वथा अकलुषित और स्नेह तथा पराक्रममय देखने में आता है। हर्षवर्धन—कहा जा चुका है कि वर्धनवंश के आदि संस्थापक राजा पुष्पभूति को लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर वरदान दिया था—'तुम्हारे वंश में हरिश्चन्द्र के समान समस्त द्वीपों का भोक्ता हर्ष नाम का चक्रवर्ती जन्म लेगा।' इसलिए यह स्वाभाविक था कि हर्ष के समस्त गुण जन्मजात थे। जैसा कि बाण ने हर्ष के यशोवती के गर्भ में आते ही रानी का वर्णन करते हुए लिखा है—उसके मन में यह दोहद इच्छा हुई कि चार समुद्रों का जल एक में मिलाकर स्नान करूँ और समुद्र के वेला-कुंजों में भ्रमण करूँ। नंगी तलवार के पानी में मुँह देखने की, वीणा अलग हटा कर धनुष की टंकार सुनने की और पंजर- बद्ध केसरियों के देखने की इच्छा हुई। इस प्रकार हर्ष जन्म से ही एक महापुरुष था। किसी ब्राह्मण ने ज्योतिष के अनुसार हर्ष के जन्म के समय भविष्यवाणी भी कर दी थी। हर्ष में शैशव काल से ही अपूर्व रणोत्साह और साहस का आभास मिलने लगा था। जब पिता ने अपने सुयोग्य पुत्र राज्यवर्धन को हूणों से भिड़न्त के लिए भेजा तो १४-१५ वर्ष की अवस्था वाले हर्ष भी बड़े भाई के साथ चलने के उत्साह का संवरण न कर सके। कुछ पड़ावों के बाद ही हर्ष का मन आखेट में लग गया तो वे आगे न जाकर हिमालय की तराइयों में शिकार करने लगे। यहीं से हर्ष के जीवन का आकस्मिक परिवर्तन आरम्भ हो जाता है। उन्हें पिता जी की बीमारी की खबर मिलती है। शीघ्र ही दौड़ पड़े, मार्ग में कुछ भी नहीं खाया-पिया। इससे उनका अनन्य पितृ-प्रेम व्यक्त होता है। राजद्वार पर पहुँचते ही उन्होंने उद्विग्न होकर सुषेण नामक वैद्यकुमार से पिता जी की हालत पूछी। सुषेण ने कोई आशाजनक बात न कही तो घबड़ाए हुए पिता जी के पास पहुँचे। उन्होंने उन्हें रुग्णावस्था में देखा। प्रभाकरवर्धन ने हर्ष को देख कर उठने की चेष्टा की। उन्होंने बड़ी कठिनता से यह कहा—'हे वत्स, दुबले जान पड़ते हो।' तब भंडि ने कहा कि हर्ष को भोजन किए हुए तीन दिन हो चुके हैं। यह सुन कर पिता ने गद्गद कंठ से कहा—'तुम्हारे आहार ही के बाद मैं पथ्य लूँगा।' पिता का पुत्र के प्रति स्नेह स्वाभाविक है, पर यहाँ स्वाभाविकता की सीमा पर वह स्नेह पहुँच गया है। गुणवान् पुत्र के प्रति पिता का इससे बढ़ कर क्या भाव हो सकता है? हर्ष की गुणग्राहिता भी असामान्य थी। जब उन्होंने सुना कि रसायन नामक वैद्यकुमार ने सम्राट् के प्रति भक्ति और स्नेह से अभिभूत होकर आग में कूद कर जान दे दी तो उनकी प्रतिक्रिया यह हुई कि उसने कुलपुत्रता धर्म को चमका दिया। स्वयं बाण ने हर्ष की गुणग्राहिता की प्रशंसा