हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ हर्षचरितम् मालिलिङ्ग । कथंकथमपि चिराद्विमुक्तमपसृत्य कृतनमस्कारं प्रणतजननी- कमुपागतमासीनं च शयनान्तिके पिबन्निव विगतनिमेषनिश्चलेन चक्षुषा व्यलोकयत् । पस्पर्श च पुनःपुनर्वेपथुमता पाणितलेन क्षयक्षामकण्ठश्च कृच्छ्रादिबावादीत्—'वत्स ! कृशोऽसि' इति । भण्डिस्त्वकथयत्—'देव ! तृतीयमहः कृताहारस्यास्याद्य' इति । तच्छ्रुत्वा बाष्पवेगगृह्यमाणाक्षरं कथंकथमप्यायतं निःश्वस्योवाच— 'वत्स ! जानामि त्वां पितृप्रियमतिमृदुहृदयम् । ईदृशेषु विधुरयति धीम- तोऽपि धियम् । अतिदुर्धरो बान्धवस्नेहः सर्वप्रमाथी । यतो नार्हस्यात्मानं शुचे दातुम् । उद्दाममहादाहज्वरदग्धोऽपि दह्ने खल्वहमधिकतरमनेना- युष्मदाधिना । निशितमिव शस्त्रं तक्षणोति मां त्वदीयस्तनिमा । सुखं च राज्यं च वंशश्च प्राणाश्च परलोकश्च त्वयि मे स्थिताः । यथा मम तथा सर्वासां प्रजानाम् । त्वद्विधानां पीडाः पीडयन्ति सकलमेव भुवनतलम् । घुसने का प्रयत्न करने लगे। अमृत के सरोवर में डुबकी मारने लगे। हरिचन्दन रस के सोते में स्नान करने लगे। हिमालय के घुलकर बहते हुए बर्फ के जल में अभिषेक करने लगे। हर्ष के अङ्गों को अपने अङ्गों से दबाने लगे। कपोल से कपोल रगड़ने लगे। लगा- तार पपनियों में गुँथी हुई आँसू की बूँदों से भरी आँखों को आनन्द से निमीलित करने लगे और ज्वर का सन्ताप भूलकर हर्ष का गाढ़ आलिङ्गन किया। किसी प्रकार देर से जब उन्होंने छोड़ा तब हर्ष ने खिसक कर माता को प्रणाम किया और समीप में आकर बैठे। राजा अपलक आँखों से मानो पीते हुए उन्हें निहारने लगे और काँपता हुआ हाथ बार बार उन पर फेरते हुए कमजोरी से गले के रुँध जाने के कारण बड़ी कठिनाई से बोले—'वत्स, दुबले लग रहे हो।' तब भण्डि ने कहा—'देव, आज तीन दिन बीत गए, इन्होंने आहार नहीं किया।' यह सुन कर राजा की आँखों में आँसू भर आए और किसी किसी प्रकार लम्बी साँस लेकर टूटते हुए शब्दों में बोले—'वत्स, पिता के स्नेही और अत्यन्त मृदुल स्वभाव वाले तुम्हें जानता हूँ। इस तरह के आपत्तिकाल में बुद्धिमान् की भी मति व्यग्र हो जाती है। बांधव का स्नेह अत्यन्त दुःखदायी और दुःसह होता है, अतः तुम्हें अपने आपको शोक के अधीन नहीं करना चाहिए। यद्यपि मुझे दाहज्वर का ताप जलाए जा रहा है तथापि तुम्हारी इस मानसिक व्यथा से और भी मैं सन्तप्त हो रहा हूँ। तुम्हारा यह दुबलापन तेज शस्त्र की भाँति मुझे खोंर रहा है। मेरे सुख, राज्य, वंश, प्राण और परलोक सबके सब तुम्हीं से चलते हैं। जिस तरह मेरे उसी तरह समस्त प्रजाओं के भी।