भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

पञ्चम उच्छ्वासः २६५ दृष्ट्वा च प्रथमदुःखसंपातमध्यमानमतिराशङ्कित इव भागधेयेभ्यः समभवत् । अन्तकपुरवर्तिनमेव च पितरममन्यत । निराकृत इव चान्तः- करणेन क्षणमासीत् । अवधूतश्च धैर्येण, चेत्रीकृतः क्षोभेण, रिक्तीकृतो रत्या, विषयीकृतो विषादेन, पावकमयमिव हृदयमुद्वहन् , विषमविषदूषि- तानीव मुह्यन्तीन्द्रियाणि बिभ्राणः, तमसा रसातलमपि विशेषयन् , शून्यत्वेनाकाशमप्यतिशयानो नाविन्दत कर्तव्यम् । पस्पर्श च हृदयेन भियमुत्तमाङ्गेन च गाम् । अवनिपतिस्तु दूरादेव दृष्ट्वातिदयितं तनयं तदवस्थोऽपि निर्भरस्नेहा- वर्जितः प्रधावमानो मनसा प्रसार्य भुजौ 'ऐह्येहि' इत्याह्वयन् शरीरार्धेन शयनादुदगात् । ससंभ्रममुपसृतं चैनं विनयावनममुन्नमय्य बलादुरसि निवेश्य, विशन्निव प्रेम्णा निशाकरमण्डलमध्यम् , मज्जन्निवामृतमये महा- सरसि, स्नापयन्निव महति हरिचन्दनरसप्रस्रवणे, अभिषिच्यमान इव तुषाराद्रिद्रवेण, पीडयन्नङ्गैरङ्गानि, कपोलेन कपोलमवघट्टयन् , निमीलय- न्पद्माप्रप्रथिताजस्रास्रविस्राविणी विलोचने विस्मृतज्वरसंज्वरः सुचिर- भागधेयेभ्यो देवेभ्यः । अन्तःकरणेन मनसा । प्रस्रवणे निम्ने । द्रवो रसः । संज्वरः संतापः । औषधियों के चूर से उसकी देह मलिन थी। 'आर्यपुत्र, क्या आप सो रहे हैं?' यह बार बार उनसे पूछ रही थी और उनके सिर तथा वक्ष पर हाथ फेर रही थी । पिताजी की ऐसी अवस्था देखकर पहले पहल दुःख के अनुभव के कारण हर्ष के मन में बहुत बड़ी खलबली मची। वे अपने भाग्य पर भी सन्देह प्रकट करने लगे। पिताजी को यमराज के नगर में पहुँचे हुए ही समझने लगे। ऐसा सोचते ही क्षण भर के लिए उनका अन्तःकरण उनसे अलग हो गया। धैर्य उन्हें छोड़कर हट गया, क्षोभ ने अपना प्रभाव डाला, राग से रहित हो गए, विषाद ने उन्हें पकड़ा। अग्नि के समान जलते हुए अपने हृदय को धारण किया। दारुण विष के पी लेने से मानों उनकी इन्द्रियां मूर्च्छित होने लगीं। पाताल से भी बढ़कर (मोह के) अन्धकार में पड़ गए और निर्णय नहीं कर सके कि उन्हें अब क्या करना चाहिए ? राजा ने दूर ही से अपने प्रिय पुत्र को देखा और उसी हालत में अत्यन्त स्नेह के के कारण मन से दौड़ पड़े । हाथ फैला कर 'आओ आओ' कह कर बुलाते हुए शय्या से उठने की कोशिश करने लगे। दौड़कर जल्दी से आए हुए और विनय से झुके हुए हर्ष को उठाया और जोर से आलिङ्गन किया। प्रेम से मानों चन्द्रमा के मण्डल के बीच