हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ · हर्षचरितम् स्वास्थ्येन, विधेयीकृतं व्याधिना, क्रोडीकृतं कालेन, लक्ष्यीकृतं दक्षिणा- शया, पीतमिव पीडाभिः, जग्धमिव जागरेण, निगीर्णमिव वैवर्ण्येन, ग्रासीकृतमिव गात्रभङ्गेन, ह्रियमाणमिव विपद्भिः, वण्ट्यमानमिव वेद- नाभिः, लुण्ठ्यमानमिव दुःखैः, आदित्सितं दैवेन, निरूपितं नियत्या, समाघ्रातमनित्यत्वेन, अभिभूयमानमभावेन, परिकलितं परासुतया, दत्ता- वकाशं क्लेशस्य, निवासं वैमनस्यस्य, समीपे कालस्य, अन्तिकेऽन्त्यो- च्छ्वासस्य, मुखे महाप्रवासस्य, द्वारि दीर्घनिद्रायाः, जिह्वाग्रे जीवितेशस्य वर्तमानम् , विरलं वाचि, चलितं चेतसि, विह्वलं वपुषि, क्षीणमायुषि, प्रचुरं प्रलापे, संततं श्वसिते, जितं जृम्भिकाभिः, पराधीनमाधिभिः, अनु- बद्धमनुबन्धिकाभिः, पार्श्वोपविष्टया चानवरतरोदनोच्छूननयनया गृहीत- चामरिकयापि निःश्वसितैरेव वीजयन्त्या विविधौषधिधूलिधूसरितशरीरया मुहुर्मुहुः 'आर्यपुत्र ! स्वपिषि' इति व्याहरन्त्या देव्या यशोमत्या शिरसि वक्षसि च स्पृश्यमानं पितरमद्राक्षीत् । लक्ष्यीकृतम् । आघ्रातमित्यर्थः । वण्ट्यमानं भागीक्रियमाणम् । जीवितेशो यमः । अनुबन्धिका गात्रसन्धिपीडा । उन्हें विवश कर दिया था। रोग ने उन्हें अधीन कर रखा था। काल ने अपने अङ्क में उन्हें कर लिया था। यमराज की दक्षिण दिशा ने उन्हें अपना लक्ष्य बना लिया था। पीड़ाओं ने मानों उन्हें पी लिया था। जागरण उन्हें खा गया था। विवर्णता उन्हें निगल गई थी। अङ्गों की ऐंठनी ने उन्हें ग्रस लिया था। विपत्तियों ने उन्हें हर लिया था। वेदनाओं ने उन्हें ठग लिया था। दुःखों ने उन्हें लूट लिया था। भाग्य ने उन्हें पकड़ रखा था। नियति ने उन्हें पहचान लिया था। अनित्यता ने उन्हें सूँघ लिया था। अभाव ने उन्हें अभिभूत कर दिया था। मृत्यु ने उन्हें ग्रास बना लिया था। क्लेश ने टिकने के लिए उन्हें स्थान बना लिया था। वैमनस्य के समीप थे। काल के सन्निकट थे। अन्तिम सांस ही लेने वाले थे। महाप्रवास के मुख में पहुँच चुके थे। दीर्घनिद्रा के द्वार पर खड़े थे। यमराज की जीभ के अग्रभाग पर अड़े थे। उनकी आवाज टूटती जा रही थी, चित्त वश में नहीं था, शरीर व्यग्र हो रहा था, आयु कम थी, बड़बड़ाहट बढ़ गई थी, सांस निकलती ही रहती थी, जंभाई ने जीत लिया था, मानसिक व्यथाओं ने पराधीन कर दिया था, अङ्गों की प्रत्येक गांठ में भारी पीड़ा उत्पन्न हो गई थीं। रानी यशोमती उनके बगल में बैठी हुई थी। हमेशा रोते ही रहने से उसको आँखें उबल आईं थीं। चँवरी लिए थी, पर अपनी साँसों से ही उन्हें झल रही थी। अनेक प्रकार की