हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम उच्छ्वासः २६३ ष्णां निःश्वासपरम्परामुद्वहन्तम्, अत्युष्णनिःश्वासदग्धयेव श्यामायमानया रसनया निवेद्यमानदारुणसन्निपातारम्भम्, उरःस्थलस्थापितमणिमौक्ति- कहारचन्दनचन्द्रकान्तम्, कृतान्तदूतदर्शनयोग्यमिवात्मानं कुर्वाणम्, अङ्गभङ्गवलनोत्क्षिप्तभुजयुगलम्, पर्यस्तहस्तनखमयूखैर्धारागृहमिव ताप- शान्तये रचयन्तम्, नेदिष्ठसलिलमणिकुट्टिमादर्शोदरैषु निपतद्भिः प्रतिबि- म्बैरपि संतापातिशयमिव कथयन्तम्, स्पृशन्तीं प्रणयिनीमिव विश्वास- भूमिं मूर्छामपि बहु मन्यमानम्, अन्तकाह्वानाक्षरैरिव सभयभिषग्दृष्टैर- रिष्टैरादिष्टम्, महाप्रस्थानकाले स्वसंतापसंतानमाप्तहृदयेषु सञ्चारयन्तम्, अरतिपरिगृहीतमीर्ष्ययेव छायया विमुच्यमानम्, उद्योगमिवोपद्रवाणाम्, सर्वास्त्रमोक्षमिव क्षामतायाः, हस्तीकृतं विहस्ततया, विषयीकृतं वैषम्येण, क्षेत्रीकृतं क्षयेण, गोचरीकृतं ग्लान्या, दष्टं दुःखासिकया, आत्मीकृतम- अरिष्टैर्दुर्लक्षणैः । अरतिरेकत्रानवस्थितिः । छाया कान्तिः । विहस्तोऽक्षमः । उनकी आँखें कुछ-कुछ भीतर धँसा जा रही थी। गरम सांसों के साथ उनके सूखते हुए दाँतों से धूसर वर्ण की किरणें मृगतृष्णा के समान फैल रही थीं। उनकी जीभ अत्यन्त उष्ण श्वासों से जलकर काला पड़ती जा रही थी। लगता था कि कठोर सन्निपात ने उन पर आक्रमण कर लिया हो। मणि और मुक्ता के हार, चन्दन और चन्द्रकान्त, ठण्डक के लिए उनके वक्ष पर रखे गए थे, मानों इस प्रकार वे अपने आपको यमराज के दूतों के देखने योग्य बना रहे थे। अङ्गों की तोड़-मरोड़ करते थे और भुजाओं को ऊपर की ओर फेंकते थे। उनके हाथ के नखों की किरणें निकल कर फैल रही थीं, मानों अपने सन्ताप की शान्ति के लिए धारागृह का निर्माण कर रहे हों। समीप में जल से भीगे हुए मणि- कुट्टिमों के आइनों में उनके प्रतिबिम्ब पड़ रहे थे, मानों वे बढ़े हुए अपने सन्ताप को व्यक्त कर रहे थे। प्रेयसी के समान विश्वास के पात्र, स्पर्श करती हुई मूर्छा को भी वे अपने लिए बहुत समझते थे। वैद्य लोग यमराज की बुलाहट के अक्षरों के समान उनके मरणचिन्हों को डरते-डरते देख रहे थे। महाप्रस्थान के समय अपने सन्तापसमूह को स्वजनों के हृदय में सञ्चारित कर रहे थे। बिलकुल अरति के हो जाने से मानों ईर्ष्या के कारण उन्हें उनकी कान्ति छोड़ती जा रही थी। वे मानों उपद्रवों के उपक्रम हो रहे थे। क्षीणता ने उन पर सब प्रकार से प्रहार किया था। व्याकुलता ने उन्हें वश में कर रखा था। विषमता ने उन्हें पा लिया था। क्षय ने उन्हें अपना क्षेत्र बना लिया था। ग्लानि ने उन्हें अपना विषय बनाया था। दुःख की अनुभूति से वे दष्ट थे, अस्वास्थ्य ने