हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ हर्षचरितम् विजयाय नीराज्यमानमिव ज्वरज्वलनेनाव्रतपरिवर्तनैस्तरङ्गिणि शयनीये शेषमिव विषोष्मणा क्षीरोदन्वति विचेष्टमानम् , मुक्ताफलवालुकाधूलिध- वलितं जलधिमिव क्षयकाले शुष्यन्तम् , कालेन कैलासमिव दशानने- नोद्ध्रियमाणम् , अविरतचन्दनचर्चापराणां परिचारिकाणामत्युष्णावय- वस्पर्शभस्मीभूतोदरैरिव धवलैः करैः स्पृश्यमानं लोकान्तरप्रस्थितम् , स्थास्नुना स्वयशसेव चन्दनानुलेपनच्छलेनापृच्छ्यमानम् , अविच्छि- न्नदीयमानकमलकुमुदेन्दीवरदलम् , कालकटाक्षपतनशबलमिव शरीरमु- द्वहन्तम् , निबिडदुकूलपट्टनिपीडितकेशान्तकध्यमानकष्टवेदनानुबन्धं मू- र्द्धानं धारयन्तम् , दुर्धरवेदनोन्नमन्नीलशिराजालककरालेन च कालाङ्गुलि- लिख्यमानलेखाख्यातमरणावधिदिवससंख्यानेनेव ललाटफलकेन भयमु- पजनयन्तम् , आसन्नयमदर्शनोद्वेगादिव च किंचिदन्तःप्रविष्टतारकं चक्षु- र्दधानम् , शुष्यद्दशनपङ्क्तिप्रसृतधूसरदीधितितरङ्गिणीं मृततृष्णिकामिवो- दासी । कालेन यमेन, कृष्णेन च । दशाननो व्याधिः, राक्षसश्च । आपृच्छ्यमानं ज्योक्रियमाणम् । रसना जिह्वा । नेदिष्ठमन्तिकतमम् । नीबू और द्राक्षा के फल बटोर कर रखे गए थे । ब्राह्मण लोग दक्षिणा लेकर शान्ति के जल छींट रहे थे । दासियाँ ललाट में लगाने के लिए सिल-बट्टे पर रगड़ कर लेप तैयार कर रही थीं । ज्वर की अग्नि मानों परलोक की विजय के लिए प्रयाण करते हुए राजा की आरती उतार रही थी । राजा पीड़ा के कारण शय्या पर हमेशा करवट बदलते हुए व्याकुल पड़े थे । चादर तरङ्ग की भाँति सिकुड़ गई थी, मानों क्षीर-समुद्र में विष की गर्मी से छटपटाते हुए शेषनाग हों । मुक्ता की धूल से धवल होकर प्रलयकाल में सूखते हुए समुद्र के समान लग रहे थे । जैसे रावण ने कैलास को उठा लिया उसी प्रकार काल उन्हें उठाए जा रहा था । परिचारक लोग हमेशा चन्दन का लेप दाहज्वर से हाथ के जलने पर भी उनके शरीर में लगाते थे, मानों परलोक में प्रस्थान करने वाले राजा को उनका चिरकाल तक रहने वाला यश चन्दनलेप के व्याज से बिदा दे रहा था । हमेशा लाल कमल, कुमुद और नील कमल उन पर डाले जा रहे थे, मानों यम के कटाक्षों के गिरने से भिन्न-भिन्न वर्णवाला शरीर धारण कर रहे थे । उनके सिर में बालों के साथ कसकर दुकूल बाँधा गया था, जिससे प्रतीत होता था कि उनके सिर में दर्द है । दुःसह वेदना के कारण उनके ललाट पर के काले काले नस उठ जाते, जिन्हें यह जानकर भय होता कि मरने के दिन के समाप्त होने की गणना की जा रही है जिससे अङ्गुलि की काली काली रेखा पड़ रही है । समीप में ले जाने के लिए खड़े यमराज को मानों देखकर