भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 306

श्वेताई्रकर्पटार्पितकर्पूरपरागशीतलीकृतशलाके, नास्यानपङ्कलिप्यमाननव- भाण्डगतगण्डूषग्रहणमस्तुनि, तिम्यत्कोमलकमलिनीपलाशप्रावृतमृदुमृ- णालके, सनालनीलोत्पलपूलीसनाथसलिलपानभाजनभुवि, धारानिपात- निर्वाप्यमाणकथिताम्भसि, पटुपाटलशर्करामोदमुचि, मञ्चकाश्रितसिक- तिलकर्करीविश्रान्तन्तरचक्षुषि, सरलशैवालवलयितगलदोलयन्त्रके, गल्वर्क- शालाजिरोल्लासितलाजसक्तुनिपीतमसारपारीपरिगृहीतकर्कशर्करे, शिशि- रौषधरसचूर्णावकीर्णस्फटिकशुक्तिशङ्खसंचये, संचितप्रचुरप्राचीनामलक- मातुलुङ्गद्राक्षादाडिमादिफले, प्रतिग्राहितविप्रविप्रकीर्यमाणशान्त्युदकवि- पृषि, प्रेष्याप्रेष्यमाणललाटलेपोपदिग्धदृषदि धवलगृहे स्थितम्, परलोक- शलाकाः पाषाणकणिकाः । मुखपूरणं गण्डूषः। निर्वाप्यमाणं शीतलीक्रियमाणम् । पाटला शर्कराविशेषः । मञ्चक आधारभेदः। कर्करी वारिधानी। गोलयन्त्रकं बहुच्छिद्रं जलभाण्डम् । उल्लासिता विस्तारिताः । प्रतिग्राहिताः प्रतिग्रहं ग्राहिताः । प्रेष्या लजाए हुए वैद्यों द्वारा बताए पथ्य की बात ध्यान से सुन रहे थे । नौकर राजा की प्यास मिटाने के लिए अपने मुँह में गिलास ऊँचा करके अपने मुँह में पानी की धार पीते थे । राजा की तृप्ति के लिए उनके सामने बहुत भोजन करने वालों को खिलाया जा रहा था । दूकानदार अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ जुटाने में लगे थे । पीने के लिए पानी लाने वाले की बार-बार पुकार होने से रोगी की घोर प्यास का अनुमान लगाया जा रहा था । तक्र की मटकियों को बरफ़ में लपेट कर ठण्डा किया जा रहा था । भीगे हुए सफेद कपड़े में कपूर की चूर रखकर सलाइयाँ ठण्डी की जा रही थीं । नए बर्तनों के चारों ओर गीली मिट्टी लथेड़ कर उसमें कुल्ला करने के लिए दही की पिलोर रखी हुई थी । कमलिनी के सूखते हुए पत्तों मे बाँध कर कोमल मृणाल रखे गए थे । जहाँ पानी पीने के बर्तन थे वहाँ डंठल के साथ नीले कमलों की आटियाँ रखी गई थीं। खौल कर उबलते हुए पानी को छींटे देकर शान्त किया जा रहा था । लाल रङ्ग की कच्ची शकर की गन्ध उठ रही थी । एक ओर घड़ौंची पर पानी भरी हुई सुराही रखी हुई थी, जिस पर रोगी की दृष्टि पड़ने से उसे कुछ शान्ति मिलती थी। पानी में भीगी हुई सिरवाल घास में लपेटी हुई गोलें छींकों पर टँगी हुई थीं । गल्वर्क की सरैयों में भुजिया के सत्तू भरे हुए थे और पीले मसार की प्याली में सफेद शकर रखी हुई थी १ । ठण्ड पहुँचाने वाली औषधों का रस और चूर्ण स्फाटिक की शुक्तियों में और शंखों में भर दिया गया था। पुराने आँवले, १. गल्वर्क से शाराजिर और मसार की पारी, ये उस समय के रत्नपात्र थे । देखें हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन, पृष्ठ ९४ ।