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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

श्वेताई्रकर्पटार्पितकर्पूरपरागशीतलीकृतशलाके, नास्यानपङ्कलिप्यमाननव- भाण्डगतगण्डूषग्रहणमस्तुनि, तिम्यत्कोमलकमलिनीपलाशप्रावृतमृदुमृ- णालके, सनालनीलोत्पलपूलीसनाथसलिलपानभाजनभुवि, धारानिपात- निर्वाप्यमाणकथिताम्भसि, पटुपाटलशर्करामोदमुचि, मञ्चकाश्रितसिक- तिलकर्करीविश्रान्तन्तरचक्षुषि, सरलशैवालवलयितगलदोलयन्त्रके, गल्वर्क- शालाजिरोल्लासितलाजसक्तुनिपीतमसारपारीपरिगृहीतकर्कशर्करे, शिशि- रौषधरसचूर्णावकीर्णस्फटिकशुक्तिशङ्खसंचये, संचितप्रचुरप्राचीनामलक- मातुलुङ्गद्राक्षादाडिमादिफले, प्रतिग्राहितविप्रविप्रकीर्यमाणशान्त्युदकवि- पृषि, प्रेष्याप्रेष्यमाणललाटलेपोपदिग्धदृषदि धवलगृहे स्थितम्, परलोक- शलाकाः पाषाणकणिकाः । मुखपूरणं गण्डूषः। निर्वाप्यमाणं शीतलीक्रियमाणम् । पाटला शर्कराविशेषः । मञ्चक आधारभेदः। कर्करी वारिधानी। गोलयन्त्रकं बहुच्छिद्रं जलभाण्डम् । उल्लासिता विस्तारिताः । प्रतिग्राहिताः प्रतिग्रहं ग्राहिताः । प्रेष्या लजाए हुए वैद्यों द्वारा बताए पथ्य की बात ध्यान से सुन रहे थे । नौकर राजा की प्यास मिटाने के लिए अपने मुँह में गिलास ऊँचा करके अपने मुँह में पानी की धार पीते थे । राजा की तृप्ति के लिए उनके सामने बहुत भोजन करने वालों को खिलाया जा रहा था । दूकानदार अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ जुटाने में लगे थे । पीने के लिए पानी लाने वाले की बार-बार पुकार होने से रोगी की घोर प्यास का अनुमान लगाया जा रहा था । तक्र की मटकियों को बरफ़ में लपेट कर ठण्डा किया जा रहा था । भीगे हुए सफेद कपड़े में कपूर की चूर रखकर सलाइयाँ ठण्डी की जा रही थीं । नए बर्तनों के चारों ओर गीली मिट्टी लथेड़ कर उसमें कुल्ला करने के लिए दही की पिलोर रखी हुई थी । कमलिनी के सूखते हुए पत्तों मे बाँध कर कोमल मृणाल रखे गए थे । जहाँ पानी पीने के बर्तन थे वहाँ डंठल के साथ नीले कमलों की आटियाँ रखी गई थीं। खौल कर उबलते हुए पानी को छींटे देकर शान्त किया जा रहा था । लाल रङ्ग की कच्ची शकर की गन्ध उठ रही थी । एक ओर घड़ौंची पर पानी भरी हुई सुराही रखी हुई थी, जिस पर रोगी की दृष्टि पड़ने से उसे कुछ शान्ति मिलती थी। पानी में भीगी हुई सिरवाल घास में लपेटी हुई गोलें छींकों पर टँगी हुई थीं । गल्वर्क की सरैयों में भुजिया के सत्तू भरे हुए थे और पीले मसार की प्याली में सफेद शकर रखी हुई थी १ । ठण्ड पहुँचाने वाली औषधों का रस और चूर्ण स्फाटिक की शुक्तियों में और शंखों में भर दिया गया था। पुराने आँवले, १. गल्वर्क से शाराजिर और मसार की पारी, ये उस समय के रत्नपात्र थे । देखें हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन, पृष्ठ ९४ ।

२६२ हर्षचरितम् विजयाय नीराज्यमानमिव ज्वरज्वलनेनाव्रतपरिवर्तनैस्तरङ्गिणि शयनीये शेषमिव विषोष्मणा क्षीरोदन्वति विचेष्टमानम् , मुक्ताफलवालुकाधूलिध- वलितं जलधिमिव क्षयकाले शुष्यन्तम् , कालेन कैलासमिव दशानने- नोद्ध्रियमाणम् , अविरतचन्दनचर्चापराणां परिचारिकाणामत्युष्णावय- वस्पर्शभस्मीभूतोदरैरिव धवलैः करैः स्पृश्यमानं लोकान्तरप्रस्थितम् , स्थास्नुना स्वयशसेव चन्दनानुलेपनच्छलेनापृच्छ्यमानम् , अविच्छि- न्नदीयमानकमलकुमुदेन्दीवरदलम् , कालकटाक्षपतनशबलमिव शरीरमु- द्वहन्तम् , निबिडदुकूलपट्टनिपीडितकेशान्तकध्यमानकष्टवेदनानुबन्धं मू- र्द्धानं धारयन्तम् , दुर्धरवेदनोन्नमन्नीलशिराजालककरालेन च कालाङ्गुलि- लिख्यमानलेखाख्यातमरणावधिदिवससंख्यानेनेव ललाटफलकेन भयमु- पजनयन्तम् , आसन्नयमदर्शनोद्वेगादिव च किंचिदन्तःप्रविष्टतारकं चक्षु- र्दधानम् , शुष्यद्दशनपङ्क्तिप्रसृतधूसरदीधितितरङ्गिणीं मृततृष्णिकामिवो- दासी । कालेन यमेन, कृष्णेन च । दशाननो व्याधिः, राक्षसश्च । आपृच्छ्यमानं ज्योक्रियमाणम् । रसना जिह्वा । नेदिष्ठमन्तिकतमम् । नीबू और द्राक्षा के फल बटोर कर रखे गए थे । ब्राह्मण लोग दक्षिणा लेकर शान्ति के जल छींट रहे थे । दासियाँ ललाट में लगाने के लिए सिल-बट्टे पर रगड़ कर लेप तैयार कर रही थीं । ज्वर की अग्नि मानों परलोक की विजय के लिए प्रयाण करते हुए राजा की आरती उतार रही थी । राजा पीड़ा के कारण शय्या पर हमेशा करवट बदलते हुए व्याकुल पड़े थे । चादर तरङ्ग की भाँति सिकुड़ गई थी, मानों क्षीर-समुद्र में विष की गर्मी से छटपटाते हुए शेषनाग हों । मुक्ता की धूल से धवल होकर प्रलयकाल में सूखते हुए समुद्र के समान लग रहे थे । जैसे रावण ने कैलास को उठा लिया उसी प्रकार काल उन्हें उठाए जा रहा था । परिचारक लोग हमेशा चन्दन का लेप दाहज्वर से हाथ के जलने पर भी उनके शरीर में लगाते थे, मानों परलोक में प्रस्थान करने वाले राजा को उनका चिरकाल तक रहने वाला यश चन्दनलेप के व्याज से बिदा दे रहा था । हमेशा लाल कमल, कुमुद और नील कमल उन पर डाले जा रहे थे, मानों यम के कटाक्षों के गिरने से भिन्न-भिन्न वर्णवाला शरीर धारण कर रहे थे । उनके सिर में बालों के साथ कसकर दुकूल बाँधा गया था, जिससे प्रतीत होता था कि उनके सिर में दर्द है । दुःसह वेदना के कारण उनके ललाट पर के काले काले नस उठ जाते, जिन्हें यह जानकर भय होता कि मरने के दिन के समाप्त होने की गणना की जा रही है जिससे अङ्गुलि की काली काली रेखा पड़ रही है । समीप में ले जाने के लिए खड़े यमराज को मानों देखकर

पञ्चम उच्छ्वासः २६३ ष्णां निःश्वासपरम्परामुद्वहन्तम्, अत्युष्णनिःश्वासदग्धयेव श्यामायमानया रसनया निवेद्यमानदारुणसन्निपातारम्भम्, उरःस्थलस्थापितमणिमौक्ति- कहारचन्दनचन्द्रकान्तम्, कृतान्तदूतदर्शनयोग्यमिवात्मानं कुर्वाणम्, अङ्गभङ्गवलनोत्क्षिप्तभुजयुगलम्, पर्यस्तहस्तनखमयूखैर्धारागृहमिव ताप- शान्तये रचयन्तम्, नेदिष्ठसलिलमणिकुट्टिमादर्शोदरैषु निपतद्भिः प्रतिबि- म्बैरपि संतापातिशयमिव कथयन्तम्, स्पृशन्तीं प्रणयिनीमिव विश्वास- भूमिं मूर्छामपि बहु मन्यमानम्, अन्तकाह्वानाक्षरैरिव सभयभिषग्दृष्टैर- रिष्टैरादिष्टम्, महाप्रस्थानकाले स्वसंतापसंतानमाप्तहृदयेषु सञ्चारयन्तम्, अरतिपरिगृहीतमीर्ष्ययेव छायया विमुच्यमानम्, उद्योगमिवोपद्रवाणाम्, सर्वास्त्रमोक्षमिव क्षामतायाः, हस्तीकृतं विहस्ततया, विषयीकृतं वैषम्येण, क्षेत्रीकृतं क्षयेण, गोचरीकृतं ग्लान्या, दष्टं दुःखासिकया, आत्मीकृतम- अरिष्टैर्दुर्लक्षणैः । अरतिरेकत्रानवस्थितिः । छाया कान्तिः । विहस्तोऽक्षमः । उनकी आँखें कुछ-कुछ भीतर धँसा जा रही थी। गरम सांसों के साथ उनके सूखते हुए दाँतों से धूसर वर्ण की किरणें मृगतृष्णा के समान फैल रही थीं। उनकी जीभ अत्यन्त उष्ण श्वासों से जलकर काला पड़ती जा रही थी। लगता था कि कठोर सन्निपात ने उन पर आक्रमण कर लिया हो। मणि और मुक्ता के हार, चन्दन और चन्द्रकान्त, ठण्डक के लिए उनके वक्ष पर रखे गए थे, मानों इस प्रकार वे अपने आपको यमराज के दूतों के देखने योग्य बना रहे थे। अङ्गों की तोड़-मरोड़ करते थे और भुजाओं को ऊपर की ओर फेंकते थे। उनके हाथ के नखों की किरणें निकल कर फैल रही थीं, मानों अपने सन्ताप की शान्ति के लिए धारागृह का निर्माण कर रहे हों। समीप में जल से भीगे हुए मणि- कुट्टिमों के आइनों में उनके प्रतिबिम्ब पड़ रहे थे, मानों वे बढ़े हुए अपने सन्ताप को व्यक्त कर रहे थे। प्रेयसी के समान विश्वास के पात्र, स्पर्श करती हुई मूर्छा को भी वे अपने लिए बहुत समझते थे। वैद्य लोग यमराज की बुलाहट के अक्षरों के समान उनके मरणचिन्हों को डरते-डरते देख रहे थे। महाप्रस्थान के समय अपने सन्तापसमूह को स्वजनों के हृदय में सञ्चारित कर रहे थे। बिलकुल अरति के हो जाने से मानों ईर्ष्या के कारण उन्हें उनकी कान्ति छोड़ती जा रही थी। वे मानों उपद्रवों के उपक्रम हो रहे थे। क्षीणता ने उन पर सब प्रकार से प्रहार किया था। व्याकुलता ने उन्हें वश में कर रखा था। विषमता ने उन्हें पा लिया था। क्षय ने उन्हें अपना क्षेत्र बना लिया था। ग्लानि ने उन्हें अपना विषय बनाया था। दुःख की अनुभूति से वे दष्ट थे, अस्वास्थ्य ने

२४४ · हर्षचरितम् स्वास्थ्येन, विधेयीकृतं व्याधिना, क्रोडीकृतं कालेन, लक्ष्यीकृतं दक्षिणा- शया, पीतमिव पीडाभिः, जग्धमिव जागरेण, निगीर्णमिव वैवर्ण्येन, ग्रासीकृतमिव गात्रभङ्गेन, ह्रियमाणमिव विपद्भिः, वण्ट्यमानमिव वेद- नाभिः, लुण्ठ्यमानमिव दुःखैः, आदित्सितं दैवेन, निरूपितं नियत्या, समाघ्रातमनित्यत्वेन, अभिभूयमानमभावेन, परिकलितं परासुतया, दत्ता- वकाशं क्लेशस्य, निवासं वैमनस्यस्य, समीपे कालस्य, अन्तिकेऽन्त्यो- च्छ्वासस्य, मुखे महाप्रवासस्य, द्वारि दीर्घनिद्रायाः, जिह्वाग्रे जीवितेशस्य वर्तमानम् , विरलं वाचि, चलितं चेतसि, विह्वलं वपुषि, क्षीणमायुषि, प्रचुरं प्रलापे, संततं श्वसिते, जितं जृम्भिकाभिः, पराधीनमाधिभिः, अनु- बद्धमनुबन्धिकाभिः, पार्श्वोपविष्टया चानवरतरोदनोच्छूननयनया गृहीत- चामरिकयापि निःश्वसितैरेव वीजयन्त्या विविधौषधिधूलिधूसरितशरीरया मुहुर्मुहुः 'आर्यपुत्र ! स्वपिषि' इति व्याहरन्त्या देव्या यशोमत्या शिरसि वक्षसि च स्पृश्यमानं पितरमद्राक्षीत् । लक्ष्यीकृतम् । आघ्रातमित्यर्थः । वण्ट्यमानं भागीक्रियमाणम् । जीवितेशो यमः । अनुबन्धिका गात्रसन्धिपीडा । उन्हें विवश कर दिया था। रोग ने उन्हें अधीन कर रखा था। काल ने अपने अङ्क में उन्हें कर लिया था। यमराज की दक्षिण दिशा ने उन्हें अपना लक्ष्य बना लिया था। पीड़ाओं ने मानों उन्हें पी लिया था। जागरण उन्हें खा गया था। विवर्णता उन्हें निगल गई थी। अङ्गों की ऐंठनी ने उन्हें ग्रस लिया था। विपत्तियों ने उन्हें हर लिया था। वेदनाओं ने उन्हें ठग लिया था। दुःखों ने उन्हें लूट लिया था। भाग्य ने उन्हें पकड़ रखा था। नियति ने उन्हें पहचान लिया था। अनित्यता ने उन्हें सूँघ लिया था। अभाव ने उन्हें अभिभूत कर दिया था। मृत्यु ने उन्हें ग्रास बना लिया था। क्लेश ने टिकने के लिए उन्हें स्थान बना लिया था। वैमनस्य के समीप थे। काल के सन्निकट थे। अन्तिम सांस ही लेने वाले थे। महाप्रवास के मुख में पहुँच चुके थे। दीर्घनिद्रा के द्वार पर खड़े थे। यमराज की जीभ के अग्रभाग पर अड़े थे। उनकी आवाज टूटती जा रही थी, चित्त वश में नहीं था, शरीर व्यग्र हो रहा था, आयु कम थी, बड़बड़ाहट बढ़ गई थी, सांस निकलती ही रहती थी, जंभाई ने जीत लिया था, मानसिक व्यथाओं ने पराधीन कर दिया था, अङ्गों की प्रत्येक गांठ में भारी पीड़ा उत्पन्न हो गई थीं। रानी यशोमती उनके बगल में बैठी हुई थी। हमेशा रोते ही रहने से उसको आँखें उबल आईं थीं। चँवरी लिए थी, पर अपनी साँसों से ही उन्हें झल रही थी। अनेक प्रकार की

पञ्चम उच्छ्वासः २६५ दृष्ट्वा च प्रथमदुःखसंपातमध्यमानमतिराशङ्कित इव भागधेयेभ्यः समभवत् । अन्तकपुरवर्तिनमेव च पितरममन्यत । निराकृत इव चान्तः- करणेन क्षणमासीत् । अवधूतश्च धैर्येण, चेत्रीकृतः क्षोभेण, रिक्तीकृतो रत्या, विषयीकृतो विषादेन, पावकमयमिव हृदयमुद्वहन् , विषमविषदूषि- तानीव मुह्यन्तीन्द्रियाणि बिभ्राणः, तमसा रसातलमपि विशेषयन् , शून्यत्वेनाकाशमप्यतिशयानो नाविन्दत कर्तव्यम् । पस्पर्श च हृदयेन भियमुत्तमाङ्गेन च गाम् । अवनिपतिस्तु दूरादेव दृष्ट्वातिदयितं तनयं तदवस्थोऽपि निर्भरस्नेहा- वर्जितः प्रधावमानो मनसा प्रसार्य भुजौ 'ऐह्येहि' इत्याह्वयन् शरीरार्धेन शयनादुदगात् । ससंभ्रममुपसृतं चैनं विनयावनममुन्नमय्य बलादुरसि निवेश्य, विशन्निव प्रेम्णा निशाकरमण्डलमध्यम् , मज्जन्निवामृतमये महा- सरसि, स्नापयन्निव महति हरिचन्दनरसप्रस्रवणे, अभिषिच्यमान इव तुषाराद्रिद्रवेण, पीडयन्नङ्गैरङ्गानि, कपोलेन कपोलमवघट्टयन् , निमीलय- न्पद्माप्रप्रथिताजस्रास्रविस्राविणी विलोचने विस्मृतज्वरसंज्वरः सुचिर- भागधेयेभ्यो देवेभ्यः । अन्तःकरणेन मनसा । प्रस्रवणे निम्ने । द्रवो रसः । संज्वरः संतापः । औषधियों के चूर से उसकी देह मलिन थी। 'आर्यपुत्र, क्या आप सो रहे हैं?' यह बार बार उनसे पूछ रही थी और उनके सिर तथा वक्ष पर हाथ फेर रही थी । पिताजी की ऐसी अवस्था देखकर पहले पहल दुःख के अनुभव के कारण हर्ष के मन में बहुत बड़ी खलबली मची। वे अपने भाग्य पर भी सन्देह प्रकट करने लगे। पिताजी को यमराज के नगर में पहुँचे हुए ही समझने लगे। ऐसा सोचते ही क्षण भर के लिए उनका अन्तःकरण उनसे अलग हो गया। धैर्य उन्हें छोड़कर हट गया, क्षोभ ने अपना प्रभाव डाला, राग से रहित हो गए, विषाद ने उन्हें पकड़ा। अग्नि के समान जलते हुए अपने हृदय को धारण किया। दारुण विष के पी लेने से मानों उनकी इन्द्रियां मूर्च्छित होने लगीं। पाताल से भी बढ़कर (मोह के) अन्धकार में पड़ गए और निर्णय नहीं कर सके कि उन्हें अब क्या करना चाहिए ? राजा ने दूर ही से अपने प्रिय पुत्र को देखा और उसी हालत में अत्यन्त स्नेह के के कारण मन से दौड़ पड़े । हाथ फैला कर 'आओ आओ' कह कर बुलाते हुए शय्या से उठने की कोशिश करने लगे। दौड़कर जल्दी से आए हुए और विनय से झुके हुए हर्ष को उठाया और जोर से आलिङ्गन किया। प्रेम से मानों चन्द्रमा के मण्डल के बीच

षष्ठ उच्छ्वास: राज्यवर्धन वध व हर्ष की दिग्विजय प्रतिज्ञा

२६६ हर्षचरितम् मालिलिङ्ग । कथंकथमपि चिराद्विमुक्तमपसृत्य कृतनमस्कारं प्रणतजननी- कमुपागतमासीनं च शयनान्तिके पिबन्निव विगतनिमेषनिश्चलेन चक्षुषा व्यलोकयत् । पस्पर्श च पुनःपुनर्वेपथुमता पाणितलेन क्षयक्षामकण्ठश्च कृच्छ्रादिबावादीत्—'वत्स ! कृशोऽसि' इति । भण्डिस्त्वकथयत्—'देव ! तृतीयमहः कृताहारस्यास्याद्य' इति । तच्छ्रुत्वा बाष्पवेगगृह्यमाणाक्षरं कथंकथमप्यायतं निःश्वस्योवाच— 'वत्स ! जानामि त्वां पितृप्रियमतिमृदुहृदयम् । ईदृशेषु विधुरयति धीम- तोऽपि धियम् । अतिदुर्धरो बान्धवस्नेहः सर्वप्रमाथी । यतो नार्हस्यात्मानं शुचे दातुम् । उद्दाममहादाहज्वरदग्धोऽपि दह्ने खल्वहमधिकतरमनेना- युष्मदाधिना । निशितमिव शस्त्रं तक्षणोति मां त्वदीयस्तनिमा । सुखं च राज्यं च वंशश्च प्राणाश्च परलोकश्च त्वयि मे स्थिताः । यथा मम तथा सर्वासां प्रजानाम् । त्वद्विधानां पीडाः पीडयन्ति सकलमेव भुवनतलम् । घुसने का प्रयत्न करने लगे। अमृत के सरोवर में डुबकी मारने लगे। हरिचन्दन रस के सोते में स्नान करने लगे। हिमालय के घुलकर बहते हुए बर्फ के जल में अभिषेक करने लगे। हर्ष के अङ्गों को अपने अङ्गों से दबाने लगे। कपोल से कपोल रगड़ने लगे। लगा- तार पपनियों में गुँथी हुई आँसू की बूँदों से भरी आँखों को आनन्द से निमीलित करने लगे और ज्वर का सन्ताप भूलकर हर्ष का गाढ़ आलिङ्गन किया। किसी प्रकार देर से जब उन्होंने छोड़ा तब हर्ष ने खिसक कर माता को प्रणाम किया और समीप में आकर बैठे। राजा अपलक आँखों से मानो पीते हुए उन्हें निहारने लगे और काँपता हुआ हाथ बार बार उन पर फेरते हुए कमजोरी से गले के रुँध जाने के कारण बड़ी कठिनाई से बोले—'वत्स, दुबले लग रहे हो।' तब भण्डि ने कहा—'देव, आज तीन दिन बीत गए, इन्होंने आहार नहीं किया।' यह सुन कर राजा की आँखों में आँसू भर आए और किसी किसी प्रकार लम्बी साँस लेकर टूटते हुए शब्दों में बोले—'वत्स, पिता के स्नेही और अत्यन्त मृदुल स्वभाव वाले तुम्हें जानता हूँ। इस तरह के आपत्तिकाल में बुद्धिमान् की भी मति व्यग्र हो जाती है। बांधव का स्नेह अत्यन्त दुःखदायी और दुःसह होता है, अतः तुम्हें अपने आपको शोक के अधीन नहीं करना चाहिए। यद्यपि मुझे दाहज्वर का ताप जलाए जा रहा है तथापि तुम्हारी इस मानसिक व्यथा से और भी मैं सन्तप्त हो रहा हूँ। तुम्हारा यह दुबलापन तेज शस्त्र की भाँति मुझे खोंर रहा है। मेरे सुख, राज्य, वंश, प्राण और परलोक सबके सब तुम्हीं से चलते हैं। जिस तरह मेरे उसी तरह समस्त प्रजाओं के भी।

पञ्चम उच्छ्वासः २६७ न ह्यल्पपुण्यभाजां वंशमलंकुर्वन्ति भवादृशाः । फलमस्यानेकजन्मान्त- रोपार्र्जितस्याकलुषस्य कर्मणः । करतलगतमिव कथयन्ति चतुर्णामप्यर्ण- वानामाधिपत्यं ते लक्षणानि । त्वज्जन्मनैव कृतार्थोऽस्मि । निरभिला- षोऽस्मि जीवितव्ये । भिषगनुरोधः पाययति मामौषधम् । अपि च वत्स ! सर्वप्रजापुण्यैः सकलभुवनतलपरिपालनार्थमुत्पत्स्यमानानां भवादृशां जन्मग्रहणोपायः पितरौ । प्रजाभिस्तु बन्धुमन्तो राजानः, न ज्ञातिभिः । तदुत्तिष्ठ । कुरु पुनरेव सर्वाः क्रियाः । कृताहारे च त्वय्यहमपि स्वयमुप- योक्ष्ये पथ्यम्' इत्येवमभिहितस्य चास्य धक्ष्यन्निव हृदयमतितरां शोकानलः संदुधुक्षे । क्षणमात्रं च स्थित्वा पित्रा पुनराहारार्थमादिश्यमानो धवलगृहादवततार । चकार च चेतसि- 'अकाण्डे खल्वयं समुपस्थितो महाप्रलयो व्यभ्र इव वज्रपातः । सामान्योऽपि तावच्छोकः, सोच्छ्वासं मरणम् , अनुपदिष्टौषधो महाव्याधिः, अभस्मीकरणोऽग्निप्रवेशः, अनुपर्-

तुम्हारे सदृश लोगों की पीड़ा सारे संसार को दुःखी बना डालती है। तुम्हारे सदृश लोग अल्प पुण्य वालों के वंश में उत्पन्न नहीं होते । अनेक जन्म-जन्मान्तरों में किए गए पुण्य- कर्मों के फल के रूप में उत्पन्न हो । तुम्हारे ये लक्षण बताते हैं कि चारों समुद्रों का आधिपत्य तुम्हारी हथेली पर होगा । मैं तुम्हारे जन्म से ही कृतकृत्य हूँ। अब जीवित रहने की मेरी इच्छा नहीं। वैद्यों के अनुरोध से विवश होकर औषध का सेवन कर लेता हूँ । और भी, वत्स ! पिता-माता तो सारे संसार के पालन के लिए उत्पन्न होने वाले तुम्हारे जैसे लोगों के जन्म लेने के लिए केवल उपाय बन जाते हैं । सचमुच राजा तो प्रजाओं से अपने आपको बन्धुमान समझते हैं न कि पिता आदि सगोत्र जनों से । इस लिए उठो, फिर से सब कार्य करो । तुम भोजन कर लोगे तो मैं भी पथ्य सेवन करूँगा ।' जब राजा ने यह कहा तब उनका शोकानल हृदय को भस्म करता हुआ और उद्दीप्त हो उठा । क्षणभर ठहर कर पिता के द्वारा फिर भोजनार्थ आज्ञा देने पर वे धवलगृह से नीचे उतरे और मन में सोचने लगे-'निश्चय ही असमय में यह महाप्रलय बिना मेघ के वज्रपात के समान उपस्थित हुआ । साधारण भी शोक वह मरण है जिसमें उच्छ्वास होता है; वह महाव्याधि है जिसकी कोई दवा नहीं; वह अग्नि-प्रवेश है जिसमें जलता हुआ भस्म नहीं हो जाता, वह नरकवास है जो बिना मरे ही प्राप्त होता है, वह अङ्गार की वर्षा है जिसमें ज्योति नहीं निकलती; वह आरे से फाड़ना है जिसमें खण्ड-खण्ड नहीं होते, वह वज्रसूचीपात है जिससे कोई व्रण नहीं होता । अगर वह शोक की आग किसी विशेष व्यक्ति पर आधारित हो तो क्या कहना ! अब मैं क्या करूँ ?'

२६८ हर्षचरितम् तस्यैव नरकवासः, निर्ज्योतिरजङ्गारवर्षमशकलीकरणं क्रकचदारणमव्रणो वज्रसूचीपातः । किमुत विशेषश्रितः । किमत्र करवाणि' इति । राजपुरुषेणाधिष्ठितश्च गत्वा स्वधाम धूममयानिव कृताश्रुपातान्, अग्निमयानिव जनितहृदयदाहान्, विषमयानिव दत्तमूर्च्छावेगान्, महा- पातकमयानिवोत्पादितघृणान्, क्षारमयानिवानीतवेदनान्, कतिचित्कव- लानगृहात् । आचामंश्च चामरग्राहिणमादिदेश—'विज्ञायागच्छ कथमास्ते तातः' इति । गत्वा च प्रतिनिवृत्य च 'देव ! तथैव' इति विज्ञापितस्ते- नागृहीतताम्बूल एवोत्ताम्यता मनसास्ताभिलाषिणि सवितरि सर्वानहूयो- पह्वरे वैद्यान्, 'किमस्मिन्नेवंविधे विधेयमधुना ?' इति विषण्णहृदयः पप्रच्छ । ते तु व्यज्ञापयन्—'देव ! धैर्यमवलम्बस्व । कतिपयैरेव वासरैः पुनः स्वां प्रकृतिमापन्नं स्वस्थं श्रोष्यसि पितरम्' इति । तेषां तु भिषजां मध्ये पौनर्वसवो युवाऽष्टादशवर्षदेशीयस्तस्मिन्नेव सूची शलाका । धूममयानिवेति । धूमः किलाश्रु मोचयति । घृणा जुगुप्सा । उपह्वरे रहसि । स्वां प्रकृतिममन्दत्वम्, अव्यक्तरूपत्वं च, पृथिव्यादिषु वा लीनम् । स्वस्थं व्याधि- विनिर्मुक्तं, स्वर्गस्थं च । यतः—'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥' इत्युक्तम् । पुनर्वसोरपत्यं पौनर्वसवः । पुनर्वसुना मुनिना प्रोक्तमायुर्वेदमधीते पौनर्वसव राजपुरुष के साथ वे अपने स्थान पर पहुँचे और उन्होंने दो चार कौर खाए, मानों वे कौर धूममय थे जिससे उनके आँसू आ गए; अग्निमय थे जिससे उनका हृदय जल उठा; विषमय थे जिससे मूर्च्छा का एक झटका-सा लगा; महापातकमय थे जिससे उन्हें घृणा हुई; क्षारमय थे जिससे अधिक वेदना उन्हें महसूस हुई। खाकर उन्होंने चामरग्राही पुरुष को आदेश दिया—'पता लगाकर आओ, पिताजी की क्या हालत है ?' वह जाकर लौटा और निवेदन किया—'देव, हालत वही है।' सुनकर ताम्बूल बिना लिए ही उद्विग्न होते हुए सन्ध्या के समय एकान्त में समस्त वैद्यों को बुलवाया। 'अब ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिए ?' हृदय में दुखी होकर उनसे पूछा । उन वैद्यों ने समझाया— 'देव, धैर्य धारण करें। कुछ ही दिनों में पिताजी को आप प्रकृतिस्थ और स्वस्थ सुनेंगे।' उन्हीं वैद्यों के बीच पुनर्वसु का पुत्र अट्ठारह वर्ष की अवस्था वाला, उसी राजकुल में कुलक्रम से सम्बन्धित, अष्टाङ्ग आयुर्वेद का पारङ्गत विद्वान्, राजा के द्वारा पुत्र के

पञ्चम उच्छ्वासः २६५ हाजकुले कुलक्रमागतो गतः परम्पारमष्टाङ्गस्यायुर्वेदस्य भूभुजा सुतनि- विशेषं लालितः प्रकृत्यैवातिपटीयस्या प्रज्ञया यथावद्विज्ञाता व्याधिस्वरू- पाणां रसायनो नाम वैद्यकुमारकः सास्रस्तूष्णीमधोमुखोऽभूत् । पृष्टश्च राजसूनुना—'सखे रसायन ! कथय तथ्यं यद्यसाध्यिव पश्यसि' इति । सोऽब्रवीत्—'देव ! श्वः प्रभाते यथावस्थितमावेदयितास्मि' इति । अत्रैव चान्तरे भवनकमलिनीपालः कोकमाश्वासयन्नपरवक्त्रमुच्चैरपठत्- विहग ! कुरु दृढं मनः स्वयं त्यज शुचमास्स्व विवेकवर्त्मनि । सह कमलसरोजिनीश्रिया श्रयति सुमेरुशिरो विरोचनः ॥ ४ ॥ तच्चाकर्ण्य वाङ्निमित्तज्ञः पितरि सुतरां जीविताशां शिथिलीचकार । गतेषु च भिषक्षु क्षतधृतिः क्षपामुखे क्षितिपालसमीपमेव पुनरारुरोह । तत्र च—'दाहं। महान् । आहर हारान्हंरिणि ! मणिदर्पणन्मे देहे देहि वैदेहि ! हिमलवैर्लिम्प ललाटं लीलावति ! घनसारक्षोदधूलीन्निधेहि धवलाक्षि ! निक्षिप चक्षुषी चन्द्रकान्तं कान्तिमति ! कपोले कलय इति । अष्टाङ्कमिति । उक्तं च—'कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान् । अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा तेषु संश्रिता ॥' इति । आयुर्वेदस्य वैद्यशास्त्रस्य । कोकश्चक्रवाकः । विरोचनो रविः । नत्र चेत्यादौ । तत्र च क्षितिपालसमीप इत्यादीन्मृत्यूकलापालापानाकर्ण्यनिशामनैपीदिति संबन्धः । घनसारः कर्पूरः । समान लालित, स्वभाव से ही अत्यन्त प्रखर बुद्धि से ठीक ठीक निदान के द्वारा व्याधि के स्वरूप को जान लेने वाला रसायन नाम का वैद्यकुमार चुपचाप मुँह नीचे करके डबडबाने लगा। तब राजकुमार ने पूछा—'मित्र रसायन, ठीक ठीक बताओ, क्या गड़बड़ी देखते हो ?' वह बोला—'देव, कल प्रातःकाल ठीक ठीक निवेदन करूँगा।' इसी बीच भवन की कमलिनियों के रक्षक पुरुष ने चक्रवाक पक्षी को आश्वासन देते हुए ऊँचे स्वर से अपरवक्त्र छन्द का गान किया— 'हे चक्रवाक, तू अपने मन को दृढ़ कर, शोक न कर एवं विवेक के मार्ग पर आ ; इस समय सूर्य कमल और सरोजिनी की श्री के साथ सुमेरु के शिखर पर पहुँच रहा है।' हर्ष ने यह सुना और तात्पर्य समझ कर पिताजी के जीने की प्रबल आशा को शिथिल कर दिया। वैद्यों के लौट जाने पर संध्या के समय हर्ष पिता के सामने फिर गए। वहाँ वे इस प्रकार बड़बड़ा रहे थे—'बड़ी तेज जलन है। हरिणी, हारों को ला। वैदेही, मेरे शरीर पर मणिदर्पण रख। लीलावती, ललाट पर बर्फ का जल छिड़क। धवलाक्षी, कपूर की धूल डाल। कान्तिमती, आँखों पर चन्द्रकान्त मणि रख । कलावती, कपोल पर

२७० हर्षचरितम् कुवलयं कलावति ! चन्दनचर्चां रचय चारुमति ! पाटय पटमारुतं पाटलिके ! मन्दय दाहमिन्दुमति ! अरविन्दैर्जनय जलार्द्राया मुदं मदिरा- वति ! समुपनय मृणालानि मालति ! तरलय तालवृन्तमावन्तिके ! मूर्धानं धावमानं बधान बन्धुमति ! कन्धरां धारय धारणिके ! उरसि सशीकरं करं कुरु कुरङ्गवति ! संवाह्य बाहू बलाहिके ! पीडय पादौ पद्मावति ! गृहाण गाढमङ्गमनङ्गसेने ! का वेला वर्तते विलासवति ! नैति निद्रा, कथाः कथय कुमुद्वति !' इत्येवंप्रायान्पितुरालापाननवरतमा- कर्णयन्दूयमानहृदयो दुःखदीर्घां जाग्रदेव निशामनैषीत् । उषसि चावतीर्य राजद्वारदेशोपसर्पिणा परिवर्धकेनोपस्थापितेऽपि तुरङ्गे चरणाभ्यामेवाजगाम स्वमन्दिरम् । तत्र च त्वरमाणो भ्रातुरागम- नार्थमुपर्युपरि क्षिप्रपातिनो दीर्घाध्वगानतिजविनश्चोष्ट्रपालान्प्राहिणोत् । प्रक्षालितवदनश्च परिजनेनोपनीतमपि प्रतिकर्म नागृहीत् । अग्रतः स्थितानां राजपुत्रयूनां विमनसां 'रसायनो रसायनः' इति जल्पितमव्य- पाटय पटुं कुरु । कन्धरां ग्रीवाम् । संवाहय मर्दय । कुमुद्वतीत्यादयः सुशब्दत्वा- त्साधवः । परिवर्धकोऽश्वपालः । प्रतिकर्म प्रसाधनम् । कार्त्तस्वरं हेम । तदपि ज्वलन- कुवलय फैला । चारुमती, चन्दन लगा। पाटलिके, कपड़े की हवा कर । इन्दुमती, जलन कम कर । मदिरावती, कमलों का ठंडा पंखा बना कर झल । मालती, मृणालों को जुटा । आवन्तिका, जोर से पंखा झल । बन्धुमती, उड़े जाते हुए मेरे मस्तक को पकड़ । धारणिके, कन्धे को सम्हाल । कुरङ्गवती, अपना भींगा हाथ मेरे वक्ष पर रख । बलाहिका, मेरी भुजाओं को दबा । पद्मावती, पैर दबा । अनङ्गसेना, जोर से मेरे अङ्गों को पकड़ । विलासवती, क्या समय हो रहा है ? कुमुद्वती, नींद नहीं आ रही है, कहानी सुना ।' इस प्रकार के आलाप सुनते हुए, दुःख के कारण बढ़ी हुई रात को जागते ही व्यतीत किया । प्रातःकाल होने पर धवलगृह से उतर कर राजद्वार तक आए । वहां अश्वपाल घोड़ा लिए उपस्थित था, फिर भी पैदल ही अपने मन्दिर को लौटे । वहां उन्होंने शीघ्रता से अपने भाई राज्यवर्धन को बुलाने के लिए तेज दौड़ने वाले दीर्घाध्वग संदेशहरों को और वेगगामी सांड़नी सवारों को ताबड़तोड़ दौड़ाया । मुंह धोने के बाद परिजनों द्वारा लाए गए भी प्रसाधन को ग्रहण नहीं किया । तभी आगे खड़े हुए शोक से भरे युवक -राजपुत्रों की 'रसायन रसायन' इस तरह की अस्पष्ट बातचीत सुनी और उनसे पूछा—

पञ्चम उच्छ्वासः २७१ क्तमश्रौषीत् । पर्यपृच्छच्च तान्—'भद्राः ! किं रसायन' इति । पृष्टाश्च ते सर्वे सममेव तूष्णींबभूवुः । भूयोभूयश्चानुबध्यमाना दुःखेन कथंकथमप्या- चचक्षिरे—'देव ! पावकं प्रविष्टः' इति । तच्च श्रुत्वा प्लुष्ट इवान्तस्तापेन सद्यो विवर्णतामगात् । उत्पाट्यमानमिव च न शशाक शोकान्धं धारयितुं हृदयम् । आसीच्चास्य चेतसि—कामं स्वयं न भवति न तु श्रावयत्यप्रियं वचनमरतिकरमितर इवाभिजातो जनः । कृच्छ्रे च यथानेनानुष्ठितमु- ज्ज्वलीकृतमधिकतरं ज्वलनप्रवेशेन कल्याणप्रकृति कार्त्तस्वरमिव कौलपुत्र- मस्येति । पुनश्चाचिन्तयत्—'समुचितमेवाथवा स्नेहस्येदम् । किमस्य तातो न तातः, किं वाऽम्बा न जननी, वयं न भ्रातरः । अन्यस्मिन्नपि तावत्स्वामिनि दुर्लभीभवति भवन्त्यसवो ध्रियमाणा ह्रीहेतवो लोके किमुतामृतमयेऽनुजीविनां निर्व्याजबान्धवेऽवन्ध्यप्रसादे सुगृहीतनाम्नि ताते । संप्रति सांप्रतमाचरितमनेनात्मानं दहता । किं वास्याकल्पमव- स्थितस्य स्थेयसो यशोमयस्य दह्यते पतितः स केवलं दहने । दग्धास्तु वयम् । धन्यः खल्वसावग्रणीः पुण्यभाजाम् । अपुण्यभाक्त्विदमेव राजकुलं प्रवेशेनाधिकतरमुज्ज्वलम् । सांप्रतं युक्तम् । अतिशयेन स्थिरं स्थेयस्तस्य । 'भद्र, रसायन की क्या बात है ?' इस प्रकार उनके पूछने पर सबके सब चुप हो गए । बार-बार पूछे जाने पर दुःख से किसी-किसी प्रकार उन सबों ने कहा—'देव, रसायन ने अग्नि में प्रवेश कर लिया ।' यह सुनते ही हृदय के सन्ताप से मानों जल कर फक् पड़ गए । शोक से अन्धभूत उखड़े हुए से अपने हृदय को वश में न रख सके । मन में सोचने लगे—'कुलीन व्यक्ति स्वयं नहीं रहना अच्छा समझता है, परन्तु नीच के समान अप्रिय और अरति उत्पन्न करने वाली बात मुंह से नहीं निकालता । क्लेश के अवसर में रसायन ने वही किया । अग्नि में प्रवेश करने से कल्याण से पूर्ण प्रकृति वाला उसका कुलपुत्र- भाव सुवर्ण के समान और भी निखर गया ।' हर्ष ने फिर सोचा—'अथवा यह उसके स्नेह के उचित ही है । पिता जी क्या उसके पिता नहीं ? मेरी माता क्या उसकी माता नहीं ? हम लोग क्या उसके भाई नहीं ? दूसरे भी मालिक जब इस प्रकार दुर्लभ होने लगते हैं तो उनके अनुजीवियों के द्वारा धारण किए गए प्राण संसार में लज्जा उत्पन्न करते हैं और फिर अमृत के समान, बिना छल-कपट के बांधव निष्फल न जाने वाली प्रसन्नता करने वाले, सुगृहीतनाम पिता जी की तो बात ही क्या ? उसने अपने आप को दग्ध करके बहुत ठीक किया । केवल अपने को अग्नि में डाल कर जो कल्पान्त तक अपने यशःशरीर से स्थिर हो गया, क्या जल गया ? जले तो हम लोग । पुण्यवानों में अग्रणी

कुलपुत्रेण यत्तादृशा वियुक्तम्। अपि च ममापि कः खल्वेतेषां प्राणानां कार्यातिभारः कृत्यशेषो वा, का वा व्यापृतता येन नाद्यापि निष्ठुराः प्राणाः प्रतिष्ठन्ते। को वान्तरायो हृदयस्य येन सहस्रधा न दलतीति। दुःखार्तश्च न जगाम राजसद्म। समुत्ससर्ज च सर्वकार्याणि। शयनीये निपत्योत्तरीयवाससा सोत्तमाङ्गमात्मानमवगुण्ठ्यातिष्ठत्। इत्थंभूते च देवे हर्षे राजनि च तदवस्थे सर्वस्यैव लोकस्य कपोलेषु कीलिता इव कराः, लोचनेषु लेप्यमय्य इवाश्रुस्रुतयः, नासाग्रेषु प्रथिता इव दृष्टयः, कर्णेत्कीर्णा इव रुदितध्वनयः, जिह्वासु सहजानीव हा कष्टानि, लपनेषु पल्लवितानीव श्वसितानि, अधरेषु लिखितानीव परिदेवि- तपदानि, हृदयेषु निधानीकृतानीव दुःखान्यभवन्। उष्णाश्रुदाहभीतेव नाभजत नेत्रोदराणि निद्रा। निःश्वासवातविधूता इव व्यलीयन्त हासाः। निरवशेषदग्धेव च संतापेन न प्रवर्तत वाणी। कथास्वपि नाश्रूयन्त परि- हासाः। काव्यगर्मांन्विति नाज्ञायन्त गीतगोष्ठ्यः। जन्मान्तरातीतानीव नास्मर्यन्त लास्यानि। स्वप्नेऽपि नागृह्णन्त प्रसाधनानि। वार्तापि नाल- व्यापृतता व्यग्रता। प्रष्ठा अग्रगामिनः। प्रतिष्ठन्ते प्रतिष्ठां कुर्वते। वह धन्य है। यह राजकुल ही अपुण्यवान् है जो उस प्रकार के कुलपुत्र स रहित हो गया। मेरे प्राणों को अब कौन सा काम का वोझ आ गया है या कौन काम बच गया है या कौन-सी व्यग्रता है जिससे आज ये निष्ठुर प्राण प्रस्थान नहीं करते। कौन-सा ऐसा बीच में विघ्न आ पड़ा है जो मेरे हृदय के हजार टुकड़े नहीं हो रहे हैं।' इस प्रकार दुःखार्त होने के कारण उस दिन राजभवन में नहीं गए और सब काम त्याग बैठे। केवल उत्तरीय वस्त्र से सिर तक अपने को ढंक कर पलंग पर पड़े रहे। इस प्रकार देव हर्ष के दुःखी होने पर और महाराज को उस अवस्था में पड़े देख कर लोगों का कष्ट बढ़ गया। वे कील के समान हाथ पर कपोल रख कर बैठ गए। उनकी आँखों से लेप के समान आँसू की धार बहने लगी। उनकी जीभ पर 'हा, क्या हो गया ?' यह आवाज सहज हो गई। मुंह में सांस उमड़ गई। अधरों पर विलाप के शब्द लिख गए। हृदय में दुःख ने घर कर लिया। निद्रा मानों गरम आँसू में जलने के डर से आँखों में नहीं आई। उनकी हँसी सांस की हवा से मानों उड़ कर विलीन हो गई। संताप से बिलकुल जल जाने के कारण उनकी वाणी मानों प्रवृत्त नहीं होती थी। गीत की गोष्ठियों मानों कहीं चली गईं। नृत्य के प्रसंग जन्मान्तर की अतीत वस्तु की भाँति स्मृति पर नहीं आते थे। स्वप्न में भी लोगों ने प्रसाधन ग्रहण नहीं किया। उपभोगों की

पञ्चम उच्छ्वासः २७३ भ्यतोपभोगानाम् । नामापि नाकीर्त्यताहारस्य । खपुष्पप्रतिमान्यासन्ना- पानमण्डलानि । लोकान्तरमिवानीयन्त बन्दिवाचः । युगान्तर इवावर्तन्त निर्वृतयः । पुनरिवादह्यत शोकाग्निना मकरकेतुः । दिवापि नामुच्यन्त शयनानि । शनैः शनैश्च महापुरुषविनिपातपिशुनाः समं समन्तात्समुद- भवन्भुवने भूयांसो भूपतेरभावाय भयमुत्पादयन्तो भूतानां महोत्पाताः । तथा हि डोलायमानसकलकुलाचलचक्रवाला पत्या सार्धं गन्तुकामेव प्रथममचलद्धरित्री । धान्वन्तरेरिवान्तरे तस्मिन्स्मरन्तः परस्परास्फालन- वाचालवीचयो विजघूर्णिरेऽर्णवाः । भूभृदभावभीतानां विततशिखिकलाप- विकटकुटिलाः केशपाशा इवोर्ध्वाबभूवुर्धूमकेतवः ककुभाम् । धूमकेतु- करालितदिङ्मुखं दिक्पालारब्धायुष्कामहोमधूमधूम्रमिवाभवद्भुवनम् । भ्रष्ट- भासि तप्तकालायसकुम्भबभ्रुणि भानुमण्डले भयंकरकबग्धकायव्याजेन कोऽपि पार्थिवप्राणितार्थी पुरुषोपहारमिवोपजहार । ज्वलितपरिवेषमण्ड- शिखी मयूरोऽपि । धूमकेतव उत्पातशंसिनः, अग्नयश्च । करालितानि भीषणी- कृतानि, व्याप्तानि च । बभ्रु कपिलम् । श्वेतभानुश्चन्द्रः । प्रसाधिता आवर्जिताः, बात तक नहीं चलती । भोजन का नाम भी नहीं लिया जाता । समीप के पानागार आकाश-पुष्प के समान हो गए । बन्दी जनों की बातें मानों परलोक पहुँच गईं । मानों सुख के युग ही बदल गए । मानों कामदेव शोक की अग्नि में फिर से जलने लगा । दिन में भी पलंग नहीं छोड़े जाते । शनैः शनैः राजा के अभाव व्यक्त करने से भय उत्पन्न करते हुए, महापुरुष के समाप्त होने की सूचना देने वाले महाभूतों के उपद्रव एक ही बार संसार में उत्पन्न हो गए । पहले पृथिवी मानों पति के साथ जाने की इच्छा से कुलपर्वतों को कम्पित करती हुई डोलने लगी । समुद्र मानों धन्वन्तरि के अभाव का स्मरण करते हुए परस्पर तरंगों के आघात-प्रत्याघात द्वारा विकलता से घूर्णित होने लगे । राजा के अभाव से डरी हुई दिशाओं के मोर के पंख के समान फैले हुए कुटिल केशपाश के रूप में धूमकेतु तारे आकाश में उठ गए । धूमकेतुओं से दिशाएं भीषण हो गईं, मानों सारे संसार में दिक्पालों ने राजा की आयु की कामना से जो यज्ञ किया उसी का धूम सर्वत्र फैल गया । सूर्य का मण्डल निष्प्रभ और तपे हुए लोहे के समान हो गया, मानों किसी ने सिर कट जाने पर छटपटाते हुए शरीर के व्याज से राजा के जीवन की कामना से पुरुष का बलिदान किया हो । चन्द्रमण्डल का घेरा चारों ओर से जलने लगा, मानों १८ ह० च०

२७४ हर्षचरितम् लाभोगभास्वरो जिघृक्षाजृम्भमाणस्वर्भानुभयादुपरचिताग्निप्राकार इव प्रत्यदृश्यत श्वेतभानुः। अवनिपतिप्रतापप्रसाधिताः प्रथमतरकृतपावकप्रवेशा इवादह्यन्तानुरक्ता दिशः । क्षतशोणितशीकरासारारुणिततनुरनुमरणाय पर्याकुला प्रावृतपाटलांशुकपटेवाहश्यत वसुधावधूः । नराधिपविनाश- संभ्रमभीतैर्लोकपालैरिव कालायसकवाटपुटैरकालकालमेघपटलैररुध्यन्त दिग्द्वाराणि । प्रेतपतिप्रयाणप्रहताः पटवः पटहा इवारटन्तो हृदयस्फोटनाः पस्फायिरे निपतां निर्घातानां घोरा घननिर्घोषाः । निकटीभवद्यम- महिषखुरपुटोद्धूता इव द्युमणिधाम धूसरीचक्रुः क्रमेलककचकपिलाः पांशु- वृष्टयः । विरसविराविणीनामुन्मुखीनां शिखिनो ज्वालाः प्रतीच्छन्त्य इव पतन्तीरुल्का नभसो बवाशिरे शिवानां राजयः । राजधामनि धूमायमान- कबरीविभागविभावितविकाराः प्रकीर्णकेशपाशप्रकाशितशोका इव प्राका- शन्त प्रतिमाः कुलदेवतानाम् । उपसिंहासनमाकुलं कालरात्रिविधूयमान- वृजिनवेणीबन्धविभ्रमं बिभ्राणं बभ्राम भ्रामरं पटलम् । अटतामन्तःपुर- स्योपरि क्षणमपि न शशाम व्याक्रोशी वायसानाम् । श्वेतातपत्रमण्डल- भूषिताश्च । कचाः केशाः । शिवानां मृगादीनाम् । कबरीशब्देनात्र कचा लक्ष्यन्ते । व्याक्रोशी परस्पराह्नानशब्दः । वायसानां काकानाम् । चन्द्रमा ने पकड़ने की तैयारी में जंभाई लेत हुए राहु के डर से अपनी रक्षा के लिए अग्नि की दीवार खड़ी कर दी हो। अनुराग से भरी हुई दिशाओं ने राजा के प्रताप में अपने को प्रसाधित करके मानों पहले ही अग्निप्रवेश कर लिया और जलने लगीं। पृथिवी रूपी वधू बहती हुई रक्त की धारा से लाल होकर अनुमरण के लिए लाल वस्त्र पहन कर तैयार हुई-सी प्रतीत होने लगी। राजा के विनाश से अकस्मात् डरे हुए लोकपालों ने असमय में लोहे के किवाड़ों के समान काले-काले मेघों के रूप में मानों दिशाओं के द्वार बन्द कर दिए। हृदय को तोड़ देने वाले अन्तरिक्ष से उत्पन्न वायु के घोर आघातजन्य शब्द इस प्रकार बढ़ गए मानों राजा को लेने के लिए प्रस्थान के अवसर पर पटह बजाए जा रहे हों। आकाश में ऊँट के रोंगटे के समान वर्ण वाली धूल मानों राजा के निकट आते हुए यमराज के भैंसों के खुरों से उड़ कर सूर्यमण्डल को धूसर करने लगी। सियारियां आकाश की ओर मुंह करके जोर-जोर से चिल्लाने लगीं, मानों अग्नि की ज्वाला के रूप में आकाश से गिरती हुई उल्काओं की प्रतीक्षा कर रही हों। राजमन्दिर में धुँवे के समान बाल बिखर रहे थे मानों कुल- देवताओं की प्रतिमाएं अपने केशपाश को बिखेर कर अपना शोक प्रकट कर रही हों।

पञ्चम उच्छ्वासः २७५ मध्याज्जीवितमिव राज्यस्य सरसपिशितपिण्डलोहितं चञ्च्चच्चञ्चुरुच्चैरुत्खनन् खण्डं माणिक्यस्य कूजज्जरद्गृध्रो महोत्पातदूयमानश्च कथमपि निनाय निशाम् । अन्यस्मिन्नहनि समीपमस्य राजकुलाद्द्रुतगतिवशविशीर्यमाणा- लंकारझांकारिणी विजयघोषयेव विषादस्याकुलचरणचलत्तुलाकोटिकणि- तवाचालिताभिरुद्ग्रीवाभिः, किं किमेतदिति पृच्छ्यमानेव दूरादेव भव- नहंसीभिः, स्खलितविशालश्रोणिशिञ्जानरशनानुराविणीभिश्च बाष्पान्धा समुपदिश्यमानमार्गेव गृहसारसीभिः अदृष्टकवाटपट्टसंघट्टस्फुटितललाट- पट्टरुधिरपटलेन पटान्तेनेव रक्तांशुकस्य मुखमाच्छाद्य प्ररुदती, संताप- बलविलीनकनकवलयरसधारामिव वेत्रलतामुत्सृजन्ती, मुखमरुत्तरङ्गिता- अन्यस्मिन्नित्यादौ । समीपस्था यशोमत्यः प्रतीहार्याजगामेति संबन्धः । तुलाकोटिनूपुरम् । चीरचीवरं वृक्षत्वक्, चीरवासः । भौंरे राजसिंहासन के पास केशपाश के रूप में मँडराने लगे, मानों कालरात्रि चँवर झलने लगी हो । अन्तःपुर के ऊपर-ऊपर उड़ते हुए कौवों की कांव-कांव क्षण भर भी बंद न हुई । कर्राता हुआ गीध श्वेत आतपत्र के बीच जड़े हुए राज्य के प्राण के समान माणिक्य को खून से लाल मांस का लोथा समझ कर उखाड़ ले भागा । इस प्रकार के भयंकर उत्पातों से दुखी होकर हर्ष ने किसी प्रकार रात बिताई । दूसरे दिन वेत्रा नाम की यशोमती की प्रतीहारी राजकुल से हर्ष के समीप पहुंची । तेज दौड़ने के कारण उसके अलंकार टूट-टूट कर झन-झना रहे थे, मानों विषाद की विजय-घोषणा होने लगी । उसके अस्तव्यस्त नूपुर की आवाज सुन कर भवन की हंसियाँ गर्दन उठाकर टर्राने लगीं, मानों 'क्या बात है ? क्या बात है ?' यह उससे पूछ रही हों । बाष्प से उस की आँखें भर गई थीं, जब वह गिर पड़ती तो उसकी विशाल श्रोणि में लगी हुई करधनी बज उठती और उस आवाज से गृहसारसियाँ जोर से चिल्लाने लगीं, मानों उसे रास्ता बता रही हों । आगे न देखने के कारण किवाड़ से टक्कर खा जाने से उसके ललाट से रक्त की धारा बह रही थी, मानों रक्तां- शुक के अग्र भाग से मुंह ढंक कर रो रही हो । संताप के कारण उसके हाथ के कनक- वलय की रसधारा ही मानों वेत्रलता के रूप में हाथ से छूट गई । श्वास की हवा से उड़कर फहराते हुए अपने उत्तरीय को उस प्रकार समेटती जा रही थी जैसे सर्पिणी अपने केंचुल को सम्भालती है। उसके झुके हुए कंधे पर केशपाश, जो शोक के अवसर

२७६ हर्षचरितम् मुत्तरीयांशुकपटीं स्फुरन्तीं फणिनीव निर्मोकमञ्जरीमाकर्षन्ती, नम्रांससं- सिनानिलविलोलेन नीलतमेन तमालपल्लवचीरचीवरेणेव शोकोचितेन धम्मिल्लरचनारहितेन शिरोरुहसंचयेन चञ्चता प्रावृतकुचा, कुचताडन- पीडया समुच्छूनाताम्रश्यामतलं मुहुर्मुहुरुष्णाश्रुप्रमार्जनप्रदग्धमिव कर- किसलयं धुनाना, चक्षुर्निर्भरै शीर्यति स्नापयन्तीव शोकाग्निप्रवेशाय स्व- कपोलतलप्रतिबिम्बितमासन्नलोकं, लोललोचनप्रवृत्तैस्तर लैस्तारकांशुभिः श्यामायमानमात्मदुःखेन दिवसमपि दहन्तीव 'क्व कुमारः क्व कुमारः ?' इति प्रतिपुरुषं पृच्छन्ती, वेलेति नाम्ना यशोमत्यः प्रतीहार्यजगाम । विषण्णलोकलोचनप्रत्युद्गता चोपसृत्य कुट्टिमन्यस्तहस्तयुगला गलन्तीभिः सिञ्चन्तीव शुष्यन्तं दशनदीधितिधाराभिराधूसरमधरामधोमुखी विज्ञापि- तवती - 'देव ! परित्रायस्व परित्रायस्व । जीवत्येव भर्तरि किमप्यध्यव- सितं देव्या' इति । ततस्तदपरमाकर्ण्य च्युत इव सत्त्वेन, द्रुत इव दुःखेन, आचान्त इव चिन्तया, तुलित इव तापेन, अङ्गीकृत इवाङ्गेनाप्रतिपत्तिरासीत् । आसी- श्चास्य चेतसि - प्रतिपन्नसंज्ञस्य बहुशोऽपि हृदये दुःखाभिषङ्गो निपतन्न- अप्रतिपत्तिः किंकर्तव्यतामूर्खः । हृदयेऽतिकठिने । के अनुकूल एवं बनाव-सिंगार से रहित था, खुलकर नीले तमालपल्लव के उत्तरीय के समान स्तनों पर लटक आया था । स्तनों पर पीटने से उसका हाथ लाल हो गया था, मानों बार-बार अत्यन्त गरम आँसुओं के पोंछने से जल गया हो । शोक की अग्नि में प्रवेश करने के लिए अपने कपोलतल पर प्रतिबिम्बित होते हुए समीप के लोंगो को वह मानों अपने आँसुओं की धारा में नहला रही थी । चंचल आँखों के तारों से निकलती हुई किरणों से श्याम वर्ण के दिन को भी मानों दग्ध कर रही थी । 'कुमार कहाँ हैं ? कुमार कहाँ हैं ?' यह प्रत्येक से पूछ रही थी । विषाद में पड़े हुए लोगों की आँखें उसकी ओर लग गईं । समीप में आकर वह कुट्टिम पर हाथ रखकर अपने दाँतों की किरण- धारा से सुखाए हुए अधर को सींचती हुई-सी मुंह नीचा किए हुए बोली- 'देव, बचाओ- बचाओ । पति के जीते जी देवी कुछ करने जा रही हैं।' शोक के उस दूसरे कारण को सुनकर कुमार हर्ष किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए, मानों सत्त्व से च्युत, दुःख से द्रुत, चिन्ता से निपीत, ताप से लघुभूत और आतंक से आक्रान्त हो गये।

पञ्चम उच्छ्वासः २७७ श्मनीव लोहप्रहारः कठिने हुतभुजमुत्थापयति न तु भस्मसात्करोति मे निरनुक्रोशस्य कायम्' इति । उत्थाय च त्वरमाणोऽन्तःपुरमगात् । तत्र च मर्तुमुद्यतानां राजमहिषीणामशृणोद्दूरादेव 'तात चूत ! चिन्तयात्मानं प्रवसति ते जननी । वत्स जातीगुच्छ ! गच्छाम्यापृच्छस्व माम् । मया विनाद्यनाथा भवसि भगिनि भवनदाडिमलते ! रक्ताशोक ! मर्षणीयाः पादप्रहाराः कर्णपूरपल्लवभङ्गापराधाश्च । पुत्रक ! अन्तःपुरबालबकुलक वारुणीगण्डूषग्रहणदुर्ललित ! दृष्टोऽसि । वत्से प्रियङ्गुलतिके ! गाढमा- लिङ्ग मां दुर्लभा भवामि ते । भद्र भवनद्वारसहकार ! दातव्यो निवा- पतोयाञ्जलिरपत्यमसि । भ्रातः पञ्जरशुक ! यथा न विस्मरसि माम्, किं व्याहरसि दूरीभूतास्मि ते ? शारिके ! स्वप्ने नः समागमः पुनर्भु- यात् । मातः ! मार्गलग्नं कस्य समर्पयामि गृहमयूरकम् ? अम्ब ! सुत- वल्लालनीयमिदं हंसमिथुनं मन्दपुण्यया मया न संभावितोऽस्य चक्रवाक- युगलस्य विवाहोत्सवः । मातृवत्सले ! निवर्तस्व गृहहरिणिके ! समुपनय अनुक्रोशो दया। तत्रेत्यादौ राजमहिषीणामित्येवंप्रायानालापानशृणोदिति संबन्धः। आपृच्छस्व ज्योत्कुरु । वारुणी सुरानिवापो मृतमुद्दिश्य दीयते जलादिकम् । उन्होंने अपने मन में सोचा—'कठोर पत्थर पर जैसे लोहे का प्रहार पड़कर अग्नि उत्पन्न कर देता है उसी प्रकार संज्ञावान् मेरे कठिन हृदय पर बहुत प्रकार के इन दुःखों का आघात अग्नि उत्पन्न कर देता है, पर निष्ठुर मेरे शरीर को जलाकर राख नहीं कर देता । वे उठकर शीघ्रता से अन्तःपुर में पहुंचे और वहाँ दूर ही से मरणोद्यत राजमहिषियों की बाते सुनीं —'तात चूत, तू अपनी चिन्ता कर, तेरी जननी प्रवास कर रही है। वत्स जातीगुच्छ, जाती हूं, बिदा दो । बहन दाड़िमलता, मेरे बिना तू आज अनाथ हो रही है। रक्ताशोक, जो मेरे चरण-प्रहार हैं और कर्णपूर बनाने के लिये तुम्हारे पल्लव तोड़े हैं उन अपराधों को माफ करना । हे प्रियपुत्र, अन्तःपुर के छोटे बकुल, मदिरा के गण्डूष लेने में दुर्ललित, अब तेरा अन्तिम दर्शन है। वत्सा प्रियंगुलतिका, मुझे कसकर अंकवार ले, दुर्लभ हो रही हूँ । हे भद्र भवनद्वार के सहकार, तुझे मैंने अपत्य समझा है, जलाञ्जलि देना । भाई पञ्जरशुक, मुझे भूलना मत, क्या कह रहे हो ? मैं दूर जा रही हूँ । शारिके, स्वप्न में हमारा-तुम्हारा मिलन होगा । हाय मा, रास्ता रोके हुए गृहमयूर को किसे समर्पित कर जाऊँ ? अंबे, पुत्र के समान हंस के इस जोड़े को पालना । मन्दपुण्य वाली मैं चक्रवाक के जोड़े का विवाहोत्सव न रचा सकी । मातृवत्सले गृह हरिणिके, लौट जाओ । हे कंचुकी, प्यारी वीणा को लाओ तब तक उसे आलिङ्गन कर

२७८ हर्षचरितम् सौविदल्ल ! वल्लभबल्लकीं परिष्वजे तावदेनाम् । चन्द्रसेने ! सुदृष्टः क्रिय- तामयं जनः । बिन्दुमति ! इयं तेऽन्त्या वन्दना । चेटी ! मुञ्च चरणौ । आर्ये कत्यायनिके ! किं रोदिषि नीतास्मि दैवेन । तात कञ्चुकिन् ! किं मामलक्षणां प्रदक्षिणीकरोषि । धात्रेयि ! धारयात्मानं किं पादयोः पतसि । भगिनि ! गृहाण मामपश्चिमां कण्ठे । कष्टं न दृष्टा प्रियसखी मलयवती । कुरङ्गवति ! अयमामन्त्रणाञ्जलिः । सानुमति ! अयमन्त्यः प्रमाणः । कुवलयवति ! एष तेऽवसानपरिष्वङ्गः । सख्यः ! क्षन्तव्याः प्रणयकलहाः,' इत्येवंप्रायानालापान् । दह्यमानश्रवणश्च तैः प्रविशन्नेव निर्यान्तीं दत्तसर्वस्वापतेयां गृहीतम- रणप्रसाधनाम् , जानकीमिव जातवेदसं पत्युः पुरः प्रवेद्यन्तीम् , प्रत्य- ग्रस्नानाद्र्देहतया श्रियमिव भगवतीं सद्यः समुद्रादुत्थिताम् , कुसुम्भवभ्रुणी वाससी दिवमिव तेजसी सांध्ये दधानाम् , ताम्बूलदिग्धरागान्धकाराध- रप्रभापटपाटलं पट्टांशुकमिव विधवामरणचिह्नमङ्गलमुद्वहन्तीम् , रक्त- कण्ठसूत्रेण कुचान्तरावलम्बिना स्फुटितहृदयविगलितरुधिरधाराशङ्कां लूँ। चन्द्रसेना, इस जन को जी भर के देख ले। बिन्दुमती, यह तेरे प्रति आखिरी वन्दन। है। चेटी, मेरे पैर छोड़ दे। आर्ये कात्यायनिके, क्यों रो रही हैं? दैव मुझे ले जा रहा है। तात कञ्चुकिन्, मुझ अभागिन को क्यों घेर रहे हो? धात्रेयी, तू सम्भल, क्यों मेरे पैर पड़ती है? भगिनी, फिर लौट कर न आने वाली मेरे कण्ठ में लग जा । हाय, प्रिय सखी मलयवती को नहीं देखा। कुरङ्गवती, यह प्रस्थान की हथजोरी है। सानुमती, यह अन्तिम प्रणाम है। कुवलयवती, यह अन्त का आलिङ्गन है। सहेलियों, प्रेम के झगड़ों को क्षमा करना।' इन बातों से कुमार के कान जलने लगे । प्रवेश करते हुए उन्होंने निकलती हुई माता यशोमती को देखा। उसने अपने सुहाग के चिह्न अर्पित कर दिये थे और अनुमरण के लिए श्रृङ्गार कर चुकी थी। सीता के समान पति के सामने अग्नि में प्रवेश करने के लिए तत्पर थी। तुरत किये गए स्नान से उसकी देह आर्द्र थी, मानों समुद्र से तुरत निकली हुई भगवती लक्ष्मी हों। आकाश जैसे संध्याकाल में तेज धारण करता है उसी प्रकार उसने कुसुम्भी रङ्ग के दो वस्त्रों को धारण किया था। पान की गाढ़ी लाली से युक्त उसके अधर की प्रभा से लाल पटांशुक को मानों उसने अङ्ग में लगे हुए विधवा के मरने के चिह्न को धारण किया था। उसका लाल कण्ठसूत्र कुचों के बीच लटक रहा था, उससे उसके फटे हुए हृदय से प्रवाहित रुधिरधारा की शंका उत्पन्न हो रही थी। टेढ़ी कुण्डल के

पञ्चम उच्छ्वासः २७६ कुर्वन्तीम्, तिर्यक्कुटिलकुण्डलकोटिकण्टकाकृष्टतन्तुना हारेण बलितेन सितांशुकपाशेनेव कण्ठमुत्पीडयन्तीम्, सरसकुङ्कुमाङ्गरागतया कवलिता- मिव दिधक्षता चितार्चिष्मता, चितानलार्चनकुसुमैरिव धवलधवलैर- श्रुबिन्दुभिरंशुकोत्सङ्गमापूरयन्तीम्, गृहदेवतामन्त्रणबलिमिव वलयै- र्विगलद्भिः पदे पदे विकिरन्तीमाप्रपदीनाम्, कण्ठे गुणकुसुममालां यम- दोलामिवारूढाम्, अन्तर्गुञ्जन्मंधुकरमुखरेणामन्त्र्यमाणलोचनोत्पलामिव कर्णोत्पलेन, प्रदक्षिणीक्रियमाणमिव मणिनूपुरबन्धुभिरुद्धमण्डलं भ्रम- द्भिर्भवनहंसैः, संनिहितप्राणसमं मरणाय चित्तमिव चित्रफलकमविचलं धारयन्तीम, अर्चाबद्धोद्भूयमानधवलपुष्पदामकां, पतिव्रतापताकामिव पतिप्रासयष्टिमिष्टामुपगूहमानाम्, बन्धोरिव निजचारित्रस्य धवलस्य नृपातपत्रस्य पुरो नेत्रोदकमुत्सृजन्तीन, पत्युः पादपतनसमुद्गमदभ्य- धिकबाष्पाम्भःप्रवाहप्रतिरुद्धदृशः कथमपि प्रतिपन्नादेशान्सचिवान्संदि- शन्तीम्, अनुनयनिवर्तितविधुरवृद्धबन्धुवर्गवर्धमानध्वनिभिर्गृहाक्रन्दैरा- कृष्यमाणश्रवणाम्, भर्तृभाषितनिभैः पञ्जरसिंहबृंहितैर्ह्रियमाणहृदयाम्, धात्र्या भर्तृभक्त्या च निजया प्रसाधिताम्, मूर्च्छया जरत्या च संस्तुतया अग्रभाग का सूची में उसके हार का सूत्र फँस गया था, मानों सफेद वस्त्र कं फाँस से वह अपना गला दबा रही थी । उसके अङ्गों में कुङ्कुम का सरस अङ्गराग लगा था, मानों जलाने के लिये चिता की अग्नि उसे कवलित कर रही थी । मानों चिता की अग्नि के पूजन के लिये सफेद पुष्प के समान अपने आँसू की बूँद से आँचल भर रही थी । उसके वलय पदे पदे गिरते जा रहे थे, मानों गृहदेवता के आमन्त्रण की बलि छोड़ती जा रही थी । उसके कण्ठ में फूलमाला पैर तक लटक रही थी, मानों यमराज की दोला पर चढ़ी हो । उसके कर्णोत्पल के भीतर भौंरे गुञ्जार रहे थे, मानों लोचनोत्पल से विदा ले रहीं हो । उसके मणिनूपुर की आवाज के साथ भवन-हंस चारों ओर घूम कर मानों उसकी प्रदक्षिणा करने लगे । वह चित्रफलक को जिसमें पति का चित्र था, मरण के लिये चित्त के रूप में दृढ़ता से धारण किये थी । पति की प्रासयष्टि (कुन्त नामक अस्त्र ) को जिसमें पूजा के लिये बँधी हुई सफेद फूल की माला लटक रही थी, पतिव्रता की पताका के समान उसे वह धारण कर रही थी । अपने उज्ज्वल चारित्र्य के भाई के समान राजकीय आतपत्र के आगे आँसू टपका रही थी। पति के चरणों पर गिरने से निकलते हुये बाष्प- जल के प्रवाह से भरी आँखों वाली अपने आज्ञाकारी मन्त्रियों को किसी प्रकार सन्देश दे रही थी । अनुनय विनय करके लौटाये गए, वियोग से दुःखी अपने बड़े-बूढ़े बाँधवजनों

२८० हर्षचरितम् धार्यमाणाम्, सख्या पीडया च व्यसनसंगतया समालिङ्गिताम्, परि- जनेन संतापेन च गृहीतसर्वावयवेन परीताम्, कुलपुत्रोच्छ्वसितैश्च मह- त्तरैरधिष्ठिताम्, कञ्चुकिभिर्दुःखैश्चातिवृद्धैरनुगताम्, भूपालवल्लभानकौले- यकानपि सास्रमालोकयन्तीम्, सपत्नीनामपि पादयोः पतन्तीम्, चित्र- पुत्रिकामप्यामन्त्रयमाणाम्, गृहपत्रिणामप्यञ्जलिं पुरस्तादुपारचयन्तीम्, पशूनप्यापृच्छ्यमानाम्, भवनपादपानपि परिष्वज्यमानां मातरं ददर्श । दूरादेव च बाष्पायमाणदृष्टिरभ्यधात्—'अम्ब ! त्वमपि मां मन्दपुण्यं त्यजसि ? प्रसीद, निवर्तस्व' इत्यभिदधान एव च सस्नेहमिव नूपुरमणि- मरीचिभिश्चुम्ब्यमानचूडश्चरणयोर्न्यपतत् । देवी तु यशोमती तथा तिष्ठति पादनिहितशिरसि विमनसि कनीयसि प्रेयसि तनये गुरुणा गिरिशोद्वे- गावेगेनावष्टभ्यमाना, मूर्च्छान्धतमसं रसातलमिव विशन्ती, बाष्पप्रवा- आपृच्छ्यमाना ज्योत्कारयन्ती । बाष्पायमाणा बाष्पमुद्वमन्ती । देवी बाष्पोत्पतनं धारयितुं न शशाकेति के रोने से बढ़ी हुई घर की कराह भरी आवाज से उसके कान खिंचे जा रहे थे। पति की आवाज के समान दहाड़ते हुये, पिंजड़े के शेरों की गरज सुनने में उसका हृदय मुग्ध हो रहा था। धात्री और पतिभक्ति उसे प्रसाधित कर रही थीं। वृद्धा और मूर्च्छा उसे सम्हाल रही थीं। दुःख में सहायता के लिये आई हुई सखी और पीड़ा दोनों ने उसका आलिङ्गन किया था। परिजन और सन्ताप ने रमके सारे अवयवों को पकड़ कर घेर लिया था। वह महत्तर कुलपुत्रों के उच्छ्वास और बड़े लोगों से अधिष्ठित, एवं अतिवृद्ध कंचुकी और दुःखों से अनुगत थी। वह राजा के प्रिय कुत्तों को भी हसरत-भरी निगाह से देख रही थी। सपत्नियों के भी पैर पड़ती थी। चित्र की पुतली से भी विदा ले रही थी। भवन के पक्षियों के भी आगे हाथ जोड़ती थी। पशुओं से भी विदा ले रही थी। भवन के वृक्षों को भी अंकवार रही थी। दूर से ही भरी आँखों वाले कुमार ने कहा-‘माँ, तुम भी मुझ मन्दभाग्य को छोड़ रही हो ? कृपाकर इस विचार से निवृत्त होओ। यह कहते हुए स्नेह से विह्वल होकर नूपुर- मणियों की किरणों से मस्तक का स्पर्श करते हुये माता के पैरों पर गिर गये। देवी यशोमती उस प्रकार पैर पर माथा टेके हुये व्याकुल अपने छोटे प्रिय पुत्र को देखकर पर्वत के समान भारी उद्वेग के आवेग से अभिभूत हो गयी; पाताल के समान मूर्च्छा के घोर अन्धकार में प्रवेश करने लगी; आँसू के प्रवाह के समान देर तक रोक रखने से