भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 506 में से

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पृष्ठ 325

२८० हर्षचरितम् धार्यमाणाम्, सख्या पीडया च व्यसनसंगतया समालिङ्गिताम्, परि- जनेन संतापेन च गृहीतसर्वावयवेन परीताम्, कुलपुत्रोच्छ्वसितैश्च मह- त्तरैरधिष्ठिताम्, कञ्चुकिभिर्दुःखैश्चातिवृद्धैरनुगताम्, भूपालवल्लभानकौले- यकानपि सास्रमालोकयन्तीम्, सपत्नीनामपि पादयोः पतन्तीम्, चित्र- पुत्रिकामप्यामन्त्रयमाणाम्, गृहपत्रिणामप्यञ्जलिं पुरस्तादुपारचयन्तीम्, पशूनप्यापृच्छ्यमानाम्, भवनपादपानपि परिष्वज्यमानां मातरं ददर्श । दूरादेव च बाष्पायमाणदृष्टिरभ्यधात्—'अम्ब ! त्वमपि मां मन्दपुण्यं त्यजसि ? प्रसीद, निवर्तस्व' इत्यभिदधान एव च सस्नेहमिव नूपुरमणि- मरीचिभिश्चुम्ब्यमानचूडश्चरणयोर्न्यपतत् । देवी तु यशोमती तथा तिष्ठति पादनिहितशिरसि विमनसि कनीयसि प्रेयसि तनये गुरुणा गिरिशोद्वे- गावेगेनावष्टभ्यमाना, मूर्च्छान्धतमसं रसातलमिव विशन्ती, बाष्पप्रवा- आपृच्छ्यमाना ज्योत्कारयन्ती । बाष्पायमाणा बाष्पमुद्वमन्ती । देवी बाष्पोत्पतनं धारयितुं न शशाकेति के रोने से बढ़ी हुई घर की कराह भरी आवाज से उसके कान खिंचे जा रहे थे। पति की आवाज के समान दहाड़ते हुये, पिंजड़े के शेरों की गरज सुनने में उसका हृदय मुग्ध हो रहा था। धात्री और पतिभक्ति उसे प्रसाधित कर रही थीं। वृद्धा और मूर्च्छा उसे सम्हाल रही थीं। दुःख में सहायता के लिये आई हुई सखी और पीड़ा दोनों ने उसका आलिङ्गन किया था। परिजन और सन्ताप ने रमके सारे अवयवों को पकड़ कर घेर लिया था। वह महत्तर कुलपुत्रों के उच्छ्वास और बड़े लोगों से अधिष्ठित, एवं अतिवृद्ध कंचुकी और दुःखों से अनुगत थी। वह राजा के प्रिय कुत्तों को भी हसरत-भरी निगाह से देख रही थी। सपत्नियों के भी पैर पड़ती थी। चित्र की पुतली से भी विदा ले रही थी। भवन के पक्षियों के भी आगे हाथ जोड़ती थी। पशुओं से भी विदा ले रही थी। भवन के वृक्षों को भी अंकवार रही थी। दूर से ही भरी आँखों वाले कुमार ने कहा-‘माँ, तुम भी मुझ मन्दभाग्य को छोड़ रही हो ? कृपाकर इस विचार से निवृत्त होओ। यह कहते हुए स्नेह से विह्वल होकर नूपुर- मणियों की किरणों से मस्तक का स्पर्श करते हुये माता के पैरों पर गिर गये। देवी यशोमती उस प्रकार पैर पर माथा टेके हुये व्याकुल अपने छोटे प्रिय पुत्र को देखकर पर्वत के समान भारी उद्वेग के आवेग से अभिभूत हो गयी; पाताल के समान मूर्च्छा के घोर अन्धकार में प्रवेश करने लगी; आँसू के प्रवाह के समान देर तक रोक रखने से

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