भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पञ्चम उच्छ्वासः २७६ कुर्वन्तीम्, तिर्यक्कुटिलकुण्डलकोटिकण्टकाकृष्टतन्तुना हारेण बलितेन सितांशुकपाशेनेव कण्ठमुत्पीडयन्तीम्, सरसकुङ्कुमाङ्गरागतया कवलिता- मिव दिधक्षता चितार्चिष्मता, चितानलार्चनकुसुमैरिव धवलधवलैर- श्रुबिन्दुभिरंशुकोत्सङ्गमापूरयन्तीम्, गृहदेवतामन्त्रणबलिमिव वलयै- र्विगलद्भिः पदे पदे विकिरन्तीमाप्रपदीनाम्, कण्ठे गुणकुसुममालां यम- दोलामिवारूढाम्, अन्तर्गुञ्जन्मंधुकरमुखरेणामन्त्र्यमाणलोचनोत्पलामिव कर्णोत्पलेन, प्रदक्षिणीक्रियमाणमिव मणिनूपुरबन्धुभिरुद्धमण्डलं भ्रम- द्भिर्भवनहंसैः, संनिहितप्राणसमं मरणाय चित्तमिव चित्रफलकमविचलं धारयन्तीम, अर्चाबद्धोद्भूयमानधवलपुष्पदामकां, पतिव्रतापताकामिव पतिप्रासयष्टिमिष्टामुपगूहमानाम्, बन्धोरिव निजचारित्रस्य धवलस्य नृपातपत्रस्य पुरो नेत्रोदकमुत्सृजन्तीन, पत्युः पादपतनसमुद्गमदभ्य- धिकबाष्पाम्भःप्रवाहप्रतिरुद्धदृशः कथमपि प्रतिपन्नादेशान्सचिवान्संदि- शन्तीम्, अनुनयनिवर्तितविधुरवृद्धबन्धुवर्गवर्धमानध्वनिभिर्गृहाक्रन्दैरा- कृष्यमाणश्रवणाम्, भर्तृभाषितनिभैः पञ्जरसिंहबृंहितैर्ह्रियमाणहृदयाम्, धात्र्या भर्तृभक्त्या च निजया प्रसाधिताम्, मूर्च्छया जरत्या च संस्तुतया अग्रभाग का सूची में उसके हार का सूत्र फँस गया था, मानों सफेद वस्त्र कं फाँस से वह अपना गला दबा रही थी । उसके अङ्गों में कुङ्कुम का सरस अङ्गराग लगा था, मानों जलाने के लिये चिता की अग्नि उसे कवलित कर रही थी । मानों चिता की अग्नि के पूजन के लिये सफेद पुष्प के समान अपने आँसू की बूँद से आँचल भर रही थी । उसके वलय पदे पदे गिरते जा रहे थे, मानों गृहदेवता के आमन्त्रण की बलि छोड़ती जा रही थी । उसके कण्ठ में फूलमाला पैर तक लटक रही थी, मानों यमराज की दोला पर चढ़ी हो । उसके कर्णोत्पल के भीतर भौंरे गुञ्जार रहे थे, मानों लोचनोत्पल से विदा ले रहीं हो । उसके मणिनूपुर की आवाज के साथ भवन-हंस चारों ओर घूम कर मानों उसकी प्रदक्षिणा करने लगे । वह चित्रफलक को जिसमें पति का चित्र था, मरण के लिये चित्त के रूप में दृढ़ता से धारण किये थी । पति की प्रासयष्टि (कुन्त नामक अस्त्र ) को जिसमें पूजा के लिये बँधी हुई सफेद फूल की माला लटक रही थी, पतिव्रता की पताका के समान उसे वह धारण कर रही थी । अपने उज्ज्वल चारित्र्य के भाई के समान राजकीय आतपत्र के आगे आँसू टपका रही थी। पति के चरणों पर गिरने से निकलते हुये बाष्प- जल के प्रवाह से भरी आँखों वाली अपने आज्ञाकारी मन्त्रियों को किसी प्रकार सन्देश दे रही थी । अनुनय विनय करके लौटाये गए, वियोग से दुःखी अपने बड़े-बूढ़े बाँधवजनों