भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 323

२७८ हर्षचरितम् सौविदल्ल ! वल्लभबल्लकीं परिष्वजे तावदेनाम् । चन्द्रसेने ! सुदृष्टः क्रिय- तामयं जनः । बिन्दुमति ! इयं तेऽन्त्या वन्दना । चेटी ! मुञ्च चरणौ । आर्ये कत्यायनिके ! किं रोदिषि नीतास्मि दैवेन । तात कञ्चुकिन् ! किं मामलक्षणां प्रदक्षिणीकरोषि । धात्रेयि ! धारयात्मानं किं पादयोः पतसि । भगिनि ! गृहाण मामपश्चिमां कण्ठे । कष्टं न दृष्टा प्रियसखी मलयवती । कुरङ्गवति ! अयमामन्त्रणाञ्जलिः । सानुमति ! अयमन्त्यः प्रमाणः । कुवलयवति ! एष तेऽवसानपरिष्वङ्गः । सख्यः ! क्षन्तव्याः प्रणयकलहाः,' इत्येवंप्रायानालापान् । दह्यमानश्रवणश्च तैः प्रविशन्नेव निर्यान्तीं दत्तसर्वस्वापतेयां गृहीतम- रणप्रसाधनाम् , जानकीमिव जातवेदसं पत्युः पुरः प्रवेद्यन्तीम् , प्रत्य- ग्रस्नानाद्र्देहतया श्रियमिव भगवतीं सद्यः समुद्रादुत्थिताम् , कुसुम्भवभ्रुणी वाससी दिवमिव तेजसी सांध्ये दधानाम् , ताम्बूलदिग्धरागान्धकाराध- रप्रभापटपाटलं पट्टांशुकमिव विधवामरणचिह्नमङ्गलमुद्वहन्तीम् , रक्त- कण्ठसूत्रेण कुचान्तरावलम्बिना स्फुटितहृदयविगलितरुधिरधाराशङ्कां लूँ। चन्द्रसेना, इस जन को जी भर के देख ले। बिन्दुमती, यह तेरे प्रति आखिरी वन्दन। है। चेटी, मेरे पैर छोड़ दे। आर्ये कात्यायनिके, क्यों रो रही हैं? दैव मुझे ले जा रहा है। तात कञ्चुकिन्, मुझ अभागिन को क्यों घेर रहे हो? धात्रेयी, तू सम्भल, क्यों मेरे पैर पड़ती है? भगिनी, फिर लौट कर न आने वाली मेरे कण्ठ में लग जा । हाय, प्रिय सखी मलयवती को नहीं देखा। कुरङ्गवती, यह प्रस्थान की हथजोरी है। सानुमती, यह अन्तिम प्रणाम है। कुवलयवती, यह अन्त का आलिङ्गन है। सहेलियों, प्रेम के झगड़ों को क्षमा करना।' इन बातों से कुमार के कान जलने लगे । प्रवेश करते हुए उन्होंने निकलती हुई माता यशोमती को देखा। उसने अपने सुहाग के चिह्न अर्पित कर दिये थे और अनुमरण के लिए श्रृङ्गार कर चुकी थी। सीता के समान पति के सामने अग्नि में प्रवेश करने के लिए तत्पर थी। तुरत किये गए स्नान से उसकी देह आर्द्र थी, मानों समुद्र से तुरत निकली हुई भगवती लक्ष्मी हों। आकाश जैसे संध्याकाल में तेज धारण करता है उसी प्रकार उसने कुसुम्भी रङ्ग के दो वस्त्रों को धारण किया था। पान की गाढ़ी लाली से युक्त उसके अधर की प्रभा से लाल पटांशुक को मानों उसने अङ्ग में लगे हुए विधवा के मरने के चिह्न को धारण किया था। उसका लाल कण्ठसूत्र कुचों के बीच लटक रहा था, उससे उसके फटे हुए हृदय से प्रवाहित रुधिरधारा की शंका उत्पन्न हो रही थी। टेढ़ी कुण्डल के