भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 506 में से

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पञ्चम उच्छ्वासः २७७ श्मनीव लोहप्रहारः कठिने हुतभुजमुत्थापयति न तु भस्मसात्करोति मे निरनुक्रोशस्य कायम्' इति । उत्थाय च त्वरमाणोऽन्तःपुरमगात् । तत्र च मर्तुमुद्यतानां राजमहिषीणामशृणोद्दूरादेव 'तात चूत ! चिन्तयात्मानं प्रवसति ते जननी । वत्स जातीगुच्छ ! गच्छाम्यापृच्छस्व माम् । मया विनाद्यनाथा भवसि भगिनि भवनदाडिमलते ! रक्ताशोक ! मर्षणीयाः पादप्रहाराः कर्णपूरपल्लवभङ्गापराधाश्च । पुत्रक ! अन्तःपुरबालबकुलक वारुणीगण्डूषग्रहणदुर्ललित ! दृष्टोऽसि । वत्से प्रियङ्गुलतिके ! गाढमा- लिङ्ग मां दुर्लभा भवामि ते । भद्र भवनद्वारसहकार ! दातव्यो निवा- पतोयाञ्जलिरपत्यमसि । भ्रातः पञ्जरशुक ! यथा न विस्मरसि माम्, किं व्याहरसि दूरीभूतास्मि ते ? शारिके ! स्वप्ने नः समागमः पुनर्भु- यात् । मातः ! मार्गलग्नं कस्य समर्पयामि गृहमयूरकम् ? अम्ब ! सुत- वल्लालनीयमिदं हंसमिथुनं मन्दपुण्यया मया न संभावितोऽस्य चक्रवाक- युगलस्य विवाहोत्सवः । मातृवत्सले ! निवर्तस्व गृहहरिणिके ! समुपनय अनुक्रोशो दया। तत्रेत्यादौ राजमहिषीणामित्येवंप्रायानालापानशृणोदिति संबन्धः। आपृच्छस्व ज्योत्कुरु । वारुणी सुरानिवापो मृतमुद्दिश्य दीयते जलादिकम् । उन्होंने अपने मन में सोचा—'कठोर पत्थर पर जैसे लोहे का प्रहार पड़कर अग्नि उत्पन्न कर देता है उसी प्रकार संज्ञावान् मेरे कठिन हृदय पर बहुत प्रकार के इन दुःखों का आघात अग्नि उत्पन्न कर देता है, पर निष्ठुर मेरे शरीर को जलाकर राख नहीं कर देता । वे उठकर शीघ्रता से अन्तःपुर में पहुंचे और वहाँ दूर ही से मरणोद्यत राजमहिषियों की बाते सुनीं —'तात चूत, तू अपनी चिन्ता कर, तेरी जननी प्रवास कर रही है। वत्स जातीगुच्छ, जाती हूं, बिदा दो । बहन दाड़िमलता, मेरे बिना तू आज अनाथ हो रही है। रक्ताशोक, जो मेरे चरण-प्रहार हैं और कर्णपूर बनाने के लिये तुम्हारे पल्लव तोड़े हैं उन अपराधों को माफ करना । हे प्रियपुत्र, अन्तःपुर के छोटे बकुल, मदिरा के गण्डूष लेने में दुर्ललित, अब तेरा अन्तिम दर्शन है। वत्सा प्रियंगुलतिका, मुझे कसकर अंकवार ले, दुर्लभ हो रही हूँ । हे भद्र भवनद्वार के सहकार, तुझे मैंने अपत्य समझा है, जलाञ्जलि देना । भाई पञ्जरशुक, मुझे भूलना मत, क्या कह रहे हो ? मैं दूर जा रही हूँ । शारिके, स्वप्न में हमारा-तुम्हारा मिलन होगा । हाय मा, रास्ता रोके हुए गृहमयूर को किसे समर्पित कर जाऊँ ? अंबे, पुत्र के समान हंस के इस जोड़े को पालना । मन्दपुण्य वाली मैं चक्रवाक के जोड़े का विवाहोत्सव न रचा सकी । मातृवत्सले गृह हरिणिके, लौट जाओ । हे कंचुकी, प्यारी वीणा को लाओ तब तक उसे आलिङ्गन कर

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