भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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२७६ हर्षचरितम् मुत्तरीयांशुकपटीं स्फुरन्तीं फणिनीव निर्मोकमञ्जरीमाकर्षन्ती, नम्रांससं- सिनानिलविलोलेन नीलतमेन तमालपल्लवचीरचीवरेणेव शोकोचितेन धम्मिल्लरचनारहितेन शिरोरुहसंचयेन चञ्चता प्रावृतकुचा, कुचताडन- पीडया समुच्छूनाताम्रश्यामतलं मुहुर्मुहुरुष्णाश्रुप्रमार्जनप्रदग्धमिव कर- किसलयं धुनाना, चक्षुर्निर्भरै शीर्यति स्नापयन्तीव शोकाग्निप्रवेशाय स्व- कपोलतलप्रतिबिम्बितमासन्नलोकं, लोललोचनप्रवृत्तैस्तर लैस्तारकांशुभिः श्यामायमानमात्मदुःखेन दिवसमपि दहन्तीव 'क्व कुमारः क्व कुमारः ?' इति प्रतिपुरुषं पृच्छन्ती, वेलेति नाम्ना यशोमत्यः प्रतीहार्यजगाम । विषण्णलोकलोचनप्रत्युद्गता चोपसृत्य कुट्टिमन्यस्तहस्तयुगला गलन्तीभिः सिञ्चन्तीव शुष्यन्तं दशनदीधितिधाराभिराधूसरमधरामधोमुखी विज्ञापि- तवती - 'देव ! परित्रायस्व परित्रायस्व । जीवत्येव भर्तरि किमप्यध्यव- सितं देव्या' इति । ततस्तदपरमाकर्ण्य च्युत इव सत्त्वेन, द्रुत इव दुःखेन, आचान्त इव चिन्तया, तुलित इव तापेन, अङ्गीकृत इवाङ्गेनाप्रतिपत्तिरासीत् । आसी- श्चास्य चेतसि - प्रतिपन्नसंज्ञस्य बहुशोऽपि हृदये दुःखाभिषङ्गो निपतन्न- अप्रतिपत्तिः किंकर्तव्यतामूर्खः । हृदयेऽतिकठिने । के अनुकूल एवं बनाव-सिंगार से रहित था, खुलकर नीले तमालपल्लव के उत्तरीय के समान स्तनों पर लटक आया था । स्तनों पर पीटने से उसका हाथ लाल हो गया था, मानों बार-बार अत्यन्त गरम आँसुओं के पोंछने से जल गया हो । शोक की अग्नि में प्रवेश करने के लिए अपने कपोलतल पर प्रतिबिम्बित होते हुए समीप के लोंगो को वह मानों अपने आँसुओं की धारा में नहला रही थी । चंचल आँखों के तारों से निकलती हुई किरणों से श्याम वर्ण के दिन को भी मानों दग्ध कर रही थी । 'कुमार कहाँ हैं ? कुमार कहाँ हैं ?' यह प्रत्येक से पूछ रही थी । विषाद में पड़े हुए लोगों की आँखें उसकी ओर लग गईं । समीप में आकर वह कुट्टिम पर हाथ रखकर अपने दाँतों की किरण- धारा से सुखाए हुए अधर को सींचती हुई-सी मुंह नीचा किए हुए बोली- 'देव, बचाओ- बचाओ । पति के जीते जी देवी कुछ करने जा रही हैं।' शोक के उस दूसरे कारण को सुनकर कुमार हर्ष किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए, मानों सत्त्व से च्युत, दुःख से द्रुत, चिन्ता से निपीत, ताप से लघुभूत और आतंक से आक्रान्त हो गये।