भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

पञ्चम उच्छ्वासः २७५ मध्याज्जीवितमिव राज्यस्य सरसपिशितपिण्डलोहितं चञ्च्चच्चञ्चुरुच्चैरुत्खनन् खण्डं माणिक्यस्य कूजज्जरद्गृध्रो महोत्पातदूयमानश्च कथमपि निनाय निशाम् । अन्यस्मिन्नहनि समीपमस्य राजकुलाद्द्रुतगतिवशविशीर्यमाणा- लंकारझांकारिणी विजयघोषयेव विषादस्याकुलचरणचलत्तुलाकोटिकणि- तवाचालिताभिरुद्ग्रीवाभिः, किं किमेतदिति पृच्छ्यमानेव दूरादेव भव- नहंसीभिः, स्खलितविशालश्रोणिशिञ्जानरशनानुराविणीभिश्च बाष्पान्धा समुपदिश्यमानमार्गेव गृहसारसीभिः अदृष्टकवाटपट्टसंघट्टस्फुटितललाट- पट्टरुधिरपटलेन पटान्तेनेव रक्तांशुकस्य मुखमाच्छाद्य प्ररुदती, संताप- बलविलीनकनकवलयरसधारामिव वेत्रलतामुत्सृजन्ती, मुखमरुत्तरङ्गिता- अन्यस्मिन्नित्यादौ । समीपस्था यशोमत्यः प्रतीहार्याजगामेति संबन्धः । तुलाकोटिनूपुरम् । चीरचीवरं वृक्षत्वक्, चीरवासः । भौंरे राजसिंहासन के पास केशपाश के रूप में मँडराने लगे, मानों कालरात्रि चँवर झलने लगी हो । अन्तःपुर के ऊपर-ऊपर उड़ते हुए कौवों की कांव-कांव क्षण भर भी बंद न हुई । कर्राता हुआ गीध श्वेत आतपत्र के बीच जड़े हुए राज्य के प्राण के समान माणिक्य को खून से लाल मांस का लोथा समझ कर उखाड़ ले भागा । इस प्रकार के भयंकर उत्पातों से दुखी होकर हर्ष ने किसी प्रकार रात बिताई । दूसरे दिन वेत्रा नाम की यशोमती की प्रतीहारी राजकुल से हर्ष के समीप पहुंची । तेज दौड़ने के कारण उसके अलंकार टूट-टूट कर झन-झना रहे थे, मानों विषाद की विजय-घोषणा होने लगी । उसके अस्तव्यस्त नूपुर की आवाज सुन कर भवन की हंसियाँ गर्दन उठाकर टर्राने लगीं, मानों 'क्या बात है ? क्या बात है ?' यह उससे पूछ रही हों । बाष्प से उस की आँखें भर गई थीं, जब वह गिर पड़ती तो उसकी विशाल श्रोणि में लगी हुई करधनी बज उठती और उस आवाज से गृहसारसियाँ जोर से चिल्लाने लगीं, मानों उसे रास्ता बता रही हों । आगे न देखने के कारण किवाड़ से टक्कर खा जाने से उसके ललाट से रक्त की धारा बह रही थी, मानों रक्तां- शुक के अग्र भाग से मुंह ढंक कर रो रही हो । संताप के कारण उसके हाथ के कनक- वलय की रसधारा ही मानों वेत्रलता के रूप में हाथ से छूट गई । श्वास की हवा से उड़कर फहराते हुए अपने उत्तरीय को उस प्रकार समेटती जा रही थी जैसे सर्पिणी अपने केंचुल को सम्भालती है। उसके झुके हुए कंधे पर केशपाश, जो शोक के अवसर