हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ हर्षचरितम् लाभोगभास्वरो जिघृक्षाजृम्भमाणस्वर्भानुभयादुपरचिताग्निप्राकार इव प्रत्यदृश्यत श्वेतभानुः। अवनिपतिप्रतापप्रसाधिताः प्रथमतरकृतपावकप्रवेशा इवादह्यन्तानुरक्ता दिशः । क्षतशोणितशीकरासारारुणिततनुरनुमरणाय पर्याकुला प्रावृतपाटलांशुकपटेवाहश्यत वसुधावधूः । नराधिपविनाश- संभ्रमभीतैर्लोकपालैरिव कालायसकवाटपुटैरकालकालमेघपटलैररुध्यन्त दिग्द्वाराणि । प्रेतपतिप्रयाणप्रहताः पटवः पटहा इवारटन्तो हृदयस्फोटनाः पस्फायिरे निपतां निर्घातानां घोरा घननिर्घोषाः । निकटीभवद्यम- महिषखुरपुटोद्धूता इव द्युमणिधाम धूसरीचक्रुः क्रमेलककचकपिलाः पांशु- वृष्टयः । विरसविराविणीनामुन्मुखीनां शिखिनो ज्वालाः प्रतीच्छन्त्य इव पतन्तीरुल्का नभसो बवाशिरे शिवानां राजयः । राजधामनि धूमायमान- कबरीविभागविभावितविकाराः प्रकीर्णकेशपाशप्रकाशितशोका इव प्राका- शन्त प्रतिमाः कुलदेवतानाम् । उपसिंहासनमाकुलं कालरात्रिविधूयमान- वृजिनवेणीबन्धविभ्रमं बिभ्राणं बभ्राम भ्रामरं पटलम् । अटतामन्तःपुर- स्योपरि क्षणमपि न शशाम व्याक्रोशी वायसानाम् । श्वेतातपत्रमण्डल- भूषिताश्च । कचाः केशाः । शिवानां मृगादीनाम् । कबरीशब्देनात्र कचा लक्ष्यन्ते । व्याक्रोशी परस्पराह्नानशब्दः । वायसानां काकानाम् । चन्द्रमा ने पकड़ने की तैयारी में जंभाई लेत हुए राहु के डर से अपनी रक्षा के लिए अग्नि की दीवार खड़ी कर दी हो। अनुराग से भरी हुई दिशाओं ने राजा के प्रताप में अपने को प्रसाधित करके मानों पहले ही अग्निप्रवेश कर लिया और जलने लगीं। पृथिवी रूपी वधू बहती हुई रक्त की धारा से लाल होकर अनुमरण के लिए लाल वस्त्र पहन कर तैयार हुई-सी प्रतीत होने लगी। राजा के विनाश से अकस्मात् डरे हुए लोकपालों ने असमय में लोहे के किवाड़ों के समान काले-काले मेघों के रूप में मानों दिशाओं के द्वार बन्द कर दिए। हृदय को तोड़ देने वाले अन्तरिक्ष से उत्पन्न वायु के घोर आघातजन्य शब्द इस प्रकार बढ़ गए मानों राजा को लेने के लिए प्रस्थान के अवसर पर पटह बजाए जा रहे हों। आकाश में ऊँट के रोंगटे के समान वर्ण वाली धूल मानों राजा के निकट आते हुए यमराज के भैंसों के खुरों से उड़ कर सूर्यमण्डल को धूसर करने लगी। सियारियां आकाश की ओर मुंह करके जोर-जोर से चिल्लाने लगीं, मानों अग्नि की ज्वाला के रूप में आकाश से गिरती हुई उल्काओं की प्रतीक्षा कर रही हों। राजमन्दिर में धुँवे के समान बाल बिखर रहे थे मानों कुल- देवताओं की प्रतिमाएं अपने केशपाश को बिखेर कर अपना शोक प्रकट कर रही हों।