भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

पञ्चम उच्छ्वासः २७३ भ्यतोपभोगानाम् । नामापि नाकीर्त्यताहारस्य । खपुष्पप्रतिमान्यासन्ना- पानमण्डलानि । लोकान्तरमिवानीयन्त बन्दिवाचः । युगान्तर इवावर्तन्त निर्वृतयः । पुनरिवादह्यत शोकाग्निना मकरकेतुः । दिवापि नामुच्यन्त शयनानि । शनैः शनैश्च महापुरुषविनिपातपिशुनाः समं समन्तात्समुद- भवन्भुवने भूयांसो भूपतेरभावाय भयमुत्पादयन्तो भूतानां महोत्पाताः । तथा हि डोलायमानसकलकुलाचलचक्रवाला पत्या सार्धं गन्तुकामेव प्रथममचलद्धरित्री । धान्वन्तरेरिवान्तरे तस्मिन्स्मरन्तः परस्परास्फालन- वाचालवीचयो विजघूर्णिरेऽर्णवाः । भूभृदभावभीतानां विततशिखिकलाप- विकटकुटिलाः केशपाशा इवोर्ध्वाबभूवुर्धूमकेतवः ककुभाम् । धूमकेतु- करालितदिङ्मुखं दिक्पालारब्धायुष्कामहोमधूमधूम्रमिवाभवद्भुवनम् । भ्रष्ट- भासि तप्तकालायसकुम्भबभ्रुणि भानुमण्डले भयंकरकबग्धकायव्याजेन कोऽपि पार्थिवप्राणितार्थी पुरुषोपहारमिवोपजहार । ज्वलितपरिवेषमण्ड- शिखी मयूरोऽपि । धूमकेतव उत्पातशंसिनः, अग्नयश्च । करालितानि भीषणी- कृतानि, व्याप्तानि च । बभ्रु कपिलम् । श्वेतभानुश्चन्द्रः । प्रसाधिता आवर्जिताः, बात तक नहीं चलती । भोजन का नाम भी नहीं लिया जाता । समीप के पानागार आकाश-पुष्प के समान हो गए । बन्दी जनों की बातें मानों परलोक पहुँच गईं । मानों सुख के युग ही बदल गए । मानों कामदेव शोक की अग्नि में फिर से जलने लगा । दिन में भी पलंग नहीं छोड़े जाते । शनैः शनैः राजा के अभाव व्यक्त करने से भय उत्पन्न करते हुए, महापुरुष के समाप्त होने की सूचना देने वाले महाभूतों के उपद्रव एक ही बार संसार में उत्पन्न हो गए । पहले पृथिवी मानों पति के साथ जाने की इच्छा से कुलपर्वतों को कम्पित करती हुई डोलने लगी । समुद्र मानों धन्वन्तरि के अभाव का स्मरण करते हुए परस्पर तरंगों के आघात-प्रत्याघात द्वारा विकलता से घूर्णित होने लगे । राजा के अभाव से डरी हुई दिशाओं के मोर के पंख के समान फैले हुए कुटिल केशपाश के रूप में धूमकेतु तारे आकाश में उठ गए । धूमकेतुओं से दिशाएं भीषण हो गईं, मानों सारे संसार में दिक्पालों ने राजा की आयु की कामना से जो यज्ञ किया उसी का धूम सर्वत्र फैल गया । सूर्य का मण्डल निष्प्रभ और तपे हुए लोहे के समान हो गया, मानों किसी ने सिर कट जाने पर छटपटाते हुए शरीर के व्याज से राजा के जीवन की कामना से पुरुष का बलिदान किया हो । चन्द्रमण्डल का घेरा चारों ओर से जलने लगा, मानों १८ ह० च०