भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 317

कुलपुत्रेण यत्तादृशा वियुक्तम्। अपि च ममापि कः खल्वेतेषां प्राणानां कार्यातिभारः कृत्यशेषो वा, का वा व्यापृतता येन नाद्यापि निष्ठुराः प्राणाः प्रतिष्ठन्ते। को वान्तरायो हृदयस्य येन सहस्रधा न दलतीति। दुःखार्तश्च न जगाम राजसद्म। समुत्ससर्ज च सर्वकार्याणि। शयनीये निपत्योत्तरीयवाससा सोत्तमाङ्गमात्मानमवगुण्ठ्यातिष्ठत्। इत्थंभूते च देवे हर्षे राजनि च तदवस्थे सर्वस्यैव लोकस्य कपोलेषु कीलिता इव कराः, लोचनेषु लेप्यमय्य इवाश्रुस्रुतयः, नासाग्रेषु प्रथिता इव दृष्टयः, कर्णेत्कीर्णा इव रुदितध्वनयः, जिह्वासु सहजानीव हा कष्टानि, लपनेषु पल्लवितानीव श्वसितानि, अधरेषु लिखितानीव परिदेवि- तपदानि, हृदयेषु निधानीकृतानीव दुःखान्यभवन्। उष्णाश्रुदाहभीतेव नाभजत नेत्रोदराणि निद्रा। निःश्वासवातविधूता इव व्यलीयन्त हासाः। निरवशेषदग्धेव च संतापेन न प्रवर्तत वाणी। कथास्वपि नाश्रूयन्त परि- हासाः। काव्यगर्मांन्विति नाज्ञायन्त गीतगोष्ठ्यः। जन्मान्तरातीतानीव नास्मर्यन्त लास्यानि। स्वप्नेऽपि नागृह्णन्त प्रसाधनानि। वार्तापि नाल- व्यापृतता व्यग्रता। प्रष्ठा अग्रगामिनः। प्रतिष्ठन्ते प्रतिष्ठां कुर्वते। वह धन्य है। यह राजकुल ही अपुण्यवान् है जो उस प्रकार के कुलपुत्र स रहित हो गया। मेरे प्राणों को अब कौन सा काम का वोझ आ गया है या कौन काम बच गया है या कौन-सी व्यग्रता है जिससे आज ये निष्ठुर प्राण प्रस्थान नहीं करते। कौन-सा ऐसा बीच में विघ्न आ पड़ा है जो मेरे हृदय के हजार टुकड़े नहीं हो रहे हैं।' इस प्रकार दुःखार्त होने के कारण उस दिन राजभवन में नहीं गए और सब काम त्याग बैठे। केवल उत्तरीय वस्त्र से सिर तक अपने को ढंक कर पलंग पर पड़े रहे। इस प्रकार देव हर्ष के दुःखी होने पर और महाराज को उस अवस्था में पड़े देख कर लोगों का कष्ट बढ़ गया। वे कील के समान हाथ पर कपोल रख कर बैठ गए। उनकी आँखों से लेप के समान आँसू की धार बहने लगी। उनकी जीभ पर 'हा, क्या हो गया ?' यह आवाज सहज हो गई। मुंह में सांस उमड़ गई। अधरों पर विलाप के शब्द लिख गए। हृदय में दुःख ने घर कर लिया। निद्रा मानों गरम आँसू में जलने के डर से आँखों में नहीं आई। उनकी हँसी सांस की हवा से मानों उड़ कर विलीन हो गई। संताप से बिलकुल जल जाने के कारण उनकी वाणी मानों प्रवृत्त नहीं होती थी। गीत की गोष्ठियों मानों कहीं चली गईं। नृत्य के प्रसंग जन्मान्तर की अतीत वस्तु की भाँति स्मृति पर नहीं आते थे। स्वप्न में भी लोगों ने प्रसाधन ग्रहण नहीं किया। उपभोगों की