हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम उच्छ्वासः २७१ क्तमश्रौषीत् । पर्यपृच्छच्च तान्—'भद्राः ! किं रसायन' इति । पृष्टाश्च ते सर्वे सममेव तूष्णींबभूवुः । भूयोभूयश्चानुबध्यमाना दुःखेन कथंकथमप्या- चचक्षिरे—'देव ! पावकं प्रविष्टः' इति । तच्च श्रुत्वा प्लुष्ट इवान्तस्तापेन सद्यो विवर्णतामगात् । उत्पाट्यमानमिव च न शशाक शोकान्धं धारयितुं हृदयम् । आसीच्चास्य चेतसि—कामं स्वयं न भवति न तु श्रावयत्यप्रियं वचनमरतिकरमितर इवाभिजातो जनः । कृच्छ्रे च यथानेनानुष्ठितमु- ज्ज्वलीकृतमधिकतरं ज्वलनप्रवेशेन कल्याणप्रकृति कार्त्तस्वरमिव कौलपुत्र- मस्येति । पुनश्चाचिन्तयत्—'समुचितमेवाथवा स्नेहस्येदम् । किमस्य तातो न तातः, किं वाऽम्बा न जननी, वयं न भ्रातरः । अन्यस्मिन्नपि तावत्स्वामिनि दुर्लभीभवति भवन्त्यसवो ध्रियमाणा ह्रीहेतवो लोके किमुतामृतमयेऽनुजीविनां निर्व्याजबान्धवेऽवन्ध्यप्रसादे सुगृहीतनाम्नि ताते । संप्रति सांप्रतमाचरितमनेनात्मानं दहता । किं वास्याकल्पमव- स्थितस्य स्थेयसो यशोमयस्य दह्यते पतितः स केवलं दहने । दग्धास्तु वयम् । धन्यः खल्वसावग्रणीः पुण्यभाजाम् । अपुण्यभाक्त्विदमेव राजकुलं प्रवेशेनाधिकतरमुज्ज्वलम् । सांप्रतं युक्तम् । अतिशयेन स्थिरं स्थेयस्तस्य । 'भद्र, रसायन की क्या बात है ?' इस प्रकार उनके पूछने पर सबके सब चुप हो गए । बार-बार पूछे जाने पर दुःख से किसी-किसी प्रकार उन सबों ने कहा—'देव, रसायन ने अग्नि में प्रवेश कर लिया ।' यह सुनते ही हृदय के सन्ताप से मानों जल कर फक् पड़ गए । शोक से अन्धभूत उखड़े हुए से अपने हृदय को वश में न रख सके । मन में सोचने लगे—'कुलीन व्यक्ति स्वयं नहीं रहना अच्छा समझता है, परन्तु नीच के समान अप्रिय और अरति उत्पन्न करने वाली बात मुंह से नहीं निकालता । क्लेश के अवसर में रसायन ने वही किया । अग्नि में प्रवेश करने से कल्याण से पूर्ण प्रकृति वाला उसका कुलपुत्र- भाव सुवर्ण के समान और भी निखर गया ।' हर्ष ने फिर सोचा—'अथवा यह उसके स्नेह के उचित ही है । पिता जी क्या उसके पिता नहीं ? मेरी माता क्या उसकी माता नहीं ? हम लोग क्या उसके भाई नहीं ? दूसरे भी मालिक जब इस प्रकार दुर्लभ होने लगते हैं तो उनके अनुजीवियों के द्वारा धारण किए गए प्राण संसार में लज्जा उत्पन्न करते हैं और फिर अमृत के समान, बिना छल-कपट के बांधव निष्फल न जाने वाली प्रसन्नता करने वाले, सुगृहीतनाम पिता जी की तो बात ही क्या ? उसने अपने आप को दग्ध करके बहुत ठीक किया । केवल अपने को अग्नि में डाल कर जो कल्पान्त तक अपने यशःशरीर से स्थिर हो गया, क्या जल गया ? जले तो हम लोग । पुण्यवानों में अग्रणी