हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० हर्षचरितम् कुवलयं कलावति ! चन्दनचर्चां रचय चारुमति ! पाटय पटमारुतं पाटलिके ! मन्दय दाहमिन्दुमति ! अरविन्दैर्जनय जलार्द्राया मुदं मदिरा- वति ! समुपनय मृणालानि मालति ! तरलय तालवृन्तमावन्तिके ! मूर्धानं धावमानं बधान बन्धुमति ! कन्धरां धारय धारणिके ! उरसि सशीकरं करं कुरु कुरङ्गवति ! संवाह्य बाहू बलाहिके ! पीडय पादौ पद्मावति ! गृहाण गाढमङ्गमनङ्गसेने ! का वेला वर्तते विलासवति ! नैति निद्रा, कथाः कथय कुमुद्वति !' इत्येवंप्रायान्पितुरालापाननवरतमा- कर्णयन्दूयमानहृदयो दुःखदीर्घां जाग्रदेव निशामनैषीत् । उषसि चावतीर्य राजद्वारदेशोपसर्पिणा परिवर्धकेनोपस्थापितेऽपि तुरङ्गे चरणाभ्यामेवाजगाम स्वमन्दिरम् । तत्र च त्वरमाणो भ्रातुरागम- नार्थमुपर्युपरि क्षिप्रपातिनो दीर्घाध्वगानतिजविनश्चोष्ट्रपालान्प्राहिणोत् । प्रक्षालितवदनश्च परिजनेनोपनीतमपि प्रतिकर्म नागृहीत् । अग्रतः स्थितानां राजपुत्रयूनां विमनसां 'रसायनो रसायनः' इति जल्पितमव्य- पाटय पटुं कुरु । कन्धरां ग्रीवाम् । संवाहय मर्दय । कुमुद्वतीत्यादयः सुशब्दत्वा- त्साधवः । परिवर्धकोऽश्वपालः । प्रतिकर्म प्रसाधनम् । कार्त्तस्वरं हेम । तदपि ज्वलन- कुवलय फैला । चारुमती, चन्दन लगा। पाटलिके, कपड़े की हवा कर । इन्दुमती, जलन कम कर । मदिरावती, कमलों का ठंडा पंखा बना कर झल । मालती, मृणालों को जुटा । आवन्तिका, जोर से पंखा झल । बन्धुमती, उड़े जाते हुए मेरे मस्तक को पकड़ । धारणिके, कन्धे को सम्हाल । कुरङ्गवती, अपना भींगा हाथ मेरे वक्ष पर रख । बलाहिका, मेरी भुजाओं को दबा । पद्मावती, पैर दबा । अनङ्गसेना, जोर से मेरे अङ्गों को पकड़ । विलासवती, क्या समय हो रहा है ? कुमुद्वती, नींद नहीं आ रही है, कहानी सुना ।' इस प्रकार के आलाप सुनते हुए, दुःख के कारण बढ़ी हुई रात को जागते ही व्यतीत किया । प्रातःकाल होने पर धवलगृह से उतर कर राजद्वार तक आए । वहां अश्वपाल घोड़ा लिए उपस्थित था, फिर भी पैदल ही अपने मन्दिर को लौटे । वहां उन्होंने शीघ्रता से अपने भाई राज्यवर्धन को बुलाने के लिए तेज दौड़ने वाले दीर्घाध्वग संदेशहरों को और वेगगामी सांड़नी सवारों को ताबड़तोड़ दौड़ाया । मुंह धोने के बाद परिजनों द्वारा लाए गए भी प्रसाधन को ग्रहण नहीं किया । तभी आगे खड़े हुए शोक से भरे युवक -राजपुत्रों की 'रसायन रसायन' इस तरह की अस्पष्ट बातचीत सुनी और उनसे पूछा—