भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 314

पञ्चम उच्छ्वासः २६५ हाजकुले कुलक्रमागतो गतः परम्पारमष्टाङ्गस्यायुर्वेदस्य भूभुजा सुतनि- विशेषं लालितः प्रकृत्यैवातिपटीयस्या प्रज्ञया यथावद्विज्ञाता व्याधिस्वरू- पाणां रसायनो नाम वैद्यकुमारकः सास्रस्तूष्णीमधोमुखोऽभूत् । पृष्टश्च राजसूनुना—'सखे रसायन ! कथय तथ्यं यद्यसाध्यिव पश्यसि' इति । सोऽब्रवीत्—'देव ! श्वः प्रभाते यथावस्थितमावेदयितास्मि' इति । अत्रैव चान्तरे भवनकमलिनीपालः कोकमाश्वासयन्नपरवक्त्रमुच्चैरपठत्- विहग ! कुरु दृढं मनः स्वयं त्यज शुचमास्स्व विवेकवर्त्मनि । सह कमलसरोजिनीश्रिया श्रयति सुमेरुशिरो विरोचनः ॥ ४ ॥ तच्चाकर्ण्य वाङ्निमित्तज्ञः पितरि सुतरां जीविताशां शिथिलीचकार । गतेषु च भिषक्षु क्षतधृतिः क्षपामुखे क्षितिपालसमीपमेव पुनरारुरोह । तत्र च—'दाहं। महान् । आहर हारान्हंरिणि ! मणिदर्पणन्मे देहे देहि वैदेहि ! हिमलवैर्लिम्प ललाटं लीलावति ! घनसारक्षोदधूलीन्निधेहि धवलाक्षि ! निक्षिप चक्षुषी चन्द्रकान्तं कान्तिमति ! कपोले कलय इति । अष्टाङ्कमिति । उक्तं च—'कायबालग्रहोर्ध्वाङ्गशल्यदंष्ट्राजरावृषान् । अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा तेषु संश्रिता ॥' इति । आयुर्वेदस्य वैद्यशास्त्रस्य । कोकश्चक्रवाकः । विरोचनो रविः । नत्र चेत्यादौ । तत्र च क्षितिपालसमीप इत्यादीन्मृत्यूकलापालापानाकर्ण्यनिशामनैपीदिति संबन्धः । घनसारः कर्पूरः । समान लालित, स्वभाव से ही अत्यन्त प्रखर बुद्धि से ठीक ठीक निदान के द्वारा व्याधि के स्वरूप को जान लेने वाला रसायन नाम का वैद्यकुमार चुपचाप मुँह नीचे करके डबडबाने लगा। तब राजकुमार ने पूछा—'मित्र रसायन, ठीक ठीक बताओ, क्या गड़बड़ी देखते हो ?' वह बोला—'देव, कल प्रातःकाल ठीक ठीक निवेदन करूँगा।' इसी बीच भवन की कमलिनियों के रक्षक पुरुष ने चक्रवाक पक्षी को आश्वासन देते हुए ऊँचे स्वर से अपरवक्त्र छन्द का गान किया— 'हे चक्रवाक, तू अपने मन को दृढ़ कर, शोक न कर एवं विवेक के मार्ग पर आ ; इस समय सूर्य कमल और सरोजिनी की श्री के साथ सुमेरु के शिखर पर पहुँच रहा है।' हर्ष ने यह सुना और तात्पर्य समझ कर पिताजी के जीने की प्रबल आशा को शिथिल कर दिया। वैद्यों के लौट जाने पर संध्या के समय हर्ष पिता के सामने फिर गए। वहाँ वे इस प्रकार बड़बड़ा रहे थे—'बड़ी तेज जलन है। हरिणी, हारों को ला। वैदेही, मेरे शरीर पर मणिदर्पण रख। लीलावती, ललाट पर बर्फ का जल छिड़क। धवलाक्षी, कपूर की धूल डाल। कान्तिमती, आँखों पर चन्द्रकान्त मणि रख । कलावती, कपोल पर