भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

२६८ हर्षचरितम् तस्यैव नरकवासः, निर्ज्योतिरजङ्गारवर्षमशकलीकरणं क्रकचदारणमव्रणो वज्रसूचीपातः । किमुत विशेषश्रितः । किमत्र करवाणि' इति । राजपुरुषेणाधिष्ठितश्च गत्वा स्वधाम धूममयानिव कृताश्रुपातान्, अग्निमयानिव जनितहृदयदाहान्, विषमयानिव दत्तमूर्च्छावेगान्, महा- पातकमयानिवोत्पादितघृणान्, क्षारमयानिवानीतवेदनान्, कतिचित्कव- लानगृहात् । आचामंश्च चामरग्राहिणमादिदेश—'विज्ञायागच्छ कथमास्ते तातः' इति । गत्वा च प्रतिनिवृत्य च 'देव ! तथैव' इति विज्ञापितस्ते- नागृहीतताम्बूल एवोत्ताम्यता मनसास्ताभिलाषिणि सवितरि सर्वानहूयो- पह्वरे वैद्यान्, 'किमस्मिन्नेवंविधे विधेयमधुना ?' इति विषण्णहृदयः पप्रच्छ । ते तु व्यज्ञापयन्—'देव ! धैर्यमवलम्बस्व । कतिपयैरेव वासरैः पुनः स्वां प्रकृतिमापन्नं स्वस्थं श्रोष्यसि पितरम्' इति । तेषां तु भिषजां मध्ये पौनर्वसवो युवाऽष्टादशवर्षदेशीयस्तस्मिन्नेव सूची शलाका । धूममयानिवेति । धूमः किलाश्रु मोचयति । घृणा जुगुप्सा । उपह्वरे रहसि । स्वां प्रकृतिममन्दत्वम्, अव्यक्तरूपत्वं च, पृथिव्यादिषु वा लीनम् । स्वस्थं व्याधि- विनिर्मुक्तं, स्वर्गस्थं च । यतः—'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥' इत्युक्तम् । पुनर्वसोरपत्यं पौनर्वसवः । पुनर्वसुना मुनिना प्रोक्तमायुर्वेदमधीते पौनर्वसव राजपुरुष के साथ वे अपने स्थान पर पहुँचे और उन्होंने दो चार कौर खाए, मानों वे कौर धूममय थे जिससे उनके आँसू आ गए; अग्निमय थे जिससे उनका हृदय जल उठा; विषमय थे जिससे मूर्च्छा का एक झटका-सा लगा; महापातकमय थे जिससे उन्हें घृणा हुई; क्षारमय थे जिससे अधिक वेदना उन्हें महसूस हुई। खाकर उन्होंने चामरग्राही पुरुष को आदेश दिया—'पता लगाकर आओ, पिताजी की क्या हालत है ?' वह जाकर लौटा और निवेदन किया—'देव, हालत वही है।' सुनकर ताम्बूल बिना लिए ही उद्विग्न होते हुए सन्ध्या के समय एकान्त में समस्त वैद्यों को बुलवाया। 'अब ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिए ?' हृदय में दुखी होकर उनसे पूछा । उन वैद्यों ने समझाया— 'देव, धैर्य धारण करें। कुछ ही दिनों में पिताजी को आप प्रकृतिस्थ और स्वस्थ सुनेंगे।' उन्हीं वैद्यों के बीच पुनर्वसु का पुत्र अट्ठारह वर्ष की अवस्था वाला, उसी राजकुल में कुलक्रम से सम्बन्धित, अष्टाङ्ग आयुर्वेद का पारङ्गत विद्वान्, राजा के द्वारा पुत्र के