भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 326

पञ्चम उच्छ्वासः २८१ ह्रेगेव चिरनिरोधसंपिण्डितेन स्नेहसंभारेण निर्भराविर्भूतेनाभिभूयमाना, कृतप्रयत्नापि निवारयितुं न शशाक बाष्पोत्पतनम् । उत्कटकुचोत्कम्पप्र- कटितासह्यशोकाकूता च गद्गदिकागृह्यमाणगलविकला निःसामान्यमन्यु- तरलीक्रियमाणाधरोष्ठदेशा पुनरुक्तस्फुरणनिबिडितनासापुटा निमील्य नयने नयनाम्भःसेकप्लवेन प्लावयन्ती विमलौ कपोलौ संच्छाद्य करनख- मयूखमालाखचिततनुना तन्वन्तरनिर्गच्छदच्छास्रस्रोतसेवांशुकपटान्तेन किंचिदुत्तानितं वदनेन्दुं दूयमानमानसा स्मरन्ती प्रस्नुतस्तनी प्रसवदिव- सादरभ्य सकलमङ्कशायिनः शैशवमस्य ज्ञातिगृहगतहृदया ‘अम्ब, तात ! न पश्यतं पापां परलोकप्रस्थितां मामेवमतिदुःखिताम्’ इति मुहुर्मुहुराक्रन्दती पितरौ, ‘हा वत्स ! विश्रान्तभागधेयया न दृष्टोऽसि’ इति प्रेष्ठं ज्येष्ठं तनयमसंनिहितं क्रोशन्ती, ‘अनाथा जाता’ इति श्वशुरकुलवर्तिनीं दुहितरमनुशोचन्ती, ‘निष्करुण ! किमपराद्धं तवामुना जनेन ?’ इति दैवमुपालभमाना, ‘नास्ति मत्समा सीमन्तिनी दुःखभागिनी’ इति संबन्धः । बाष्पोत्पतनमश्रुप्रवाहम् । एकत्र हुए और हृदय से उत्पन्न अपने स्नेहसम्भार से दब गयी; प्रयत्न करने पर भी वह गिरते हुये आँसुओं को न रोक सकी । जोर से काँपते हुये स्तनों से उसका असह्य शोक व्यक्त हो रहा था । गले में हिचकी बँध जाने से वह विकल हो गयी । असाधारण शोक से उसका अधर फड़फड़ा रहा था । बार-बार फड़कती हुई उसकी नाक जकड़ रही थी । आँखें मूद कर आँसू की धार से निर्मल अपने कपोलों को सींच रही थी । कुछ ऊपर उठाये हुए अपने मुखचन्द्र को हाथ के नखों की किरणों से खचित शरीर भीतर से निकलती हुयी आँसू की धार के समान अपने वस्त्र के अग्रभाग से ढक लिया । स्तन से दूध बहाती हुयी वह दुःखी मन से कुमार के जन्म से लेकर गोद में पलने वाले शैशव का स्मरण करने लगी । उसका हृदय अनायास पिता के घर चला गया । वह बार-बार अपने माता-पिता का स्मरण करके रोने लगी—‘हा अम्ब, हा तात, परलोक में प्रस्थान करती हुई, इस प्रकार अत्यन्त पीड़ित मुझ पापिन को आप लोग नहीं देखते हैं ?’ वह दूर गये हुये अपने अत्यन्त प्रिय बड़े पुत्र राज्यवर्धन को सम्बोधन करके चिल्लाने लगी— ‘हा वत्स, मन्दभाग्य मैंने तुम्हें नहीं देखा ।’ श्वशुरकुलमें गयी हुयी पुत्री राज्यश्री'को सोच कर कहने लगी—‘तू अनाथ हो गई ।’ दैव को ओरहन देने लगी—‘निर्दय, मैंने तेरा क्या बिगाड़ा था ?’ अपने आपको कोसने लगी—‘मेरे समान दुखिया नारी कोई नहीं ।’