हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ हर्षचरितम् निन्दन्ती बहुविधमात्मानम्, 'मुषितास्मि कृतान्त नृशंस ! त्वया' इत्य- काण्डे कृतान्तं गर्हमाणा मुक्तकण्ठमतिचिरं प्राकृतप्रमदेव प्रारोदीत् । प्रशान्ते च मन्युवेगे सस्नेहमुत्थापयामास सुतम् । हस्तेन चास्य प्ररुदितस्य पक्ष्मपालीपुञ्ज्यमानाश्रुकणनिवहां द्रुतामिवाधिकतरं क्षरन्तीं दृष्टिमुन्ममार्ज । स्वयमपि कठोररागपरिपीयमानेन धवलिम्ना मुच्यमानो- दरे क्वथदश्रुस्रवत्पर्यन्ते शुक्लीशीकरतारतारकितपक्ष्मणी सूक्ष्मतराश्रुबिन्दु- परिपाटीपतनानुबन्धविधुरे लोचने पुनः पुनरापूर्यमाणे प्रमृज्य बाष्पार्द्र- गण्डगृहीतां च श्रवणशिखरमारोप्य शोकलम्बामलकलतामधःस्रस्तवि- लोलबालिकाव्याकुलितां च समुत्सार्य तिरश्चीं चिकुरसटामश्रुप्रवाहपूरित- मार्द्रं च किचिच्च्युतमुत्क्षिप्य हस्तेन स्तनोत्तरीयं तरङ्गितमिव नखांशु- पटलेन मग्नांशुकपटान्ततनुताम्रलेखालाञ्छितलावण्यकुब्जिकोवर्जितराज- तराजहंसास्यसमुद्गीर्णेन पयसा प्रक्षाल्य मुखकमलं कलमूकोलोकविधृते वासःशकले शुचिनि समुन्मृज्य पाणी सुतवदनविनिहितनिभृतनयन- युगला चिरं स्थित्वा पुनः पुनरायतं निःश्वस्यावादीत्—'वत्स ! नासि न प्रियो निर्गुणो वा परित्यागार्हो वा । स्तन्येनेव सह त्वया पीतं मे
असमय मे यमराज की निन्दा करने लगी—'अरे क्रूर यमराज, तूने मुझे लूट लिया।' इस प्रकार वह साधारण नारी के समान बहुत देर तक फूट-फूटकर रोती रही । जब शोक का वेग कम हुआ तब उसने पुत्र को स्नेह के साथ उठा लिया । रो पड़े हुये उसकी पपनियों में लगी हुई आँसू की बूँदों के रूप में पिघली-सी आँखों को अपने हाथ से पोंछा । स्वयं भी उसने गाढ़ प्रेम के कारण समाप्त सफेदी वाले, खौलते हुए आँसू से भींगे कोप वाले, तारों के समान उजले-उजले फुहारों से भरी पपनी वाले, हमेशा झरते हुये अपने नेत्र पोंछे । आँसू से भींगे कपोलों में चिपकी हुयी शोक के कारण खुलकर लटकती हुई अलकोंको कान पर चढ़ा लिया । नीचे खिसकी हुयी बालिका (एक कर्णाभरण) से व्याकुल अपने टेढ़े बालों को समेट लिया । आँसू के प्रवाह से भरे हुये भींगे कुछ खिसके हुये स्तनोत्तरीय को जो उसके नखों की किरणों से तरङ्गित हो रहा था, हाथ से ऊपर उठा लिया । शरीर से चिपटे हुये अंशुक वस्त्र के छोर पर डाली गयी पतली ताँबे की धारी से जिसका सौन्दर्य बढ़ रहा था, ऐसी कुब्जिका पुतली से झुकाकर पकड़े हुये चाँदी के बने राजहंस की आकृति के पात्र के मुख से निकलते हुये जल से
१. 'कुब्जिका' इति पाठान्तरम् ।