हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम उच्छ्वासः २८३ हृदयम् । अस्मिंश्च समये प्रभूतप्रभुप्रसादान्तरिता त्वां न पश्यति दृष्टिः । अपि च पुत्रक ! पुरुषान्तरविलोकनव्यसनिनी राज्योपकरणमकरुणा वा नास्मि लक्ष्मीः क्षमा वा । कुलकलत्रमस्मि चारित्रमात्रधना धर्मधवले कुले जाता । किं विस्मृतोऽसि मां समरशतशौण्डस्य पुरुषप्रकाण्डस्य उसने अपना मुखकमल धोया¹। गूँगे द्वारा लिये हुये पवित्र वस्त्रखण्ड से उसने हाथ पोछे। तब पुत्र के मुखड़े में एक टक से आँखें गड़ा कर देर तक ठहर गई और बार-बार लम्बी सांस लेकर बोली—'वत्स, तुम मेरे प्रिय नहीं हो ऐसी बात नहीं और निर्गुण अथवा परित्याग के योग्य भी नहीं हो । दूध के साथ ही तुमने मेरे हृदय को पी लिया है। इस समय अत्यन्त स्वामिभक्ति से अन्तरित हो जाने के कारण मेरी दृष्टि तुम्हें नहीं देख रही है। हे प्यारे पुत्र, दूसरे पुरुष को भी देखने का व्यसन रखने वाली राज्य का उपकरण मात्र और करुणा से हीन लक्ष्मी या पृथिवी मैं नहीं हूँ । मैं कुलकलत्र हूँ, हमारा चारित्र ही धन है और धर्म से उज्ज्वल कुल में मैंने जन्म लिया है । क्या तुम भूल गए कि मैं सैकड़ों समर में मद करने वाले सिंह के समान उन पुरुष-प्रकाण्ड की १. इस पंक्ति के चार अर्थ श्लेष द्वारा और भी लगाये जाते हैं जिसका स्पष्टीकरण डॉ० वासुदेवशरण जी अग्रवाल ने अपने 'हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन' में विस्तार के साथ किया है। संक्षेप में वह इस प्रकार है—( १ ) पहला अर्थ, हंसाकृति पात्र को लक्ष्य करके जो अनुवाद में दिया गया है। ( २ ) राजहंस पक्षि को लक्ष्य करके—छिपे हुये अंखुवे के छिलके के किनारे पर पड़ी हुयी महीन लाल धारी से सुहावने सिंघाड़े को छोड़ कर जाने वाले श्वेत राजहंस के मुख से उछले हुये जल से ( सरोवर में ) कमल का मुख धोकर । ( ३ ) राजहंस के ही पक्ष में जल में पड़ी किरणों के जलरूपी पट के चारों ओर झलकती हुयी पतली लाल किनारी से सुशोभित, गर्दन मोड़कर झुका हुआ श्वेत राजहंस मुख से जल में कलोल करता हुआ कमल के मुख को धो रहा है । ( ४ ) ब्रह्मा के हंस के पक्ष में—गीले अंशुक की धोती पहने ब्रह्मा के लाल शरीर के सम्पर्क से सुशोभित, दुबककर बैठा हुआ उनका श्रेष्ठ हंस मुख के क्षीरसागर का पय लेकर कमलासन को धो रहा है । ( ५ ) राजहंस अर्थात् प्रभाकरवर्धन और रानी यशोमती के पक्ष में—सटे हुये अंशुक वस्त्र के छोर की पतली लाल किनारी से दीप्त सौन्दर्य वाली कुब्जिका ( सुन्दरी कन्या के हाथ में रखे हुये पानपात्र ) की ओर झुके हुये गौर वर्ण हंसजातीय सम्राट् प्रभाकरवर्धन के मुख से निकले हुये तरल ( मधु ) गण्डूष से ( रानी यशोमती ने अपना ) कमलरूपी मुख धोकर ।—मर्मांशुक उत्तरीय के छोर पर बनी हुई महीन लाल किनारी से जिनका सौन्दर्य झलक रहा है और जो कुब्जिका की ओर ( मधुपान के लिये ) झुके हैं, ऐसे गौरवर्ण राजा के मुख से सिंचित गण्डूषसेक से यशोमती ने अपना मुख-कमल प्रक्षालित किया ।