हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ हर्षचरितम् केसरिण इव केसरिणीं गृहिणीम् ? वीरजा वीरजाया वीरजननी च मादृशी पराक्रमक्रयक्रीता कथमम्यथा कुर्यात् । एवंविधेन पित्रा ते भरत- भगीरथनाभावनिभेन नरेन्द्रवृन्दारकेण गृहीतः पाणिः । आसेवितः सेवा- संभ्रान्तानन्तसामन्तसीमन्तिनीसमावर्जितजाम्बूनदघटाभिषेकः शिरसा । लब्धो मनोरथदुर्लभो महादेवीपट्टबन्धसत्कारलाभो ललाटेन । आपीतौ युष्मद्विधैः पुत्रैरमित्रकलत्रबन्दिवृन्दविधूयमानचामरमरुञ्चलचीनांशुकधरौ पयोधरौ । सपत्नीनां शिरःसु निहितं नमन्निखिलकटककुटुम्बिनीकिरीट- माणिक्यमालार्चितं चरणयुगलकम् । एवं कृतार्थसर्वावयवा किमपरमपेक्षे क्षीणपुण्या ? मर्तुमविधवैव वाञ्छामि । न च शक्नोमि दग्धस्य स्वभर्तु- रार्यपुत्रविरहिता रतिरिव निरर्थकान्प्रलापान्कर्तुम् । पितुश्च ते पादधूलि- रिव प्रथमं गगनगमनमावेदयन्ती बहुमता भविष्यामि शूरानुरागिणीनां सुराङ्गनानाम् । प्रत्यग्रदृष्टदारुणदुःखदग्धायाश्च मे किं धक्ष्यति धूमध्वजः । जाम्बूनदं सुवर्णम् । पादधूलिरिवेति । सापि प्रथमगतागमनमावेदयति । धक्ष्यति भस्मीकरिष्यति । धूमध्वजोऽग्निः । शेरनी जैसी घरनी हूं ? वीर पिता की पुत्री, वीर की पत्नी एवं वीर पुत्र को उत्पन्न करने वाली, पराक्रम-द्रव्य से खरीदी गई मुझ जैसी कुछ और कर सकती है ? भरत, भगीरथ एवं नाभाग के सदृश राजाओं में श्रेष्ठ तुम्हारे पिता ने मेरा पाणिग्रहण किया है । सेवामें परायण अनेक सामन्तों की पत्नियों ने सुवर्ण के घड़े उठा कर मेरे सिर पर अभिषेक करके मेरी सेवा की है। मनोरथ से भी दुर्लभ महादेवीपद के पट्टबंध-सत्कार को मैंने अपने ललाट से प्राप्त कर लिया है। तुम्हारे सदृश पुत्रों ने शत्रु की पत्नियों द्वारा झले गए चँवर की हवा से चंचल चीनांशुक धारण करने वाले मेरे स्तनों का पान किया है। झुकती हुई सारे कटक (स्कन्धावार) की कुटुम्बिनियों के किरीट में लगे हुए माणिक्य की माला से पूजित मेरे चरण सपत्नियों के सिर पर रह चुके हैं। इस प्रकार मेरे सब अङ्ग कृतकृत्य हो गए हैं तो क्षीण पुण्यों वाली मैं अब किसकी चाह करूँ ? इसलिए अविधवा ही रह कर मरना चाहती हूँ। विधवा रति की भाँति मैं जले हुए अपने पति के शोक में निरर्थक प्रलाप नहीं कर सकती । तुम्हारे पिता की पैर की धूल के समान आकाश में अपने गमन को पहले ही सूचित करती हुई शूरानुरागिणी देवाङ्गनाओं के आदर का पात्र बनूंगी। आँखों के सामने देखे गए दारुण दुःख से जली हुई मुझे अग्नि क्या जलाएगी ? मरने से अधिक साहस का काम इस समय मेरा जीना है। स्नेह का इन्धन जिसका कभी समाप्त