हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पञ्चम उच्छ्वासः २८३ हृदयम् । अस्मिंश्च समये प्रभूतप्रभुप्रसादान्तरिता त्वां न पश्यति दृष्टिः । अपि च पुत्रक ! पुरुषान्तरविलोकनव्यसनिनी राज्योपकरणमकरुणा वा नास्मि लक्ष्मीः क्षमा वा । कुलकलत्रमस्मि चारित्रमात्रधना धर्मधवले कुले जाता । किं विस्मृतोऽसि मां समरशतशौण्डस्य पुरुषप्रकाण्डस्य उसने अपना मुखकमल धोया¹। गूँगे द्वारा लिये हुये पवित्र वस्त्रखण्ड से उसने हाथ पोछे। तब पुत्र के मुखड़े में एक टक से आँखें गड़ा कर देर तक ठहर गई और बार-बार लम्बी सांस लेकर बोली—'वत्स, तुम मेरे प्रिय नहीं हो ऐसी बात नहीं और निर्गुण अथवा परित्याग के योग्य भी नहीं हो । दूध के साथ ही तुमने मेरे हृदय को पी लिया है। इस समय अत्यन्त स्वामिभक्ति से अन्तरित हो जाने के कारण मेरी दृष्टि तुम्हें नहीं देख रही है। हे प्यारे पुत्र, दूसरे पुरुष को भी देखने का व्यसन रखने वाली राज्य का उपकरण मात्र और करुणा से हीन लक्ष्मी या पृथिवी मैं नहीं हूँ । मैं कुलकलत्र हूँ, हमारा चारित्र ही धन है और धर्म से उज्ज्वल कुल में मैंने जन्म लिया है । क्या तुम भूल गए कि मैं सैकड़ों समर में मद करने वाले सिंह के समान उन पुरुष-प्रकाण्ड की १. इस पंक्ति के चार अर्थ श्लेष द्वारा और भी लगाये जाते हैं जिसका स्पष्टीकरण डॉ० वासुदेवशरण जी अग्रवाल ने अपने 'हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन' में विस्तार के साथ किया है। संक्षेप में वह इस प्रकार है—( १ ) पहला अर्थ, हंसाकृति पात्र को लक्ष्य करके जो अनुवाद में दिया गया है। ( २ ) राजहंस पक्षि को लक्ष्य करके—छिपे हुये अंखुवे के छिलके के किनारे पर पड़ी हुयी महीन लाल धारी से सुहावने सिंघाड़े को छोड़ कर जाने वाले श्वेत राजहंस के मुख से उछले हुये जल से ( सरोवर में ) कमल का मुख धोकर । ( ३ ) राजहंस के ही पक्ष में जल में पड़ी किरणों के जलरूपी पट के चारों ओर झलकती हुयी पतली लाल किनारी से सुशोभित, गर्दन मोड़कर झुका हुआ श्वेत राजहंस मुख से जल में कलोल करता हुआ कमल के मुख को धो रहा है । ( ४ ) ब्रह्मा के हंस के पक्ष में—गीले अंशुक की धोती पहने ब्रह्मा के लाल शरीर के सम्पर्क से सुशोभित, दुबककर बैठा हुआ उनका श्रेष्ठ हंस मुख के क्षीरसागर का पय लेकर कमलासन को धो रहा है । ( ५ ) राजहंस अर्थात् प्रभाकरवर्धन और रानी यशोमती के पक्ष में—सटे हुये अंशुक वस्त्र के छोर की पतली लाल किनारी से दीप्त सौन्दर्य वाली कुब्जिका ( सुन्दरी कन्या के हाथ में रखे हुये पानपात्र ) की ओर झुके हुये गौर वर्ण हंसजातीय सम्राट् प्रभाकरवर्धन के मुख से निकले हुये तरल ( मधु ) गण्डूष से ( रानी यशोमती ने अपना ) कमलरूपी मुख धोकर ।—मर्मांशुक उत्तरीय के छोर पर बनी हुई महीन लाल किनारी से जिनका सौन्दर्य झलक रहा है और जो कुब्जिका की ओर ( मधुपान के लिये ) झुके हैं, ऐसे गौरवर्ण राजा के मुख से सिंचित गण्डूषसेक से यशोमती ने अपना मुख-कमल प्रक्षालित किया ।
२८४ हर्षचरितम् केसरिण इव केसरिणीं गृहिणीम् ? वीरजा वीरजाया वीरजननी च मादृशी पराक्रमक्रयक्रीता कथमम्यथा कुर्यात् । एवंविधेन पित्रा ते भरत- भगीरथनाभावनिभेन नरेन्द्रवृन्दारकेण गृहीतः पाणिः । आसेवितः सेवा- संभ्रान्तानन्तसामन्तसीमन्तिनीसमावर्जितजाम्बूनदघटाभिषेकः शिरसा । लब्धो मनोरथदुर्लभो महादेवीपट्टबन्धसत्कारलाभो ललाटेन । आपीतौ युष्मद्विधैः पुत्रैरमित्रकलत्रबन्दिवृन्दविधूयमानचामरमरुञ्चलचीनांशुकधरौ पयोधरौ । सपत्नीनां शिरःसु निहितं नमन्निखिलकटककुटुम्बिनीकिरीट- माणिक्यमालार्चितं चरणयुगलकम् । एवं कृतार्थसर्वावयवा किमपरमपेक्षे क्षीणपुण्या ? मर्तुमविधवैव वाञ्छामि । न च शक्नोमि दग्धस्य स्वभर्तु- रार्यपुत्रविरहिता रतिरिव निरर्थकान्प्रलापान्कर्तुम् । पितुश्च ते पादधूलि- रिव प्रथमं गगनगमनमावेदयन्ती बहुमता भविष्यामि शूरानुरागिणीनां सुराङ्गनानाम् । प्रत्यग्रदृष्टदारुणदुःखदग्धायाश्च मे किं धक्ष्यति धूमध्वजः । जाम्बूनदं सुवर्णम् । पादधूलिरिवेति । सापि प्रथमगतागमनमावेदयति । धक्ष्यति भस्मीकरिष्यति । धूमध्वजोऽग्निः । शेरनी जैसी घरनी हूं ? वीर पिता की पुत्री, वीर की पत्नी एवं वीर पुत्र को उत्पन्न करने वाली, पराक्रम-द्रव्य से खरीदी गई मुझ जैसी कुछ और कर सकती है ? भरत, भगीरथ एवं नाभाग के सदृश राजाओं में श्रेष्ठ तुम्हारे पिता ने मेरा पाणिग्रहण किया है । सेवामें परायण अनेक सामन्तों की पत्नियों ने सुवर्ण के घड़े उठा कर मेरे सिर पर अभिषेक करके मेरी सेवा की है। मनोरथ से भी दुर्लभ महादेवीपद के पट्टबंध-सत्कार को मैंने अपने ललाट से प्राप्त कर लिया है। तुम्हारे सदृश पुत्रों ने शत्रु की पत्नियों द्वारा झले गए चँवर की हवा से चंचल चीनांशुक धारण करने वाले मेरे स्तनों का पान किया है। झुकती हुई सारे कटक (स्कन्धावार) की कुटुम्बिनियों के किरीट में लगे हुए माणिक्य की माला से पूजित मेरे चरण सपत्नियों के सिर पर रह चुके हैं। इस प्रकार मेरे सब अङ्ग कृतकृत्य हो गए हैं तो क्षीण पुण्यों वाली मैं अब किसकी चाह करूँ ? इसलिए अविधवा ही रह कर मरना चाहती हूँ। विधवा रति की भाँति मैं जले हुए अपने पति के शोक में निरर्थक प्रलाप नहीं कर सकती । तुम्हारे पिता की पैर की धूल के समान आकाश में अपने गमन को पहले ही सूचित करती हुई शूरानुरागिणी देवाङ्गनाओं के आदर का पात्र बनूंगी। आँखों के सामने देखे गए दारुण दुःख से जली हुई मुझे अग्नि क्या जलाएगी ? मरने से अधिक साहस का काम इस समय मेरा जीना है। स्नेह का इन्धन जिसका कभी समाप्त
पञ्चम उच्छ्वासः २८५ मरणाच्च मे जीवितमेवास्मिन्समये साहसम् । अतिशीतलः पतिशोका- नलादक्षयस्नेहेन्धनादस्मादनलः । कैलासकल्पे प्रवसति जीवेश्वरे जरत्तृण- कणिकालघीयसि जीविते लोभ इति क घटते ? अपि च जीवन्तीमपि मां नरपतिमरणावधीरणमहापातकिनीं न स्पृक्ष्यन्ति पुत्र ! पुत्रराज्य- सुखानि । दुःखदग्धानां च भूतिरमङ्गला चाप्रशस्ता च निरुपयोगा च भवति । वत्स ! विश्वस्तानां यशसा स्थातुमिच्छामि लोके न वपुषा । तदहमेव त्वां तावत्तात् ! प्रसादयामि न पुनर्मनोरथप्रातिकूल्येन कदर्थ- नीयास्मि ।' इत्युक्त्वा पादयोरपतत् । स तु ससंभ्रममपनीय चरणयुगलमवनमिततनुरुभयकरविधृतवपुष- मवनितलगतशिरसमुद्नमयन्मातरम् । दुर्निवारतां च शुचः समवधार्य कुलयोषिदुचितां च तामेव श्रेयसीं मन्यमानः क्रियां कृतनिश्चयां च तां ज्ञात्वा तूष्णीमधोमुखोऽभवत् । अभिनन्दति हि स्नेहकातरापि कुलीनता देशकालानुरूपम् । देव्यपि यशोमती परिष्वज्य समाघ्राय च शिरसि निर्गत्य चरणाभ्यामेव चान्तः- भूतिः समृद्धिः, भस्म च । विश्वस्तानां विधवानाम् । नहीं होता ऐसे पति के इस शोकानल से कहीं चिता की आग शीतल है । कैलास के सदृश प्राणनाथ जब प्रवास कर रहे हैं तो पुराने तृण के टुकड़े की तरह तुच्छ जीवन के लिए लोभ की बात कहाँ घटती है ? हे पुत्र ! पुत्र के राज्यसुख राजा के मरण के तिरस्कारजन्य पातक वाली जीती हुई भी मुझे स्पर्श नहीं करेंगे । जो दुःख से जल चुके हैं उनके लिए ऐश्वर्य अमंगल, अप्रशस्त और उपयोगरहित होता है । हे वत्स, मैं विधवाओं के यश से इस लोक में रहना चाहती हूं, शरीर से नहीं । इसलिए मैं ही तुम्हें मनाती हूँ कि फिर मेरी इच्छा के प्रतिकूल मुझे दुःखी न करना ।' यह कह कर पैर पर गिर गईं । कुमार हर्ष ने शीघ्र अपने पैर हटा लिए और झुक कर दोनों हाथों से पकड़ लिया और सिर से जमीन पर टिकी हुई माता को उठा लिया । उन्होंने निश्चय किया कि शोक का हटाना कठिन है । कुलाङ्गनाओं के लिए उचित उसी क्रिया को उन्होंने श्रेयस्कर माना । माता को दृढ़प्रतिज्ञ जानकर चुपचाप अधोमुख हो रहे । कुलीन लोग स्नेह से व्याकुल होकर भी देशकाल के अनुरूप आचार का अभिनन्दन करते हैं । देवी यशोमती ने पुत्र का आलिङ्गन कर और सिर सूंघ कर अन्तःपुर से पैदल ही निकल गई और पुरवासियों के आर्तनाद से प्रतिध्वनित दिशाओं से मानों
२८४ हर्षचरितम् केसरिण इव केसरिणीं गृहिणीम् ? वीरजा वीरजाया वीरजननी च मादृशी पराक्रमक्रयक्रीता कथमम्यथा कुर्यात् । एवंविधेन पित्रा ते भरत- भगीरथनाभागनिभेन नरेन्द्रवृन्दारकेण गृहीतः पाणिः । आसेवितः सेवा- संभ्रान्तानन्तसामन्तसीमन्तिनीसमावर्जितजाम्बूनदघटाभिषेकः शिरसा । लब्धो मनोरथदुर्लभो महादेवीपट्टबन्धसत्कारलाभो ललाटेन । आपीतौ युष्मद्विधैः पुत्रैरमित्रकलत्रबन्दिवृन्दविधूयमानचामरमरुच्चलचीनांशुकधरौ पयोधरौ । सपत्नीनां शिरःसु निहितं नमन्निखिलकटककुटुम्बिनीकिरीट- माणिक्यमालाचितं चरणयुगलकम् । एवं कृतार्थसर्वावयवा किमपरमपेक्षे क्षीणपुण्या ? मर्तुमविधवैव वाञ्छामि । न च शक्नोमि दग्धस्य स्वभर्तु- रार्यपुत्रविरहिता रतिखि निरर्थकाम्प्रलापान्कर्तुम् । पितुश्च ते पादधूलि- रिव प्रथमं गगनगमनमावेदयन्ती बहुमता भविष्यामि शूरानुरागिणीनां सुराङ्गनानाम् । प्रत्यग्रदृष्टदारुणदुःखदग्धायाश्च मे किं धक्ष्यति धूमध्वजः । जाम्बूनदं सुवर्णम् । पादधूलिरिवेति । सापि प्रथमगतागमनमावेदयति । धक्ष्यति भस्मीकरिष्यति । धूमध्वजोऽग्निः । शेरनी जैसी घरनी हूँ ? वीर पिता की पुत्री, वीर की पत्नी एवं वीर पुत्र को उत्पन्न करने वाली, पराक्रम-द्रव्य से खरीदी गई मुझ जैसी कुछ और कर सकती है ? भरत, भगीरथ एवं नाभाग के सदृश राजाओं में श्रेष्ठ तुम्हारे पिता ने मेरा पाणिग्रहण किया है । सेवामें परायण अनेक सामन्तों की पत्नियों ने सुवर्ण के घड़े उठा कर मेरे सिर पर अभिषेक करके मेरी सेवा की है। मनोरथ से भी दुर्लभ महादेवीपद के पट्टबंध-सत्कार को मैंने अपने ललाट से प्राप्त कर लिया है। तुम्हारे सदृश पुत्रों ने शत्रु की पत्नियों द्वारा झले गए चँवर की हवा से चंचल चीनांशुक धारण करने वाले मेरे स्तनों का पान किया है। झुकती हुई सारे कटक (स्कन्धावार) की कुटुम्बिनियों के किरीट में लगे हुए माणिक्य की माला से पूजित मेरे चरण सपत्नियों के सिर पर रह चुके हैं। इस प्रकार मेरे सब अङ्ग कृतकृत्य हो गए हैं तो क्षीण पुण्यों वाली मैं अब किसकी चाह करूँ ? इसलिए अविधवा ही रह कर मरना चाहती हूँ। विधवा रति की भाँति मैं जले हुए अपने पति के शोक में निरर्थक प्रलाप नहीं कर सकती। तुम्हारे पिता की पैर की धूल के समान आकाश में अपने गमन को पहले ही सूचित करती हुई शूरानुरागिणी देवाङ्गनाओं के आदर का पात्र बनूंगी। आँखों के सामने देखे गए दारुण दुःख से जली हुई मुझे अग्नि क्या जलाएगी ? मरने से अधिक साहस का काम इस समय मेरा जीना है। स्नेह का इन्धन जिसका कभी समाप्त
पञ्चम उच्छ्वासः २८५ मरणाच्च मे जीवितमेवास्मिन्समये साहसम् । अतिशीतलः पतिशोका- नलादक्षयस्नेहेन्धनादस्मादनलः । कैलासकल्पे प्रवसति जीवेश्वरे जरत्तृण- कणिकालघीयसि जीविते लोभ इति क घटते ? अपि च जीवन्तीमपि मां नरपतिमरणावधीरणमहापातकिनीं न स्पृश्यन्ति पुत्र ! पुत्रराज्य- सुखानि । दुःखदग्धानां च भूतिरमङ्गला चाप्रशस्ता च निरुपयोगा च भवति । वत्स ! विश्वस्तानां यशसा स्थातुमिच्छामि लोके न वपुषा । तदहमेव त्वां तावत्तात ! प्रसादयामि न पुनर्मनोरथप्रतिकूल्येन कदर्थ- नीयास्मि ।' इत्युक्त्वा पादयोरपतत् । स तु ससंभ्रममपनीय चरणयुगलमवनमिततनुरुभयकरविधृतवपुष- मवनितलगतशिरसमुदनमयनमातरम् । दुर्निवारतां च शुचः समवधार्य कुलयोषिदुचितां च तामेव श्रेयसीं मन्यमानः क्रियां कृतनिश्चयां च तां ज्ञात्वा तूष्णीमधोमुखोऽभवत् । अभिनन्दति हि स्नेहकातरापि कुलीनता देशकालानुरूपम् । देव्यपि यशोमती परिष्वज्य समाघ्राय च शिरसि निर्गत्य चरणाभ्यामेव चान्तः- भूतिः समृद्धिः, भस्म च । विश्वस्तानां विधवानाम् । नहीं होता एस पति के इस शोकानल से कहीं चिता की आग शीतल है । कैलास के सदृश प्राणनाथ जब प्रवास कर रहे हैं तो पुराने तृण के टुकड़े की तरह तुच्छ जीवन के लिए लोभ की बात कहाँ घटती है ? हे पुत्र ! पुत्र के राज्यसुख राजा के मरण के तिरस्कारजन्य पातक वाली जीती हुई भी मुझे स्पर्श नहीं करेंगे । जो दुःख से जल चुके हैं उनके लिए ऐश्वर्य अमंगल, अप्रशस्त और उपयोगरहित होता है । हे वत्स, मैं विधवाओं के यश से इस लोक में रहना चाहती हू, शरीर से नहीं । इसलिए मैं ही तुम्हें मनाती हूँ कि फिर मेरी इच्छा के प्रतिकूल मुझे दुःखी न करना ।' यह कह कर पैर पर गिर गई । कुमार हर्ष ने शीघ्र अपने पैर हटा लिए और झुक कर दोनों हाथों से पकड़ लिया और सिर से जमीन पर टिकी हुई माता को उठा लिया । उन्होंने निश्चय किया कि शोक का हटाना कठिन है । कुलाङ्गनाओं के लिए उचित उसी क्रिया को उन्होंने श्रेयस्कर माना । माता को दृढ़प्रतिज्ञ जानकर चुपचाप अधोमुख हो रहे । कुलीन लोग स्नेह से व्याकुल होकर भी देशकाल के अनुरूप आचार का अभिनन्दन करते हैं । देवी यशोमती ने पुत्र का आलिङ्गन कर और सिर सूंघ कर अन्तःपुर से पैदल ही निकल गई और पुरवासियों के आर्तनाद से प्रतिध्वनित दिशाओं से मानो
२८६ हर्षचरितम् पुरातपौराक्रन्दप्रतिशब्दनिर्भराभिरुपरुध्यमानेव दिग्भिः सरस्वतीतीरं ययौ । तत्र च स्त्रीस्वभावकातरैर्दृष्टिपातैः प्रविकसितरक्तपङ्कजपुञ्जैरिवार्च- यित्वा भगवन्तं भानुमन्तमिव मूर्तिरैन्दवी चित्रभानुं प्राविशत् । इतरोऽपि मातृमरणविह्वलो बन्धुवर्गपरिवृतः पितुः पार्श्वं प्रायात् । अपश्यच्च स्वल्पा- वशेषप्राणवृत्तिं परिवर्त्यमानतारकं तारकराजमित्रास्तमभिलषन्तं जनयि- तारम् । असह्यशोकोद्रेकाभिद्रुतश्च त्याजितः स्नेहेन धैर्यम् । आश्लिष्यास्य सकलदुर्मदमहीपालमौलिमालालालितौ पादपद्मावन्तस्तापान्मुखचन्द्र- मिव द्रवीभवन्तं दशनज्योत्स्नाजालमिव जलतामापद्यमानं लोचनलाव- ण्यमिव विलीयमानं मुखसुधारसमिव स्यन्दमानम् , अच्छाच्छमश्रुस्रो- तसां संतानं महामेघमयविलोचन इव वर्षन्नितरवद्विमुक्तारावश्चिरं रुरोद । राजा तु तमुपरुध्यमानदृष्टिरविरतरुदितशब्दाश्रितश्रवणः प्रत्यभिज्ञाय शनैः शनैरवादीत्— “पुत्र ! नार्हस्येवं भवितुम् । भवद्विधा न ह्यमहा- सत्त्वाः । महासत्त्वता हि प्रथममवलम्बनं लोकस्य पश्चाद्राजजीविता । अमावास्यायामिन्दुर्भानुमन्तं प्रविशतीति प्रसिद्धम् । चित्रभानुमग्निम् । तारक- राजं चन्द्रम् । असह्यस्यादौ चिरं रुरोदेति संबन्धः । उद्रेक आधिक्यम् । उपरुध्यमाना उपरोधवती दृष्टिर्बुद्धिर्यस्य सः । अवलम्बनमाश्रयः । राजजीविता रोकी जाने पर भी सरस्वती के तीर पर आ गई । वहाँ स्त्रीस्वभाव के कारण अपनी कातर दृष्टियों के कमलों से अर्चना करके भगवान् अग्निदेव में उस प्रकार प्रवेश किया जैसे चन्द्रमा की कला सूर्य में प्रवेश करती है । माता के मरण से विह्वल हर्ष भी बन्धुओं के बीच घिर कर पिता के समीप पहुँचे । जिनके प्राण कुछ-कुछ बच रहे थे और जो आँखें तरेरते जा रहे थे ऐसे पिता को अस्त होना ही चाहते हुए चन्द्रमा के समान देखा । असह्य शोक के आवेग से अभिभूत हो जाने से स्नेह के कारण उनका धैर्य टूट गया । समस्त दुर्मद राजाओं की मौलिमाला से लालित पिता का चरणकमल पकड़ कर बैठ गए । ताप के कारण मानों उनका मुखचन्द्र द्रवीभूत हो रहा था, या दाँतों की ज्योत्स्ना ही जल बनती जा रही थी, या आँखों का सौन्दर्य पिघल रहा था, या मुख का अमृतरस ही टपक रहा था, इस प्रकार वे महामेघ के समान अपनी आँखों से आँसू का प्रवाह बरसाने लगे और पुका फाड़ कर देर तक रोते रहे । राजा की दृष्टि मुंद गई थी, फिर भी हमेशा कुमार के रोने की आवाज के कान में आने से जान कर वे धीरे-धीरे बोले—‘पुत्र, ऐसे न बनो । तुम महासत्त्व हो । महा-
पञ्चम उच्छ्वासः २८७ सत्त्ववतां चाग्रणीः सर्वातिशायाश्रितः क भवान् , क वैक्लव्यम् ? 'कुल- प्रदीपोऽसि' इति दिवसकरसदृशतेजसस्ते लघूकरणमिव । 'पुरुषसिंहो- ऽसि' इति शौर्यपटुप्रज्ञोपबृंहितपराक्रमस्य निन्देव । 'क्षितिरियं तव' इति लक्षणाख्यातचक्रवर्तिपदस्य पुनरुक्तमिव । 'गृह्यतां श्रीः' इति स्वयमेव श्रिया परिगृहीतस्य विपरीतमिव । 'अध्यास्यतामयं लोकः' इत्युभयलोक- विजिगीषोरपुष्कलमिव । 'स्वीक्रियतां कोश' ज्ञातं शशिकरनिकरनिर्मल- यशःसंचयैकाभिनिवेशिनो निरुपयोगमिव । 'आत्मीक्रियतां राजकम्' इति गुणगणात्मीकृतजगतो गतार्थमिव । 'उह्यतां राज्यभारः' इति भुवन- त्रयभारवहनोचितस्यानुचितनियोग इव । 'प्रजाः परिरक्ष्यन्ताम्' इति दीर्घदोर्दण्डार्गलितदिक्मुखस्यानुवाद इव । 'परिजनः परिपाल्यताम्' इति लोकपालोपमस्यानुषङ्गिकमिव । 'सातत्येन शस्त्राभ्यासः कार्यः' इति धनुर्गुणकिणकलङ्ककालीकृतप्रकोष्ठस्य किमादिश्यते । 'निग्राह्यतां चापल- राजान्वयिता । कुलप्रदीपोऽसीत्यादौ पूर्ववदाक्षेपाभ्यूहः । आनुषङ्गिकं प्रस्तावागतम् । सत्त्वता ही लोक का पहला आलम्बन है, फिर राजपुत्रता । सत्त्ववान् लोगों के अग्रणी और सब में बढ़े चढ़े कहाँ तुम और कहाँ यह व्याकुलता ? 'तुम कुल के दीपक हो' यह कहना सूर्य सदृश तेजस्वी तुम्हे कम करने के समान है। 'तुम पुरुषसिंह हो' यह कहना शौर्य और प्रखर बुद्धि द्वारा बढ़े हुए पराक्रम वाले तुम्हारी निन्दा के समान है। 'यह पृथिवी तुम्हारी है' यह कहना लक्षण से ही जाने गए चक्रवर्ती के पद वाले तुम्हारे लिए दुहराने के समान है। 'श्री का ग्रहण करो' यह कहना स्वयं ही श्री के द्वारा स्वीकार किए गए तुम्हारे विपरीत है। 'इस संसार में राज्य करो' यह कहना दोनों लोकों को जीतने की इच्छा रखने वाले तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं । 'खजाने को स्वीकार करो' यह कहना चन्द्र की किरणों के समान निर्मल यशसमूह का ही एक अभिनिवेश रखने वाले तुम्हारे लिए किसी उपयोग का नहीं। 'राजसमूह को अपनाओ' यह कहना अपने गुणों से संसार को अपनाने वाले तुम्हारे लिए कोई नई बात नहीं। 'राज्यभार का वहन करो' यह कहना तीनों भुवन के भारवहन करने योग्य तुम्हारे लिए अनुचित आज्ञा है। 'प्रजाओं की रक्षा करो' यह कहना अपने लम्बे भुजदण्ड से दिशाओं को रोक रखने वाले तुम्हारे लिए अनुवाद मात्र है। 'परिजन की रक्षा करो' यह कहना लोकपालों के सदृश तुम्हारे लिए आनुषङ्गिक है। 'नियम से शस्त्राभ्यास करना' यह कहना धनुष की डोर की रगड़ खाने से काले प्रकोष्ठ वाले तुम्हारे लिए
, २८८ हर्षचरितम् जातम्' इति नूतनतरवयसि निगृहीतेन्द्रियस्य निरवकाशेव मे वाणी । ‘निरवशेषतां शत्रवो नेयाः' इति सहजस्य तेजस एवेयं चिन्ता ।” इत्येवं वदन्नेवापुनरुन्मीलनाय निमिमील राजसिंहो लोचने प्रत्यपद्यत च पूषात्मजः । अस्मिन्नेवान्तरे पूषाप्यायुषेव तेजसा व्ययुज्यत ततश्च लज्जमान इव नरपतिजीवितापहरणजनितादात्मजापराधादधोमुखः समभवत् । भूपा- लाभावशोकशिखिनेवान्तस्ताप्यमानस्ताम्रतां प्रपेदे । मन्दं मन्दमप्रियप्र- श्नार्थमिव लौकिकीं स्थितिमनुवर्तमानोऽवातरद्दिवः । दित्सुरिव जनेशाय जलाञ्जलिमपरजलनिधिसमीपमुपससर्प । सद्योदत्तजलाञ्जलिर्दुःखदहन- दग्धमिव करसहस्रमालोहितमाधत्त । एवं च महानराधिपनिधननिधीयमानविपुलवैराग्य इव शान्तवपुषि, विशति गिरिगुहागह्वरं गभस्तिमालिनि, समुपोह्यमानमहाजनाश्रुदुर्दिना- अपुनरुन्मीलनाय पुनरप्रबोधनाय । निमिमील न्यमीलयत । पूष्ण आत्मजो यमः । प्रत्यपद्यत प्राप्तः । एवं चेत्यादौ । अस्मिन्सति नरेन्द्रो हुताशनसक्रियया यशःशेषतामनीयतेति संबन्धः । गभस्तीनरश्मीन्मलते धारयतीति गभस्तिमाली सूर्यस्तस्मिन् । समुपो- आदेश क्या देना है ? 'चपलताओं पर निग्रह करना' यह बात नवीनतर इस वय में इन्द्रियों को वश में रखने वाले तुम्हारे लिए घटती नहीं । 'अपने शत्रुओं को समाप्त करना' यह सहज तेज वाले तुम्हारे लिए अफसोस की बात है ।” यह कहते-कहते ही राजा ने हमेशा के लिए आँखें बन्द कर लीं और यम पहुंच आया । इसी बीच सूर्य भी आयु की भांति अपने तेज से रहित हो गया और मानों राजा के प्राण हरने से उत्पन्न अपने पुत्र यम के अपराध के कारण मुंह नीचा करके लज्जित होने लगा । राजा के अभाव के शोकानल से मानों भीतर ही भीतर संतप्त होते हुए ताम्र वर्ण का हो गया । लोकमर्यादा के अनुसार इस अप्रिय समाचार को पूछने के लिए ( राजा की मृत्यु कैसे हुई ? ) धीरे-धीरे आकाश से उतर गया । मानों मरे हुए राजा को जलांजलि देने के लिये पश्चिम समुद्र के समीप पहुँचा, शीघ्र जलांजलि दी और मानों दुःख की अग्नि से जल जाने से लाल अपने हजारों करों ( हाथों या किरणों ) को धारण किया । इस प्रकार महाराज के कारण अत्यन्त वैराग्य करके शान्त भाव से सूर्य ने पर्वत की कन्दरा में प्रवेश किया । बड़े लोगों के अश्रु की निरन्तर वर्षा से आतप ठंडा पड़ गया । समस्त लोगों के रोने से लाल नेत्रों की कान्ति से मानों संसार लाल वर्ण का हो गया ।
पञ्चम उच्छ्वासः २८६ र्दीकृत इव निर्वात्यातपे, रोदनताम्रसकललोकलोचनरुचेव लोहितायति जगति, उष्णायमानानेकनरनिःश्वाससंतापप्लुष्ट इव च नीलायमाने दिवसे, नृपानुगमनप्रचलितयेव लक्ष्म्या मुच्यमानासु कमलिनीषु, पति- शुचेव परिवृतच्छायायां श्यामायमानायां भुवि, कुलपुत्रेष्विव परित्यक्त- कलत्रेषु कृतकरुणप्रलापेषु वनान्तानाश्रयत्सु दुःखितेषु चक्रवाकेषु, छत्र- भङ्गभीतेष्विव निगूढकोशेषु कुशेशयेषु, स्फुटितदिग्वधूहृदयरुधिरपटलप्लव इव गलिते रक्तात्पे, क्रमेण च लोकान्तरमुपगतवत्यनुरागशेषे जाते तेजसामधीशे, गगनतलवितन्यमानबहलरागपाटलायां प्रेतपताकायामिव प्रवृत्तायां संध्यायां, शवशिविकालंकारकृष्णचामरमालास्विव स्फुरन्तीषु दर्शनप्रतिकूलासु तिमिरलेखासु, असितागुरुकलकाष्ठायां केनापि चिता- यामिव रचितायां रजन्यां, दन्तामलपत्रप्रसाधितकर्णिकासु केसरमाला- कल्पितमुण्डमालिकासु, अनुमर्तुमिवोद्यतासु प्रहसितमुखीषु कुमुदलक्ष्मीषु, ह्मानं वर्धमानम् । निर्वात्य शाम्यति सति । यश्चार्द्रीकृतः सोऽवश्यं निर्वाति शीतलीभवति । छायातपप्रतिपक्षजातिः, कान्तिश्च । श्यामा रात्रिः, नायिका च । वनं तोयम्, विपिनं च । छत्रभङ्गो राजदण्डः, पत्राणां च छत्राकारताभेदः । कोशो गञ्जः, कर्णिका च । अनुरागो भक्तिः, लौहित्यं च । तेजसामधीशो राजापि । शव- शिविका मृतयानम् । चामरमाला अपि दर्शनप्रतिकूलाः । काष्ठा दिशः, दारु च । अनेक लोगों की गरम सांस के संताप से झुलस कर मानों दिन नील वर्ण का होने लगा । मानों राजा के पीछे-पीछे चल पड़ी लक्ष्मी ने कमलिनियों को छोड़ दिया । छाया से ढंकी हुई पृथिवी मानों पति के शोक में श्याम होने लगी । कुलपुत्रों की भाँति चक्रवाकों ने दुखी हो कर अपने कलत्र का त्याग कर दिया और करुण रोदन करने लगे एवं वनों में जाकर बसेरा लिया । कमलों ने मानों राजा के विनाश से डर कर अपने कोश (धनराशि या बीजकोश) को छिपा लिया । दिग्वधुओं के फटे हुए हृदय की रुधिर की धार के समान रक्तात्प विगलित होने लगा । क्रम से अनुरागशेष होकर सूर्य लोकान्त में चला गया । आकाशमण्डल में गहरा लाल वर्ण वाली संध्या प्रेतों की पताका के समान फैल गई । शव-शिविका (अरथी) में शोभा के लिए लगाए गए काले चंवरों की मालाओं के समान दर्शन के अयोग्य अन्धकार की लेखाएँ स्फुरित होने लगीं । अगुरु वृक्ष के काले काष्ठों से मानों किसी ने रजनी के रूप में चिता का निर्माण किया । कुमुदलक्ष्मियाँ निर्मल पत्र रूपी दन्तपत्र और कर्णिका (बीजकोशरुपी कर्णांलंकार) से प्रसाधन कर एवं केसर (पराग, बकुल) की मुण्डमाला पहन कर अनुमरण के लिए हँसते-हँसते तैयार १६ ह० च०
२६० हर्षचरितम् अवतरत्रिदशविमानकिङ्किणीक्वणित इव श्रूयमाणे शाखिशिखरकुलायली- यमानशकुनिकुलकूजिते, नाकपथप्रस्थितपार्थिवप्रत्युद्गतपुरुहूतातपत्र इव पूर्वस्यां दिशि दृश्यमाने चन्द्रमसि, नरेन्द्रः स्वयं समर्पितस्कन्धैर्गृहीत्वा शवशिविकां शिबिसमः सामन्तैः पौरैश्च पुरोहितपुरःसरैः सरितं सरस्वतीं नीत्वा नरपतिसमुचितायां चितायां हुताशसत्क्रियया यशःशेषतामनीयत । देवोऽपि हर्षः पुञ्जीभूतेन सकलेनेव जीवलोकेन लोकेन राजकुलसंब- द्धेनाशेषेण शोकमूकेन परिवृतोऽन्तर्वर्तिनापि शोकानलतमेन स्नेहद्रवेण बहिरिव सिच्यमानो निर्व्यवधानायां धरण्यामुपविष्ट एव तां निशीथिनीं भीमरथीभीमामखिलां सराजको जजागार । अजनि चास्य चेतसि-ताते दूरीभूते संप्रत्येतावान्खलु जीवलोकः, लोकस्य भग्नाः पन्थानः, मनो- रथानां खिलीभूतानि भूतिस्थानानि, स्थगितान्यानन्दस्य द्वाराणि, सुप्ता सत्यवादिता, लुप्ता लोकयात्रा, विलीना बाहुशालिता, प्रलीना प्रियाला- काष्ठदन्तवत्तस्य चामलं पत्रम् । कर्णिका कर्णाभरणं च । केसरशब्दः किंजएकबकुलयोः । शिबिर्नाम राजर्षिरभूत् । निशीथिनीं रात्रिम् । भीमरथी नरकनदी, कालरात्रीर्वा । अन्ये तु सप्तसप्तत्या वर्षैस्तत्संख्यैश्च मासैर्दिनैश्च तावद्भिर्गतैरेका रात्रिर्भीमरथी भवति, तामतिक्रान्तो वर्षशतजीवी नरो भवतीति प्राहुः । जीवलोकः संसारः । खिलीभूतानि शून्यानि । लोकयात्रा व्यवहारः । दो गईं । उतरते हुए देव-विमान की किंकिणियों की आवाज के समान वृक्षों के शिखर पर घोंसलों में बैठते हुए पक्षी चहचहाने लगे । स्वर्ग-मार्ग में प्रस्थान किए हुए राजा के स्वागत में सिंहासन से उठे छत्र की भाँति पूर्व दिशा में चन्द्र दिखाई देने लगा । उसी समय पुरोहितों के आगे आगे सामन्तों और पुरवासियों ने स्वयं अपने कंधे लगा कर अरथी को उठाया और सरस्वती नदी के तीर पर ले जाकर सजाई गई चिता में अग्नि- संस्कार करके राजा को यशःशेष कर दिया । देव हर्ष ने भी मानों सारे संसार के एकत्र हुए राजकुल से सम्बद्ध उन लोगों के साथ जो शोक के कारण चुपचाप थे, घिर कर, मानों भीतरी भी शोकानल से तप्त स्नेह के द्रव से बाहर सिंचे हुए, बिना बिछाए खरहने जमीन पर बैठे ही बैठे राजाओं के साथ नरक की नदी के समान भयंकर उस कालरात्रि को जगे हुए व्यतीत किया । वे मन में सोचने लगे-'तात के चले जाने पर यह विशाल जीवलोक अनाथ हो गया । लोक की मर्यादाएँ भग्न हो गईं । मनोरथों के उत्पन्न होने के स्थान नहीं रहे । आनन्द के द्वार
पञ्चम उच्छ्वासः २६१ पिता, प्रोषिताः पुरुषकारविहारविकाराः, समाप्ता समरशौण्डता, ध्वस्ता परगुणप्रीतिः, विश्रान्ता विश्वासभूमयः, अपदान्यपदानानि, निरुपयोगानि शास्त्राणि, निरवलम्बना विक्रमैकरसता, कथावशेषा विशेषज्ञता, ददातु जनो जलाञ्जलिमौर्जित्याय, प्रतिपद्यतां प्रव्रज्यां प्रजापालता, बध्नातु वैधव्यवेणीं वरमनुष्यता, समाश्रयतु राजश्रीराश्रमपदम्, परिधत्तां धवले वाससी वसुमती, वहतु वल्कले विलासिता, तपस्यतु तपोवनेषु तेजस्विता, प्रावृणोतु चीवरे वीरता, क्व गम्यतां पुनस्तस्य कृते कृतज्ञतया, क्व पुनः प्राप्स्यति तादृशान्महापुरुषनिर्माणपरमाणून्परमेष्ठी, शून्याः संवृत्ता दश दिशो गुणानाम् , जगज्जातमन्धकारं धर्मस्य, निष्फलमधुना जन्म शस्त्रोपजीविनाम् । तातेन विना कुतस्त्यास्तादृश्यो दिवसमसम- समररससमारब्धकलहकथाकण्टकितसुभटकपोलभित्तयो वीरगोष्ठ्यः । अपि नाम स्वप्नेऽपि दृश्येत दीर्घरक्तनयनं पुनस्तन्मुखसरोजम् , जन्मा- न्तरेऽपि पुनः परिष्वज्येत तल्लोहस्तम्भाभ्यधिकगरिमगर्भं भुजयुगलम् । लोकान्तरेऽपि पुत्रेत्यालपतः पुनः पुनः श्रूयेत सा सुधारसमुद्रिरन्ती प्रावृणोतु परिदधातु । कलहो रणः । बंद हो गए । सत्यवादिता सो गई । संसार के काम-काज लुप्त हो गए । बाहु का वीर्य विलीन हो गया । प्रिय बातचीत खत्म हो गई । दूसरे के गुणों के प्रति प्रेम ध्वस्त हो गया । विश्वास के पात्र जन नहीं रहे । अपदानों (वीरता के विलक्षण कार्य) के लिये कोई स्थान न रहा । शास्त्रों की कोई उपयोगिता न रही । पराक्रम के प्रति एकरसता निराधार हो गई । विशेषज्ञता सिर्फ कहने के लिए रह गई । अब लोग तेजस्विता को जलांजलि दे दें । प्रजापालन के कर्म संन्यास ले लें । श्रेष्ठ मनुष्यता वैधव्य की वेणी बांध ले । राजलक्ष्मी आश्रम में जाकर निवास करे । पृथिवी उज्ज्वल वस्त्रयुगल पहन ले । विलासिता वल्कल धारण कर ले । तेजस्विता तपोवन में जा कर तपस्या करे । वीरता चीवर ओढ़ ले । कृतज्ञता उनके बदले फिर कहाँ जाय ? ब्रह्मा उस प्रकार के महापुरुषों के निर्माण के लिए परमाणुओं को फिर से कहाँ पाएगा ? गुणों के लिए सारी दिशाएं शून्य हो गईं । धर्म के लिए अन्धकार बन गया । शस्त्रोपजीवी लोगों का जन्म अब निष्फल हो गया । तात के बिना वीरों की वे गोष्ठियां, जिनमें अपूर्व समर- रस के कारण कलह के सम्बन्ध की बातचीत से वीरों के कपोल पर रोमाञ्च हो उठता था, कहाँ की रह गईं ? काश, स्वप्न में भी दीर्घ और लाल नेत्रों वाला उनका मुख-कमल फिर से दीख जाता ! जन्मान्तर में भी फिर से लोहे के स्तम्भ के समान उनका भुज- युगल हमारा आलिङ्गन करता ! लोकान्तर में भी बार-बार 'पुत्र-पुत्र' पुकारते
२६२ हर्षचरितम् मध्यमानक्षीरसागरोद्गारगम्भीरा भारतीत। एतानि चान्यानि च चिन्त- यत एवास्य कथमपि सा क्षयमियाय यामिनी । ततः शुचेव मुक्तकण्ठमारटत्सु कृकवाकुकुलेषु, गृहगिरितरुशिखरेभ्यः पातयत्स्वात्मानं मन्दिरमयूरेषु, परित्यक्तनिजनिवासेषु च वनाय प्रस्थि- तेषु पत्ररथेषु, सद्यस्तनूभूते ताम्यति तमसि, मन्दीभूतात्मस्नेहेष्वभाव- माभजत्सु प्रदीपेषु, स्फुरदरुणकिरणवल्कलप्रावृतवपुषि प्रव्रज्यामिव प्रति- पन्ने नभसि, प्रभातसमयेन समुत्तीर्यमाणासु पार्थिवास्थिशकलकलास्विव कलविङ्ककंधराधूसरासु तारकासु भूभृद्धासुगर्भकुम्भधारिषु विविधसरः- सरित्तीर्थाभिमुखेषु प्रस्थितेषु वनकरिकुलेषु, शावशूचिसिकथपटल- पाण्डुरे पिण्ड इवापरपयोनिधिपुलिनपरिसरे पात्यमाने शशिनि, क्रमेण च नृपचितानलधूमविसरधूसरीकृततेजसीव, नरपतिशोकपावक- दाहकिरणकलङ्ककालीकृतचेतसीव, प्रोषितसमस्तान्तःपुरपुरंधिमुखचन्द्र- वृन्दोद्वेगविद्राणवपुषीव, प्रथमास्तमितरोहिणीरणरणकविमनसीव चास्त- ततः शुचेत्यादौ । चचाल स्नानाय देवो हर्ष इति संबन्धः । शुचेवेति । गृहे गिर्यादौ योज्यम् । स्नेहः प्रेम, तैलं च । अरुणो रविसारथिः, लोहितं चारुणम् । कलविङ्को ग्रामचटकः । भूभृद्गिरिः, राजा च । धातवो लघ्वन्यस्थीनि, गैरिकाद्याश्च । कुम्भौ कपाटौ, घटश्च कुम्भः । शावे धूसरे शवसंबन्धिनि च । सिक्थं भक्तम्, मधू- हुए उनकी अमृतरस का उद्विरण करती हुई, मथे जाते हुए समुद्र के निकले उद्गार के समान गम्भीर वाणी बार-बार सुन पड़ती' इस तरह और अन्य प्रकार की चिन्ता करते करते किसी प्रकार वह रात बीत गई। तत्पश्चात् मानों शोक से मुर्ग गला फाड़कर टर्राने लगे। भवन के मयूर कृत्रिम पर्वतों के वृक्षों से अपने को गिराने लगे। हंस अपना-अपना स्थान छोड़ कर वन के लिए प्रस्थान करने लगे । तुरंत ही कृश होकर अंधकार दुखी होने लगा । अपने स्नेह (तैल या प्रेम) के कम पड़ जाने से प्रदीप बुझने लगे । अरुण की लाल किरण का वल्कल ओढ़ कर मानों आकाश ने सन्यास ले लिया। कलविंक पक्षी की कंधरा के समान धूसर वर्ण वाले तारे सम्राट के फूल के समान उतरने लगे। राजा के फूल (अस्थिशेष) से युक्त कलश को लेकर विविध सरोवरों, नदियों और तीर्थों की ओर हाथी चल पड़े। प्रेत के लिए पवित्र भात के उजले पिण्डे के समान चन्द्रमा पश्चिम समुद्र के तट के पुलिन पर लुढ़का दिया गया। क्रम से चन्द्रमा का तेज मानों राजा के चितानल के धूमसमूह के फैलने से मंद पड़ गया, या
पञ्चम उच्छ्वासः २६३ मुपगते रजनिकरे, राजतीव देवे दिवमारूढे सवितरि, परिवृत्ते राज्य इव रजनीप्रबन्धे, प्रबुद्धराजहंसमण्डलप्रबोध्यमानः पङ्कजाकर इव चचाल स्नानाय देवो हर्षः । ततश्च नूपुररवविराममूकमन्दमन्दिरहंसेषु, शोकाकुलकतिपयकञ्चुकिमात्रावशेषेषु शुद्धान्तेषु, पतितयूथप इव वनग- जयूथे, कक्ष्यान्तरवर्तिनि पितृपरिजने, विषादिन्युपरिरुदन्निषादिनि च स्तम्भनिषण्णे, निष्पन्दमन्दे राजकुञ्जरे, मन्दुरापालकाक्रन्दव्यथिते चाजि- रभाजि राजवाजिनि, विश्रान्तजयशब्दकलकले च शून्ये च महास्थान- मण्डपे दह्यमानदृष्टिर्निर्जगाम राजकुलात् । अगाच्च सरस्वतीतीरम् । तस्यां स्नात्वा पित्रे ददावुदकम् । अपस्नातश्चानिष्पीडितमौलिरेव परि- धायोद्गमनीयदुकूलवाससी निःश्वासपरो निरातपत्रो निरुत्सारणः समुप- नीतेऽपि सप्तौ चरणाभ्यामेव नासाग्रासक्तेन रक्तामरसताम्रेण चक्षुषा च्छिष्टं च । 'राजहंसास्तु ते चञ्चुचरणैर्लोहितैः सिताः' । राजहंसा इव राजानः, हंसाश्च । ततश्चेत्यादौ । अस्मिन्सति दह्यमानदृष्टिर्निर्जगाम राजकुलादिति संबन्धः । निषादी हस्तिपकः । अपस्नातइत्यादौ । भवनमाजगामेति संबन्धः । अपस्नातो मृतस्नातः । मौलयः केशाः । 'तस्यादुद्गमनीयं यद्धौतयोर्वस्त्रयोर्युगम्' । सप्तौ हये । माना राजा के शोक की जलती हुई अग्नि के कारण उसका चित्त कलंक के रूप में काला पड़ गया, या मानों स्वर्ग में गई हुई अन्तःपुर की समस्त पुरन्त्रियों के मुखचन्द्र के उद्वेग से वह भागने लगा, या मानों पहले अस्त हुई रोहिणी की उत्कण्ठा से उदास हो गया । इस प्रकार चन्द्रमा डूब गया और सूर्य आकाश में उदित हुआ । राज्य के समान रात का समय पलट गया । तब जैसे राजहंस पहले जग कर कमल को जगाते हैं उसी प्रकार कुमार जगे हुए राजाओं द्वारा जगाए जाने पर उठे । तब अन्तःपुरमें में रमणियों के नूपुररव के समाप्त हो जाने से भवन के हंस मूक और मन्द हो गए। केवल वहाँ कुछ कंचुकी ही बच रहे। कक्ष्याओं में रहने वाले पिता के परिजन उन जंगली हाथियों की तरह लगने लगे जिनका मेठ (मुखिया) न रहा। राजा का निजी हाथी आलानस्तम्भ में टिक कर विषाद में मग्न और निस्तब्ध होकर पड़ा रहा और उसका महावत रो रहा था । अश्वपाल के आर्तनाद से व्यथित हो कर राजा का निजी अश्व आंगन में पड़ा रहा। सारा महास्थान- मंडप जयजयकार के कलकल से रहित और सूना-सूना हो रहा था। देव हर्ष इन पर दृष्टिपात करते हुए राजकुल से निकले और सरस्वती के तीर पर पहुंचे। नदी में स्नान करके पिता को जल दिया । प्रेत कार्य के लिए स्नान कर सिर का पानी बिना गारे ही उन्होंने उज्ज्वल दुकूल वस्त्र धारण किए। बार-बार दीर्घ श्वास लेते रहे। बिना छत्र के
२६४ हर्षचरितम् हृदयावशेषस्यापि पितुर्दाहशङ्कया शोकाग्निमिव उद्गिरन्नताम्बूलस्यापि सुचिरप्रक्षालितस्य कल्पतरुकिसलयकोमलस्येव स्वभावपाटलस्याधरस्या- धरपल्लवस्य प्रभया मांसरुधिरकवलानिव हृदयाभिघातादुद्गमन्मुष्णनिः- श्वासमोक्षैर्भवनमाजगाम । राजवल्लभास्तु भृत्याः सुहृदः सचिवाश्च तस्मिन्नेवाहनि निर्गत्य प्रियं पुत्रदारमुत्सृज्योद्वाष्पैर्बन्धुभिर्वार्यमाणा अपि बहुनृपगुणगणहृतहृदयाः केचिदात्मानं भृगुषु बबन्धुः, केचित्तत्रैव तीर्थेषु तस्थुः, केचिदनशनेरा- स्तीर्णतृणकुशा व्यथमानमानसाः शुचमसमामशमयन् , केचिच्छलभा इव वैश्वानरं शोकावेगविवशा विविशुः, केचिद्दारुणदुःखदहनदह्यमान- हृदया गृहीतवाचस्तुषारशिखरिणं शरणमुपाययुः, केचिद्विन्ध्योपत्यकासु भृगुषु प्रपातेषु । कुक्षोऽत्र संख्या । और लोगों को हटाने वाले प्रतीहारों के बिना ही वे लाए गए भी घोड़े पर सवार न हो कर पैदल ही भवन तक आए । उनकी कमल के समान लाल आँखें नासाग्र पर टिकी थीं, मानों हृदय के रूप में बचे हुए पिता के जल जाने की शंका से शोकाग्नि को बाहर निकाल रहे थे । उनका अधरपल्लव ताम्बूलरहित होने पर भी अत्यन्त स्वच्छ और कल्पवृक्ष के पल्लव के समान कोमल और स्वभावतः लाल था । उसकी प्रभा के रूप में मानों वे अपने हृदय पर पड़े हुए शोकरूपी वज्र के आघात से उष्ण श्वास लेते हुए मांस और रुधिर के ग्रास उगल रहे थे । राजा के अत्यन्त प्रिय भृत्य, मित्र और सचिव रोते हुए बन्धुओं से रोके जाने पर भी राजा के गुणों के प्रति मुग्ध हो कर अपने प्रिय पुत्र और स्त्री को छोड़ उसी दिन निकल गये । कुछ ने भृगुपतन स्थान में अपने आप को नीचे गिरा कर आत्महुति दे दी, या भृगुओं में अनुरक्त हुए । कुछ तीर्थयात्रा के लिए गए और वहीं रह गए, या कुछ विद्याध्ययन के लिए आचार्यों के पास गए और नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का व्रत ले कर वहीं रह गए । दुखी मन वाले कुछ लोग कुश बिछा कर बैठे और आहार त्याग कर भारी शोक मिटाने लगे, या निराहार रह कर प्रायोपवेशन के द्वारा लम्बे-लम्बे उपवास करने लगे । कुछ शोक के आवेग से शलभों के समान अग्नि में प्रविष्ट हो गए, या चारों ओर अग्नि जला कर पञ्चाग्नित्यापन करने लगे । दारुण दुःख से दह्यमान हृदय वाले कुछ मौनव्रत लेकर हिमालय की शरण में चले गए, या शब्दविद्या की साधना का व्रत लेकर हिमालय में तप करने गए । कुछ विन्ध्य के समीप प्रदेशों में जंगली हाथियों की सूंड के फुहारों में
वनकरिकुलकरशीकरासारसिच्यमानतनवः पल्लवशयनशायिनः संतापम- शमयन्, केचित्संनिहितानपि विषयानुत्सृज्य सेवाविमुखाः परिच्छिन्नैः पिण्डकैरटवीभुवः शून्या जगृहुः, केचित्पवनाशना धर्मधना धमद्धमनयो मुनयो बभूवुः, केचिद्गृहीतकाषायाः कापिलं मतमधिजगिरे गिरिषु, केचिदाचोटितचूडामणिषु शिरःसु शरणीकृतधूर्जटयो जटा जगटिरे । अपरे परिपाटलप्रलम्बचीवराम्बरसंवीताः स्वाम्यनुरागमुज्ज्वलं चक्रुः । अन्ये तपोवनहरिणजिह्वाञ्चलोल्लिह्यमानमूर्तयो जरां ययुः । अपरे पुनः पाणिपल्लवप्रमृष्टैराताम्रागैर्नयनपुटैः कमण्डलुभिश्च वारि वहन्तो गृहीत- व्रता मुण्डा विचेलुः । पिण्डकैः शरीरैः । धमनयो नाड्यः । अनेन कार्श्यं लक्ष्यते । अधिजगिरे अध्येष्यत । आचोटित उत्खानः। धूर्जटिः शिवः । वारि अश्रु, उदकं च । स्नान करते हुए और पत्तों पर सोते हुए अपना सन्ताप मिटाने लगे, या विन्ध्याचल के प्रदेशों में जाकर पहनने या शयनादि के लिए पल्लव अर्थात् श्वेत दुकूल वस्त्रों का प्रयोग करने लगे । कुछ सन्निहित भी विषयों को छोड़ कर भोग से पराङ्मुख हो कर अल्पाहार करते हुए शून्य अटवी स्थानों में रहने लगे, या जैन साधु हो कर चान्द्रायण आदि अनेक प्रकार के व्रतों में नपा-तुला आहार लेने लगे । कुछ वायु भक्षण करते हुए कृशशरीर धर्म- धन मुनि हो गए, या सब प्रकार का आहार त्याग कर वायुभक्षण से तपश्चर्या करते हुए शरीर को सुखाने वाले दिगम्बर जैन साधु हो गए। कुछ काषाय धारण करके गिरिकन्द- राभों में कपिल मत का अध्ययन करने लगे। कुछ ने चूड़ामणि उतार कर शिव की शरण लेकर जटाएँ रख लीं, या पाशुपत शैव सम्प्रदाय में दीक्षित हो गए। कुछ लाल रंग का लम्बा चीवर पहन कर स्वामी के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करने लगे, या लाल लम्बा चीवर (संधाटी) पहनने वाले भिक्षु स्वामी (भगवान् बुद्ध) के प्रति अपना- अपना अनुराग प्रकट करने लगे। कुछ तपोवन में आश्रम-मृगों से चाटे जाते हुए वार्धक्य को प्राप्त हुए, या गृहस्थ जीवन के बाद वैखानस हो कर वानप्रस्थ आश्रम तपोवन में व्यतीत करने लगे। कुछ ने आंसू भरे हुए लाल नेत्रों को हाथ से पोंछ कर और कमण्डलु के जल से धोकर सिर मुड़वा लिया और विविध व्रत लेकर विचरने लगे, या पाराशरा भिक्षु हो गए।
२६६ हर्षचरितम्
देवमपि हर्षं तदवस्थं पितृशोकविह्वलीकृतम् , श्रियं शाप इति, महीं महापातकमिति, राज्यं रोग इति, भोगान्भुजङ्गा इति, निलयं निरय इति, बन्धुं बन्धनमिति, जीवितमयश इति, देहं द्रोह इति, कल्यतां कलङ्क इति, आयुरपुण्यफलमिति, आहारं विषमिति, विषममृतमिति, चन्दनं दहन इति, कामं क्रकच इति, हृदयस्फोटनमभ्युदय इति च मन्यमानम् , सर्वासु क्रियासु विमुखम् , पितृपितामहपरिग्रहागताश्चिर- न्तनाः कुलपुत्राः, वंशक्रमाहितगौरवाश्च ग्राह्यगिरो गुरवः, श्रुतिस्मृतीति- हासविशारदाश्च जरद्विजातयः, श्रुताभिजनशीलशालिनो मूर्धाभिषिक्ता- श्चामात्या राजानो, यथावदधिगतात्मतत्त्वाश्च संस्तुता मस्करिणः, सम- दुःखसुखाश्च मुनयः, संसारासारत्वकथनकुशला ब्रह्मवादिनः, शोकापनय- ननिपुणाश्च पौराणिकाः पर्यवारयन् ।
अस्वतन्त्रीकृतश्च तैर्मनसापि नालभत शोकानुप्रवणमाचरितुम् ।
देवमित्यादौ। देवमपि हर्षमेवंविधा जनाः पर्यवारयन्निति संबन्धः। कल्यता- मरोगिताम् । ग्राह्यगिर आदेयवाचः । अध्यात्ममात्मज्ञानम् । तत्त्वमितिकर्तव्यता । मस्करिणः परिव्राजकाः ।
देव हर्ष भी पिता के शोक में विह्वल चित्त से तदवस्थ पड़े थे । वे श्री को शाप, पृथिवी को महापातक, राज्य को रोग, भोग-विलास को सर्प, घर को नरक, बन्धुजन को बंधन, जीवन को अयश; देह को द्रोह, आरोग्य को कलंक, आयु को अपुण्य का फल, भोजन को विष, विष को अमृत, चन्दन को अग्नि, काम को करपत्र और हृदय के फटने को अभ्युदय मान बैठे । उन्होंने सब कार्यों से मुँह मोड़ लिया । पिता-पितामह की कुल- परम्परा के पुराने कुलपुत्रों ने श्रुति, स्मृति, इतिहास के ज्ञाता वृद्ध ब्राह्मणों ने, ज्ञान, कुल और शील से युक्त अमात्य पद के अधिकारी राजाओं ने, आत्मतत्त्व को ठीक प्रकार से अधिगत करने वाले प्रसिद्ध मस्करी साधुओं ने, सुख-दुःख को एक-सा समझने वाले मुनियों ने, संसार की असारता का उपदेश करने वाले ब्रह्मवादी शांकर वेदान्त के अनुयायियों ने और शोक को कम करने में निपुण पौराणिकों ने आकर उन्हें घेर लिया । उन लोगों के द्वारा समझाने-बुझाने से हर्ष ने शोक की वेदना को मन से भी अनुभव
पञ्चम उच्छ्वासः २६७ प्रचुरमित्रानुनीयमानश्च सनाभिभिः कथं कथमप्याहारादिकासु क्रियास्वा- भिमुख्यमभजत । भ्रातृगतहृदयश्चाचिन्तयत्—'अपि नाम तातस्य मरणं महाप्रलयसदृशमिदमुपश्रुत्य आर्यो बाष्पजलस्नातो न गृह्णीयाद्वल्कले । नाश्रयेद्वा राजर्षिराश्रमपदम् । न विशेद्वा पुरुषसिंहो गिरिगृहाम् । अश्रु- सलिलनिर्भरभरितनयननलिनयुगलो वा पश्येदनाथां पृथिवीम् । प्रथम- व्यसनविषमविह्वलः स्मरेदात्मानं वा पुरुषोत्तमः । अनित्यतया जनित- वैराग्यो वा न निराकुर्यादुपसर्पन्तीं राज्यलक्ष्मीम् । दारुणदुःखदहनप्र- ज्वलितदेहो वा प्रतिपद्येताभिषेकम् । इहागतो वा राजभिरभिधीयमानो न पराचीनतामाचरेदिति । अतिपितृपक्षपाती खल्वार्यः । सर्वदा तात- श्लाघया मामभिधत्ते—तात हर्ष ! कस्यचिदभूद्भविष्यति वा पुनः काञ्च- सनाभयः सगोत्राः । शौचानुप्रवणं शरीरबाधादि । बाष्पजलस्नातो न गृह्णी- याद्वल्कले इति प्रतीयमानता बोद्धव्या । अत्र च सर्वत्र नेत्याशङ्कायाम् । पुरुषोत्तमो हर्षः, हरिरपि । पराचीनता पराङ्मुखत्वम्, अनानुकूल्यं वा । करने का अवसर नहीं प्राप्त किया। बहुत मित्रों के समझाने पर वे किसी किस प्रकार आहार आदि कार्यों में प्रवृत्त हुए। बड़े भाई राज्यवर्धन का स्मरण करके सोचने लगे—'कहीं ऐसा न हो कि तात के महाप्रलय के सदृश इस मरणवृत्तान्त को सुन कर भार्य रोते हुए वल्कल धारण कर लें। कहीं राजर्षि वह किसी आश्रम में प्रविष्ट न हो जाँय । कहीं पुरुष-सिंह वे गिरिकन्दरा में न चले जाँय । कहीं वे इस पृथिवी को अनाथ देख कर नेत्रों से निरन्तर अश्रुधारा प्रवाहित न करने लगें । कहीं श्रेष्ठ मनुष्य वे दुःख की पहली चोट से घबरा कर आत्मचिन्तन में न लग जाँय । कहीं संसार की अनित्यता से वैराग्यवान् हो कर आती हुई राज्यलक्ष्मी से विमुख न हो जाँय । कहीं दारुण दुःखरूपी अग्नि से सन्तप्त हो कर जल में डूबने न लगें। अथवा यहाँ आकर राजाओं के प्रार्थना करने पर भी सिंहासन पर बैठने से पराङ्मुख न हो जाँय । वे पिता जी के अत्यन्त पक्षपाती हैं। हमेशा उनकी श्लाघा करते हुए कहते थे—भाई हर्ष, सुवर्ण के ताल वृक्ष की भाँति लम्बा शरीर किसीका हुआ है या फिर होगा ? सूर्य की भक्तिसे विकसित होने वाला उनका मुखरूपी महाकमल और इस प्रकार वज्रस्तम्भ के समान उद्भासित होने वाले दोनों भुजदण्ड और ये मद से अलसाए बलराम के समान विलास किसी के हुए हैं अथवा होंगे ? इस प्रकार कौन दूसरा
२६८ हर्षचरितम् नतालतरुप्रांशु कायप्रमाणमिदम् ? ईदृक्च दिवसकरप्रीत्या दिवसमुन्मु- खविकसितं मुखमहाकमलम् । एतौ च वज्रस्तम्भभास्वरौ भुजकाण्डौ । एते च हसितमदालसहलधरविभ्रमा विलासाः कोऽन्यो मानी विक्रान्तो वदान्यो वा ?' इति । एतानि चान्यानि च चिन्तयन्दर्शनोत्सुकहृदयो भ्रातुरागमनमुदीक्षमाणः कथंकथमप्यतिष्ठदिति । इति महाकविश्रीबाणभट्टकृतौ हर्षचरिते महाराजमरणवर्णनं नाम पञ्चम उच्छ्वासः । मुखकमलस्य दिवसकरप्रीतिः प्रतापित्वम् । वदान्यो दाता ॥ इति श्रीशंकरविरचिते हर्षचरितसंकेते पञ्चम उच्छ्वासः । मानी, पराक्रमी और दानशील है ?' इस तरह की और अन्य प्रकार की चिन्ता करते हुए बड़े भाई के दर्शन की उत्कण्ठा से उनके आगमन की प्रतीक्षा में किसी-किसी प्रकार ठहरे । हर्षचरित पञ्चम उच्छ्वास समाप्त ।
षष्ठ उच्छ्वासः उच्चित्योच्चित्य भुवि प्रहितनिगूढात्मदूतनीतानाम्। विजिगीषुरिव कृतान्तः शूराणां संग्रहं कुरुते ॥ १ ॥ विस्रब्धघातदोषः स्ववधाय खलस्य वीरकोपकरः। नवतरुभङ्गध्वनिरिव हरिनिद्रातरकरः करिणः ॥ २ ॥ अथ प्रथमप्रेतपिण्डभुजि भुक्ते द्विजन्मनि, गतेषूद्वेजनीयेष्वशौचदि- वसेषु, चक्षुर्दाहदायिनि दीयमाने द्विजेभ्यः शयनासनचामरातपत्रामत्रपत्र- शस्त्रादिके नृपनिकटोपकरणकलापे, नीतेषु तीर्थस्थानानि सह जनहृदयैः उच्चित्येति । कृतान्तोऽन्तकः शूराणां संग्रहं कुरुते । किं कृत्वा । उच्चित्योच्चित्य यथाप्रधानं प्रहितनिगूढाः स्वभावप्रच्छन्ना यमदूता यमकिंकरास्तैर्नीतानां विजिगीषु- र्यथान्विष्यान्विष्यामदूर्तानां शूराणां संग्रहं कुरुते । अनेनोच्छ्वासातः संगृहीतः। तथा हि कृतोऽन्तो विनाशो येन स शशाङ्कनामा गौडाधिपतिः । शूराणां राज्यवर्धनानु- चराणां प्रधानराजपुत्राणां तत्सहितानां संग्रहमकरोत् । कथम् ? उच्चित्योच्चिया- न्विष्यान्विष्य । कीदृशानाम् ? प्रहितनिगूढात्मदूतानाम । तथा हि तेन शशाङ्केन विश्वासार्थं दूतमूखेन कन्याप्रदानमुक्त्वा प्रलोभितो राज्यवर्धनः स्वगेहे सानुचरो भुञ्जान एव छद्मना व्यापादितः ॥ १ ॥ अत एव चाह-विस्रब्धेत्यादि । खलोऽत्र गौडापसदः । निद्राद्यस्तरकरः शशाङ्कः । वीरश्च हर्षः ॥ २ ॥ अथ प्रथमेत्यादौ । अस्मिन्नस्मिन्सति देवो हर्षो मौलेन महाजनेनात्मानं सकलं विजय की इच्छा रखने वाले राजा के समान यमराज पृथिवी में जगह-जगह पर भेजे हुए अपने गुप्तचर दूतों द्वारा चुन-चुन कर लाए गए शूर वीरों का संग्रह करता है॥१॥ जिस प्रकार हाथी द्वारा तोड़े गए वृक्ष के टूटने की ध्वनि सिंह को नींद से उठा देती है और वह हाथी को मार डालता है उसी प्रकार खल स्वभाव के गौड़राज द्वारा विश्वास- घात करके ( राज्यवर्धन के ) मारे जाने के अपराध ने वीर (हर्ष) को कुपित कर दिया और हर्ष ने उसे मार डाला ॥ २ ॥ प्रेतपिंड खाने वाले महाब्राह्मणों ने भोजन किया । उद्वेग से भरे हुए अशौच के दिन बीत गए । आँखों में शूल की तरह चुभती हुई राजा के निजी उपयोग की सामग्री- पलंग, पीढ़ा, चँवर, छत्र, बर्त्तन, सवारी, हथियार आदि ब्राह्मणों को समर्पित कर दी गई। जनता के हृदय के साथ राजा की अस्थियाँ तीर्थस्थानों में भेज दी गईं । चिता के स्थान
३०० हर्षचरितम् कीकसेषु, कल्पितशोकशल्ये सुधानिचयचिते चिताचैत्यचिह्ने, वनाय विसर्जिते महाजिजिति राजगजेन्द्रे, क्रमेण च मन्देष्वाक्रन्देषु, विरली- भवत्सु च विलापेषु, विश्राम्यत्यश्रुणि, शिथिलीभवत्सु श्वसितेषु, अवि- स्पष्टेषु हाकष्टाक्षरेषु, उत्सार्यमाणासु च व्यसनशय्यासु, उपदेशश्रवण- क्षमेषु श्रोत्रेषु, अनुरुधावधानयोग्येषु हृदयेषु, गणनीयेषु नृपगुणेषु, प्रदे- शवृत्तित्तामाश्रयति शोके, कृतेषु कविरुदितकेषु, जाते च स्वप्नावशेषदर्शने हृदयावशेपावस्थाने चित्रावशेषाकृतौ काव्यावशेषनाम्नि नरनाथे देवो हर्षः कदाचिदुत्सृष्टव्यापारः पुञ्जीभूतवृद्धबन्धुवर्गाग्रेसरेणावनतमूकमुखेन महा- जनेन मौलेनाकाल आत्मानं वेष्ट्यमानमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा चाकरोन्मनसि— ‘किमन्यदार्यमागतमावेदयत्ययं शोकपराभूतो लोकाकरः’ इति । वेपमान- हृदयश्च पप्रच्छ प्रविशन्तमधिकतरप्रचारमन्यतमं पुरुषम् 'अङ्ग ! कथय । किमार्य प्राप्तः' इति । स मन्दमब्रवीत्—'देव ! यथादिशसि द्वारि' इति वेष्ट्यमानमद्राक्षीदिति संबन्धः । भोजनं भुक्तं तदस्यास्तीति । 'अर्शआदिभ्योऽच्' । अमत्राणि पात्राणि । पत्राणि वाहनानि । कीकसेष्वस्थिषु । चितायां चैत्यचिह्न- स्तदाकारं चिह्नम्, श्मशानदेवगृहं वा । कविरुदितकेषु दुःखोद्दीपनकालेषु । लोको- पर शोक के शल्य को उत्पन्न करने वाला चैत्यचिह्न स्थापित किया गया जो सुधा या गचकारी से बनाया गया था । महासमर में जीतने वाला राजा का निजी हाथी वन में छोड़ दिया गया । क्रम से आर्तनाद कम पड़ गए । विलाप की आवाज भी विरल हो गई । आँसुओं का बहना भी बंद हो गया । साँसें शिथिल पड़ गई । हाय-हाय के दर्दभरे शब्द अस्पष्ट हो गए । शोक के अवसर पर पड़े रहने के लिए जो शय्याएँ बिछाई गई थीं अब हटा दी गई । कान अब उपदेश की बात सुनने लगे । राजा के गुण गिने जाने लगे । अब शोक वस्तु-वस्तु पर ही आश्रित हो गया (अर्थात् राजा की किसी-किसी वस्तु को देख या सुन कर शोक उत्पन्न होता न कि हमेशा) । कवियों ने राजा के शोक में विलाप- पूर्ण काव्य रचे । राजा का दर्शन स्वप्न के रूप में अवशिष्ट रह गया, हृदय के रूप में वे अब बच रहे और उनका नाम काव्य के रूप में रह गया । तब किसी समय काम-धाम से विरत हो कर बैठे हर्ष ने वृद्ध बन्धुवर्ग, झुके हुए चुपचाप महाजन और मौल (वंश- परम्परागत) मन्त्रियों से घिरते हुए अपने आप को देखा । देख कर उन्होंने मन में सोचा—'शोक से पराभूत ये लोग भाई के आने के समाचार के अतिरिक्त क्या निवेदन करेंगे ?' काँपते हुए हृदय से उन्होंने भीतर प्रवेश कर दौड़ते आते हुए एक व्यक्ति से पूछा—'अङ्ग, कहो क्या आर्य पधार चुके ?' वह धीरे से बोला—'देव, हाँ, द्वार पर हैं।'