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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

षष्ठ उच्छ्वासः ३०१ श्रुत्वा च सोदर्यस्नेहनिहितनिरतिशयमन्युमृदूकृतमनाः कथमपि न ववाम बाष्पवारिप्रवाहोत्पीडेन सह जीवितम्। अनन्तरं च द्वारपालप्रमुक्तेन प्रथमप्रविष्टेन परिजनेनेवाक्रन्देन कथ्य- मानम्, दूरद्रुतागमनमुषितबाहुल्येन विच्छिन्नच्छत्रधारेण लम्बिताम्बर- वाहिना भ्रष्टभृङ्गारग्राहिणा च्युताचमनधारिणा ताम्यत्ताम्बूलिकेन खञ्ज- त्खड्गग्राहिणा कतिपयप्रकाशदासेरकप्रायेण बहुवासरान्तरितस्नानभोजन- शयनश्यामक्षामवपुषा परिजनेन परिवृतम्, अविरलमार्गधूलिधूसरितश- रीरतया शरणीकृतमित्राशरण्या क्रमागतया वसुंधरया, हूणनिर्जयसमर- शरव्रणबद्धपट्टकैर्दीर्घधवलैः समासन्नराज्यलक्ष्मीकटाक्षपातैरिव शबलीकृ- तकायम्, अवनिपतिप्राणपरित्राणार्थमिव च शोकहुतभुजि हुतमांसैरति- च्त्तरो जनसमूहः । मन्युः शोकः । अनन्तरमित्यादौ प्रविशन्तं ज्येष्ठं भ्रातरमद्राक्षीदिति संबन्धः । परिजनेनापि प्रथमप्रविष्टेन द्वारपालप्रमुक्तेन च । आचमनं पतद्ग्रहः । प्रकाशा आतुरङ्गत्वाच्छि- श्रीयमानाः। दासेरका दासीसुताः। यह सुन कर सहोदर भाइ के स्नेह से अधिक रूप में उत्पन्न पिता जी की मृत्यु के शोक से आर्द्र मन वाले कुमार ने अश्रुधार की पीड़ा के साथ किसी प्रकार प्राण को रोक रखा। तत्पश्चात् उन्होंने अपने जेठे भाई राज्यवर्धन को देखा। द्वारपाल से छूट पाकर परिजन की भाँति पहले ही घुसे हुए आर्तनाद ने उनकी खबर दे दी। उनके चारों ओर कई दिनों से स्नान, भोजन, शयन न होने के कारण मुर्झाये हुए और कृश शरीर वाले लोग थे जिन्होंने शीघ्रता से दूर का रास्ता तय करने के लिए बहुतों का साथ छोड़ दिया था। उनके छत्रधारी पुरुष भी पीछे रह गए थे। वेग से चलने के कारण उनके कपड़े खिसक कर लम्बे हो गए थे। भृङ्गार नामक पात्र लेकर चलने वाले पुरुष भी दूर रह गए थे। आचमन का जल लेकर चलने वाले भी जाने कहाँ रह गए थे। खड्गग्राही पुरुष लँगड़ा कर चल रहे थे। कुछ ऊँट भी दिखाई दे रहे थे। हमेशा मार्ग में चलते ही रहने से उनकी देह धूल से धूसरित हो गई थी, मानों अशरण हो कर क्रम से आई हुई वसुन्धरा को उन्होंने अपनी शरण में रख लिया हो। हूणों को पछाड़ देने के समर में बाणों से लगे हुए उनके शरीर के घावों पर लम्बी सफेद पट्टियाँ बँधी थीं, मानों समीप में पहुँची हुई राज्यलक्ष्मी के दीर्घ धवल कटाक्ष पात उन पर पड़ रहे हों। राजा के प्राणों की रक्षा के लिए मानों उनके अंग-अंग अपने आपको शोक की अग्नि में स्वाहा कर रहे थे जिससे उनका दुःखभार व्यक्त हो रहा था। उनके सिर पर चूड़ामणि न थी, बाल गंदे और

३०२ हर्षचरितम् कृशैरवयवैरावेद्यमानदुःखभारम्, अपगतचूडामणिनि मलिनाकुलकुन्तले शेखरशून्ये शिरसि शुचमारूढां मूर्तिमतीमिव दधानम्, आतपगलितस्वे- दराजिना रुदतेव पितृपादपतनोत्कण्ठितेन ललाटपट्टेन लक्ष्यमाणम्, प्रथीयसा बाष्पपयःप्रवाहेणाभिमतपतिमरणमूर्च्छितामिव महीमनवरतं सिञ्चन्तम्, अनन्तसंतताश्रुप्रवाहनिपतननिश्रीकृताविव दुःखक्षामौ कपो- लावुद्वहन्तम्, अत्युष्णमुखमारुतमार्गगतेन द्रवतेव गलितताम्बूलरागेणा- धरबिम्बेनोपलक्षितम्, पवित्रिकामात्रावशेषेन्द्रनीलिकांशुश्यामायमानमचि- रश्रुतपितृमरणजन्यमहाशोकाग्निदग्धमिव श्रवणप्रदेशमुद्वहन्तम्, अस्फुटा- भिव्यक्तव्यञ्जनेनाप्यधोमुखस्तिमितनयननीलतारकमयूखमालाखचितेन शोकप्ररूढश्मश्रुश्यामलेनेव मुखशशिना लक्ष्यमाणम्, केसरिणमिव महाभूभृद्विनिपातविह्वलनिरवलम्बनम्, दिवसमिव तेजःपतिपतनपरिम्ला- नश्रियं श्यामीभूतम्, नन्दनमिव भग्नकल्पपादपं विच्छायम्, दिग्भागमिव प्रोषितदिङ्कुञ्जरशून्यम्, गिरिमिव गुरुवज्रपातदारितं प्रकम्पमानम्, क्रीत- शेखर आपीडः। अधरबिम्बेनापीतीत्थंभूतलक्षणे तृतीया। अभिव्यञ्जनं श्मश्रु। अस्तव्यस्त थे, शेखरस्रज भा न था, इस प्रकार माना मूर्तिमान् हो कर सिर पर बैठे शोक को धारण कर रहे थे। घाम की गर्मी से पसीने की बूँदें उनके ललाट पर छा गई थीं, मानों पिता के पैर पड़ने की उत्कंठा से रो रहे हों। अपने अभिमत स्वामी की मृत्यु से मानों मूर्च्छित पृथिवी को अपने बढ़े हुए बाष्प के प्रवाह से निरन्तर सींच रहे थे। उनके कपोल दुःख से इस प्रकार क्षीण हो रहे थे मानों निरन्तर बहते हुए अश्रुप्रवाह से घिचिक गए हों। उनके मुँह से अत्यन्त उष्ण श्वास के साथ द्रवित हो कर मानों उनके अधर का ताम्बूल-राग निकल रहा था। उनका कर्णदेश विशुद्ध एक मात्र बची हुई इन्द्रनीलमणि की किरण से श्यामवर्ण हो रहा था मानों कुछ क्षण पूर्व सुने हुए पिता की मृत्यु के समाचार से उत्पन्न महाशोक की अग्नि में जल गया हो। उनके मुखचन्द्र में श्मश्रु के रूप में अभी पाम्ही पड़ ही रही थी, फिर मुंह नीचा करने से उनकी आँखों की नीली किरणें नीचे की ओर फैल रही थीं, मानों शोक के कारण क्षौर कर्म न कराने से उनकी दाढ़ी बढ़ आई हो। राजा के विनाश से व्याकुल और बिना किसी आश्रय के बने वे उस सिंह के समान लग रहे थे जो पर्वत के गिरने से उद्विग्न और आश्रयरहित हो गया हो। सूर्य के अस्त होने से दिन के समान तेजस्वी राजा की मृत्यु से मुर्शान हुए अंगों से प्रतीत हो रहे थे। कल्पवृक्ष के भग्न हो जाने से नन्दनवन के समान छायारहित (कान्तिहीन) हो रहे थे। दिग्गज के चले जाने से दिग्भाग की तरह सूने-सूने लग रहे

षष्ठ उच्छ्वासः ३०३ मिव कृशिम्ना, किंकरीकृतमिव कारुण्येन, दासीकृतमिव दौर्मनस्येन, शिष्यीकृतमिव शोचितव्येन, अन्धीकृतमिवाधिना, मूकीकृतमिव मौनेन, पिष्टमिव पीडया, स्विन्नमिव संतापेन, उषितमिव चिन्तया, विलुप्तमिव विलापेन, धृतमिव वैराग्येण, प्रत्याख्यातमिव प्रतिसंख्यानेन, अवज्ञातमिव प्रज्ञया, दूरीकृतमिव दुरभिभवत्वेन, अबोध्येन वृद्धबुद्धीनाम्, असाध्येन साधुभाषितानाम्, अगम्येन गुरुगिराम्, अशक्येन शास्त्रशक्तीनाम्, अप- थेन प्रजाप्रयत्नानाम्, अगोचरेण सुहृदनुरोधानाम्, अविषयेण विषयोपभो- गानाम्, अभूमिभूतेन कालक्रमोपचयानां शोकेन कवलीकृतं ज्येष्ठं भ्रात- रमपश्यत् । आवेगोद्गतकृतस्नेहोत्कलिकाकलापोत्क्षिप्यमाणकाय इव च परवशः समुदगात् । अथ तं दूरादेव दृष्ट्वा देवो राज्यवर्धनश्चिरकालकलितं बाष्पावेगं मुमुक्षुः सुदूरप्रसारितेन संकल्पयन्निव सर्वदुःखानि दीर्घेण दोर्दण्डद्वयेन गृहीत्वा भूभृद्राजा, गिरिश्च । तेजःपतिर्नृपतिः, सूर्यश्च । श्यामः कृष्णः, श्यामा च रात्रिः । कल्पपादपो राजापि । छाया कान्तिः, आतपाभावश्च । प्रत्याख्यातं त्यक्तम् । प्रतिसंख्यानेन विवेककुशल्या बुद्ध्या । कलितं धृतम् । बन्धनं लाभम् । पर्जन्य इन्द्रः । थे। विशाल वज्रपात से फटे हुए पर्वत के समान जोर से कांप रहे थे। कृशता ने मानों उन्हें खरीद लिया था । कारुण्य ने अपना किंकर बना लिया था। दौर्मनस्य ने अपना उन्हें दास बना लिया था। शोक ने शिष्य कर रखा था। मानसिक व्यथा ने अंधा बना दिया था । मौन ने उन्हें चुप कर दिया था । पीड़ा ने पीस दिया था । संताप ने पका डाला था । चिन्ता ने पकड़ लिया था। विलाप ने विलुप्त कर दिया था । वैराग्य ने उन्हें थाम लिया था । बुद्धि ने उन्हें छोड़ दिया था । प्रज्ञा ने उनका तिरस्कार कर दिया था । अब उनमें दुरभिभव होने की बात न रही । बड़े-बूढ़े लोग भी उनके शोक को हटा न सके । सज्जनों के उपदेश भी उन पर काम न करते, गुरुओं की बातें भी न चलतीं, शास्त्रों की शक्ति भी असमर्थ थी, प्रजा के प्रयत्न भी उनका हरण न कर सके, सामयिक उपचार भी कोई असर नहीं कर सके । वह शोक मानों उन्हें खाये जा रहा था । आवेग से उत्पन्न स्नेह की उत्कंठा ने हर्ष के शरीर को मानों झकझोर दिया और वे परवश हो कर उठ खड़े हुए । कुमार हर्ष को देव राज्यवर्धन ने दूर ही से देखा और बहुत पहले से रोके हुए बाष्पावेग को छोड़ने की इच्छा से सारे दुःख का चिन्तन करके दूर तक अपनी लम्बी

३०४ हर्षचरितम्

कण्ठे मुक्तकण्ठं पुनः पतितक्षौमे क्षामे वक्षसि पुनः कण्ठे पुनः स्कन्ध- भागे पुनः कपोलोदरे निधाय तथा तथा रुरोद यथा संबन्धनानीवोत्पा- ट्यन्त हृदयानि। अश्रुस्रोतःशिरा इवामुच्यत लोचनेषु लोकेन स्मृत- नृपतिना राजवल्लभैनापि प्रतिशब्दकनिभेन निर्भरमिवारुद्यत । सुचिराच्च कथं कथमपि निर्वृष्टनयनजलः पर्जन्य इव शरदि स्वयमेवोपशशाम । उपविष्टश्च परिजनोपनीतेन तोयेन तरत्करनखमयूखपुञ्जतया महाजलप्ल- वजायमानफेनलेखमिव पुनः पुनः प्रमृष्टमपि पक्ष्माग्रसंगतबाष्पबिन्दुवृन्द- मन्दोन्मेषमुषितदर्शनं कथं कथमपि चक्षुरक्षालयत् । ताम्बूलिकोपस्था- पितेन च वाससा चन्द्रातपशकलेनेवोष्णोष्णबाष्पदग्धं वदनमुन्ममार्ज । तूष्णीमेव च चिरं स्थित्वोत्थाय स्नानभूमिमगात् । तस्यां च स्थित्वा विभूषं वित्रस्तव्र्यस्तकुन्तलं मौलिमनादरान्निष्पीड्य सावशेषमन्युस्फुरितेन जिजीविषतेव जलधौतसुभगमात्मानमपि चुचुम्बिषतेवाधरेण क्षालितस्य

'पर्जन्यो रसदभ्रेन्दौ' इत्युक्तेः । स हि मेघान्वर्षति । वित्रस्ता ऊर्ध्वं क्षिप्ताः । निर्गता इत्यन्ये । व्यस्ता विक्षिप्ताः । कुन्तलाः केशाः । उक्तं च—'चिकुरः कुन्तलो बालः कचः केशः शिरोरुहः ।' इति । 'चूडा किरीटं केशाश्च संयता मौलयस्त्रयः' इत्युक्तम् ।

भुजाएँ फैलाई और कुमार को गले से लगा कर फिर गिरे वस्त्र वाले क्षीण उनके वक्ष में, फिर कंठ में, फिर स्कन्धभाग में, फिर कपोल में लग-लग कर गला फाड़ कर उस प्रकार रोने लगे मानों हृदय की परतें उत्पाटित की जा रही हों । उस समय राजा का स्मरण करके लोगों ने शिरा के समान आँसू की धार बहाई और राजा के प्रिय लोगों ने भी राज्यवर्धन के रुदन की प्रतिध्वनि के रूप में जोर-जोर से रोना आरम्भ किया । जैसे शरत्काल में मेघ जल बरसा देता है उसी प्रकार देर तक रो-धो कर किसी किसी प्रकार वे स्वयं शान्त हो गए । आसन पर बैठ कर परिजन द्वारा लाए गए जल से नख की किरणों का फेन उत्पन्न करते हुए बार-बार साफ किए गए चक्षु को भी, जिसकी पपनियों पर आंसू के कतरे लग जाने के कारण खुलना और देखना न हो पाता था, किसी-किसी प्रकार धोया। ताम्बूलिक द्वारा दिए गए चाँद के टुकड़े की भाँति रूमाल से गरम आँसू से जला अपना मुंह पोंछा । बहुत देर तक चुप-चाप ही बैठे रहे और फिर वहाँ से उठ कर स्नानभूमि में पहुँचे । वहाँ ठहरे और अलंकारहीन, अस्तव्यस्त बाल वाले अपने सिर को अनादर से पोंछा । बचे हुए शोक से उनका अधर फड़कड़ा रहा था, मानों उसमें जान आ रही थी, पानी से धुले हुए अपने आपको ही मानों चूमना चाहता

षष्ठ उच्छ्वासः ३०५ चक्षुषः श्वेतिम्ना च शारदशशिकरविकसितविशदकुमुदवनदलावलिबलि- विक्षेपैरिव दिग्देवतार्चनकर्म कुर्वाणश्चतुःशालवितर्दिकाविनिवेशितायाम- प्रतिपादिकायां चापाश्रयविनिहितैकोपबर्हणायां पर्यङ्किकायां निपत्य जोष- मस्थात् । देवोऽपि हर्षस्तथैव स्नात्वा धरणीतलनिहितकुथाप्रसारितमूर्तिरदूर एवास्य तूष्णीमेव समवातिष्ठत । दृष्ट्वा दृष्ट्वा दूयमानमानसमग्रजन्मानं समस्फुटदिवास्य सहस्रधा हृदयम् । औरसदर्शनं हि यौवनं शोकस्य । लोकस्य तु नरपतिमरणदिवसादपि दारुणतरः स बभूव दिवसः । सर्व- स्मिन्नेव च नगरे न केनचिदपाचि न केनचिदस्नायि नाभोजि । सर्वत्र सर्वेणारोदि । केवलमनेन च क्रमेणातिचक्राम दिवसः । स च प्रत्यग्रत्व- ष्ट्टंकतक्षततनुरिव वमद्बहलरुधिररसमांसच्छेदलोहितच्छविरपरपारावारप- यसि ममज्ज मञ्जिष्ठारुणोऽरुणसारथिः । मुकुलायमानकमलिनीकोशवि- कलं चकाण चञ्चरीककुलं कमलसरसि । सविधविरहव्याधिविधुरवधूबा- अत्र तूपचारान्मौलिशब्देन शिर उच्यते । वितर्दिका वेदिका । उपबर्हणमुपधा- नम् । जोषं तूष्णीम् । कुथो वर्णकम्बलः । औरसो भ्राता । त्वष्टा विश्वकर्मा तस्य टङ्कश्छेदनशस्त्रम् तेन तनूकृता तनुर्यस्य सः । पुरा स्वभर्तृतेजोविसरोद्विग्नया सूर्यभार्ययावमानितः सूर्यस्त्वष्टारमवोचन्मम तेजस्तनु कुरु । तेनाप्यारोप्य चक्रभ्रमं टंकेनासौ तष्ट इति वार्ता । अपरः पश्चिमः । पारावारः समुद्रः । चकाण जुगुञ्ज । चञ्चरीका भ्रमराः । था । धुली हुई अपनी आँखों की सफेदी से उन्होंने शरत्काल के चन्द्रमा की किरणों से खिले हुए कुमुद के दलों की बलि भेंट करके मानों दिग्देवताओं की अर्चना की । चतुः- शाल की वितर्दिका में रखी हुई बड़े-बड़े पावे वाली, सिरहाने रखे हुए तकिये से युक्त चौकी पर चुपचाप पड़ गए । देव हर्ष भी उसी प्रकार स्नान करके जमीन पर बिछे हुए कम्बल पर फैल कर उनके कुछ ही दूर पर मौन होकर बैठे । दुःख से भरे हुए अपने बड़े भाई को देख-देख कर उनका हृदय मानों हजारों टुकड़ों में बिखर गया । भाई को देखने से शोक और भी जवान हो जाता है (बढ़ जाता है) । लोगों के लिए वह दिन राजा के मृत्युदिवस से भी अधिक दुखद हो गया । सारे नगर में न किसी ने पकाया, न किसी ने स्नान किया और न किसी ने भोजन किया । सब जगह सबने रुदन किया । केवल इसी क्रम में वह सारा दिन चला गया । मानों विश्वकर्मा की टाँकी से अभी-अभी छाँटे २० ह० च०

३०६ हर्षचरितम् ध्यमानं बबन्ध बन्धाविव विबुद्धबन्धूकभासि भास्वति सास्त्रां दृशं चक्र- वाकचक्रवालम् । संचरन्त्याः समधुकररवं कैरवाकरं कलहंसरमणीरमणीयं माणिक्यकाञ्चीकिङ्किणीजालमिवाचकाण श्रियः । प्रकटकलङ्कमुदयमानं विशङ्कटविषाणोत्कीर्णपङ्कसंकरशंकरबर्कुरशकरककुदकूटसंकाशमकाशताका- शे शशाङ्कमण्डलम् । अस्यां च वेलायामनतिक्रमणीयवचनैरुपसृत्य प्रधानसामन्तैर्विज्ञाप्य- मानः कथं कथमप्यभुक्त । प्रभातायां च शर्वर्यां सर्वेषु प्रविष्टेषु राजसु समीपस्थितं हर्षदेवमुवाच—'तात ! भूमिरसि गुरुनियोगानाम् । शैशव एवाग्राहि गुणवत्पताकेव भवता तातस्य चित्तवृत्तिः । यतो भवन्तमेवं- विधं विधेयं विधिविधानोपनतनैर्घृण्यमिदं किमपि विभणिषति मे हृदयम् । नावलम्बनीया बालभावसुलभा प्रेमविलोमा वामता। वैधेय इव मा कृथाः 'कादम्बः कलहंसः स्यात्' । आचकाण चुकूज । कैरवाकरं संचरन्त्याः श्रियः किङ्कि- णीजालमिव चुकूजेत्युत्प्रेक्षा । विशङ्कटो विशालः । बर्कुरस्तरुणः । शकरो दान्तः । भानुं प्रवृत्ता प्रभाता तस्याम् । नियोग आदेशः । विधेयमायत्तम् । विभणिषति कथयितुमिच्छति । विलोमाऽननुकूला । वामता प्रतिकूलता । वैधेयो मूर्खः । गए शरीर वाले, निकलते हुए रुधिर और मांस से लाल, मंजीठे के समान वर्ण वाले सूर्य पश्चिम के जल में डूबने लगे । कमल के सरोवर में भौंरे बंद होनी हुई कमलिनी के कोश में विकल होकर आवाज करने लगे । निकट में होने वाले विरहरूपी व्याधि से पीड़ित अपनी पत्नियों को देख कर दुखी चक्रवाक पक्षियों ने विकसित बन्धूक के समान लाल वर्ण वाले बन्धु की भाँति सूर्य में अपनी डबडबाई आँखें लगा दीं । भौरों की गुंजार और कलहंसियों की आवाज से भरा हुआ कुमुद का सरोवर ऐसा लग रहा था मानों वहाँ संचरण करती हुई लक्ष्मी की माणिक्यकांची में गुथी हुई किंकिणियाँ बज रही हों । आकाश में स्पष्ट कलंक वाला चन्द्रमण्डल कठोर सींग से उछाली हुई मिट्टी से सने हुए शिवजी के तगड़े वृषभ की पीठ पर के ककुद ( टाट ) की भाँति उदित होने लगा । इसी अवसर पर प्रधान सामन्तों ने जिनकी बात टाली नहीं जाती थी, पहुँच कर बड़ा समझाया-बुझाया तो राज्यवर्धन ने किसी किसी प्रकार भोजन किया । रात बीती तो सब राजा लोग जुट आए और तब उन्होंने समीप में बैठे हुए देव हर्ष से कहा—'तात, भारी आदेशों के तुम योग्य हो । शैशवकाल में गुणवान् जनों की पताका के समान तात की चित्तवृत्ति को तुमने प्रभावित कर लिया था। इसीलिए इस प्रकार के आयत्त रहने वाले तुम से दैव की इच्छा से प्राप्त वैराग्य वाला मेरा यह हृदय कुछ कहना चाहता है।

षष्ठ उच्छ्वासः ३०७ प्रत्यूहमीहितेऽस्मिन् । शृणु न खलु न जानासि लोकवृत्तम् । लोकत्रय- त्रातरि मांधातरि मृते किं न कृतं पुरुकुत्सेन ? भ्रूलतादिष्टाष्टादशद्वीपे दिलीपे वा रघुणा । महासुरसमरमध्थाध्यासितत्रिदशरथे दशरथे वा रामेण । गोष्पदीकृतचतुरुदन्वदन्ते दुष्यन्ते वा भरतेन । तिष्ठन्तु तावत्ते तातेनैव शतसमधिकाधिगताध्वरधूमबिसरधूसरितवासववयसि सुगृहीतनाम्नि तत्रभवति परासुतां गते पितरि किं नाकारि राज्यम् ? यं च किल शोकः समभिभवति तं कापुरुषमाचक्षते शास्त्रविदः । स्त्रियो हि विषयः शुचाम् । तथापि किं करोमि । स्वभावस्य सेयं कापुरुषता वा स्त्रैणं वा यदेवमास्पदं पितृशोकहुतभुजो जातोऽस्मि । मम हि भूभृति पर्यस्ते निरवशेषतः प्रस्स्र- वणानीव स्रुतान्यश्रूण्यस्तमिते महति तेजस्यन्धकारीभूतदशाशस्य प्रनष्टः प्रज्ञालोकः, प्रज्वलितं हृदयम् , आत्मदाहभीत इव स्वप्नेऽपि नोपसर्पति विवेकः, बलीयसा संतापेन जातुषमिव विलीनमखिलं धैर्यम , पदे पदे धूमेन मलिनीक्रियते । स्त्रैणे स्त्रीत्वे । परासुता मरणम् । मम हेत्यादिवाक्यद्वये श्लेषो व्याख्येयः । प्रस्स्रवणानि निर्झराः । जतुनो विकारो जातुषम् । 'त्रपुजतुनोः षुक्' । बालभाव में सुलभ होने वाली प्रतिकूलता का अवलम्बन न करना । मेरी इस चाह में विचारमूढ़ के समान विघ्न न उत्पन्न करना । सुनो, क्या लोकव्यवहार नहीं जानते ? त्रिभुवन की रक्षा करने वाले मान्धाता के मरने पर पुरुकुत्स ने क्या नहीं किया? या भ्रूभङ्ग के द्वारा अट्ठारह द्वीपों को आदेश देने वाले दिलीप के बाद रघु ने क्या नहीं किया ? या दैत्यों के साथ युद्ध के बीच देवरथ को स्थापित करने वाले राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात् राम ने क्या नहीं किया ? चारों समुद्रों के छोर को गोष्पद बनानेवाले दुष्यन्त के बाद भरत ने क्या नहीं किया ? उन लोगों की बात जाने दो, सैकड़ों यज्ञों के धूम से इन्द्र की आयु को धूसरित कर देनेवाले सुगृहीतनाम अपने पूज्य पिताजी की मृत्यु के बाद हमारे पिताजी ने क्या राज्य नहीं किया ? जिस व्यक्ति को शोक अभिभूत कर देता है उसे शास्त्रज्ञ लोग कायर कहते हैं। शोक स्त्रियों में उत्पन्न होता है । तब भी मैं क्या करूं ! मेरे स्वभाव की यह कायरता हो या मेरा स्त्रीभाव हो, मैं तात की शोकाग्नि में पड़ गया हूँ । राजा के अस्त होने पर मेरे आँसू झरने के समान झरते रहे । महान् तेज के अस्त हो जाने पर मेरे लिए दिशाओं में अंधेरा छा गया और मेरा प्रज्ञालोक जाता रहा । मेरा हृदय जल गया । मेरा विवेक अपने भी जल जाने के भय से मानों स्वप्न में भी पास नहीं आता । प्रबल संताप के कारण मेरा सारा धैर्य लाह की भांति गल गया । मेरी मति पदे-पदे विषैले बाण से हती हुई हरिणी के समान मूर्च्छित

३०८ हर्षचरितम् दिग्धरोपहतेव हरिणी मुह्यति मतिः, पुरुषद्वेषिणीव दूरत एव भ्रमति परिहरन्ती स्मृतिः, अम्बेव तातेनैव सह गता धृतिः, वार्धुषिकप्रयुक्तानीव धनानीव प्रतिदिवसं वर्धन्ते दुःखानि, शोकानलधूमसंभारसंभूताम्भोघर- भरितमिव वर्षति नयनवारिधाराविसरं शरीरम्। सर्वः पञ्चजनः पञ्चत्व- मुपगतः प्रयाति। वितथमेतद्वदति बालो लोकः। तातो हुताशनतामेव केवलामापन्नोऽपि नैवं दहति माम्। अन्तस्तदेवमिदमसांपरायिकमिव हृदयमवष्टभ्य व्युत्थितः शोको दुर्निवारो वाडव इव वारिराशिम्, पविरिव पर्वतम्, क्षय इव क्षपाकरम्, राहुरिव रविम्, दहति दारयति तनूकरोति कवलयति च माम्। कामं न शक्नोति मे हृदयं तादृशस्य सुमेरुकल्पस्य कल्पमहापुरुषस्य विनिपातमश्रुबिन्दुभिरेव केवलैरतिवाहयितुम्। राज्ये पदे शब्दे, क्रमे च। दिग्धो विप्रलिप्तः शरः। उक्तं च—‘बाणे विषाक्ते दिग्धलिसकौ’ इति। मेरुर्महीधरवद्रोपशब्दः प्रशंसार्थः। वृद्ध्या जीवति वार्धुषिकः वणिक्। वृद्वेर्वृधुषीभावः। पञ्चजनः पञ्चमहाभूतानि, मनुष्यश्च। उक्तं च—‘स्युः पुमांसः पञ्चजनाः पुरुषाः पूरुषा नराः’ इति। पञ्चत्वं मरणम्। वितथमिति। पञ्चसु पृथिव्या- दिषु लयात्पुरुषस्ताद्रूप्यं प्रतिपद्यत इत्यलीकम्। यतस्तत इत्याद्यग्रिमाञप्रतिबद्ध- कार्यदर्शनादित्यर्थः। आपत्कष्टम्। क्लेश इत्यर्थः। संपरायः सङ्ग्रामः। तस्मै यन्न भवति तदसांपरायिकम्। सभयं यः किल भीतः स कथं व्युत्थितं निवारयेत्। वाडव इत्यादयो दहतीत्यादिभिर्यथाक्रमं योज्याः। पविर्वज्रः। कल्पतेऽस्मादभीष्टार्थ हो रही है। मेरी स्मृति मुझे छोड़ कर दूर ही दूर चक्कर मार रही है मानो पुरुष से उसका द्वेष हो। अम्बा के समान मेरी धृति पिता के साथ ही चली गई। बनिया के धन के समान मेरे दुःख बढ़ते ही जा रहे हैं। शोक की अग्नि का धूमसम्भार मेघ के रूप में शरीर में भर गया है और आंखों से जलधारा बरस रही है। सारे महाभूत अपने-अपने भाग में मिलते जारहे हैं। यह बालप्रकृति के लोग मिथ्या बोलते हैं। तात केवल अग्नि में मिल कर ही मुझे नहीं जला रहे हैं। भीतर ही भीतर लड़ने में असमर्थ के समान मेरे हृदय को दबा कर उठा हुआ दुर्निवार शोक उस प्रकार जला रहा है जैसे वडवानल समुद्र को, उस प्रकार विदीर्ण कर रहा है जैसे वज्र पर्वत को, उस प्रकार कृश कर रहा है जैसे क्षय चन्द्रमा को, उस प्रकार निगल रहा है जैसे राहु सूर्य को। निश्चय ही सुमेरुसदृश उस प्रकार के युगपुरुष के विनाशजन्य शोक को मेरा हृदय केवल आँसू की बूँदों से कम नहीं कर सकता। चकोर के समान मेरी आँखें विष- तुल्य राज्य से विरक्त हो गईं। राज्यलक्ष्मी को उस प्रकार त्याग देने का मन करता है

षष्ठ उच्छ्वासः ३०६ विष इव चकोरस्य मे विरक्तं चक्षुः । बहुमृतपटावगुण्ठनां रङ्गितरङ्गां जनंगमानामिव वंशबाह्यामनार्या श्रियं त्यक्तुमभिलषति मे मनः । क्षणमपि दग्धगृहे शकुनिरिव न पारयामि स्थातुम् । सोऽहमिच्छामि मनसि वाससीव सुलग्नं स्नेहमलमिदममलैः शिखरिशिखरप्रस्रवणैः स्वच्छस्रो- तोम्बुभिः प्रक्षालयितुमाश्रमपदे । यतस्त्वमन्तरितयौवनसुखामनभिमता- मपि जरामिव पुरुराज्ञया गुरोर्गृहाण मे राज्यचिन्ताम् । त्यक्तसकलवाल- क्रीडेन हरियेव दीयतामुरो लक्ष्म्यै । परित्यक्तं मया शस्त्रम् ।' इत्यभिधाय च खङ्गग्राहिणो हस्तादादाय निजं निस्त्रिंशमुत्ससर्ज धरण्याम् । अथ तच्छ्रुत्वा निशितशिखेन शूलेनेवाहतः प्रविदीर्णहृदयो देवो इति कल्पः । चकोरः क्रकचः । तस्य विषे दृष्टे अक्षिणी विरज्येते । मृतस्य पटः । अवगुण्ठनं मस्तकाच्छादनम् । रङ्गः समाजः । जनंगमश्चण्डालः । उक्तं च— 'चण्डालप्लवमातङ्गदिवाकीर्तिजनंगमाः । निषादश्वपचान्तेवासिचण्डालपुक्कसाः ॥' इति । वंशोऽभिजननं प्रबन्धो वेणुश्च । बाह्या बहिर्भूता, वहनीया च । शकुनिर्गृह- चटिका । गृहशारिकेत्यन्ये । स्नेहः प्रेम, तैलादिश्च । यतस्त्वमिति । पुरा ययातिः शुक्रदुहितरं देवयानीमवमन्य देवयान्या दासीभूतां शर्मिष्ठामसकृन्मिथ्याकामयानेन शुक्रेण जरां यास्यसीति शप्तः, प्राप्तजरादुःखो विषयलम्पटोऽन्यपुत्रैरगृहीतां जरां पुरौ स्वपुत्रे कृताभ्युपगमे संक्रामयांबभूवेति वार्ता । जराप्यन्तरितयौवनसुखा- ऽनभिमता च । गुरोर्ययातेरपि । मामन्तरेण मां विना, मय्यसंनिहित इत्यर्थः । जैसे बहुत से मरे लोगों के रंग-बिरंगे कफन के घूंघट से सजाई हुई, लोगों का मन बहलाने वाली, बाँस के ऊपर लगी हुई टेसू को पुतली को डोम लोग फेंक देते हैं । इस जले हुए घर में पक्षी के समान मैं क्षण भर भी नहीं रह सकता । आश्रम में रह कर मैं मन के वस्त्र में लगे हुए स्नेह जैसे इस मल को पर्वतों के शिखर से प्रवाहित होते हुए निर्मल झरनों के जल से धो देना चहता हूं। जैसे पुरु ने पिता की आज्ञा से यौवनसुख से रहित और अप्रिय वार्धक्य को स्वीकार किया उसी प्रकार तुम मेरी राज्यचिन्ता ग्रहण कर लो । कृष्ण के समान सारी बालकीड़ाओं को अब छोड़ कर दाबने के लिए लक्ष्मी को अपनी जाँघ दो। मैने शस्त्र का अब परित्याग ही कर दिया ।' यह कह कर उन्होंने दाहिने हाथ से उठाकर अपनी तलवार जमीन पर रख दी । यह सुनते ही चोखे शूल से आहत हुए की तरह देवहर्ष का हृदय विदीर्ण हो गया । उनके मन में अनेक प्रकार के विचारों का तूफान उठ खड़ा हुआ—'क्या मेरी अनुपस्थिति में डाह के कारण देख न पाने वाले किसी खल ने आर्य से मेरे प्रति कुछ कह दिया, जिससे कुपित हों । या इस प्रकार मेरी परीक्षा ले रहे हैं । या तात के शोक से उत्पन्न

३१० हर्षचरितम् हर्षः समचिन्तयत्—'किं नु खलु मामन्तरेणार्यः केनचिदसहिष्णुना किंचिद्ग्राहितः कुपितः स्यात् । उतानया दिशा परीक्षितुकामो माम् । उत तातशोकजन्मा चेतसः समाक्षेपोऽयमस्य । आहोस्विदार्य एवायं न भवति, किं वार्येणान्यदेवाभिहितमन्यदेवाश्रावि मया शोकशून्येन श्रवणेन्द्रियेण । आर्यस्य चान्यद्विवक्षितमन्यदेवापतितं मुखेन । अथवा सकलवंशविनाशाय निपातनोपायोऽयं विधेः । मम वा निखिलपुण्यपरिक्ष- योपक्षेपः । कर्मणामनुकूलसमग्रग्रहचक्रवालविलसितं वा । अथवा तातविनाशनिःशङ्ककलिकालक्रीडितं येनायं यः कश्चिदिव यत्किंचनकारिणं मामपुष्यभूतिवंशसंभूतमिव, अताततनयमिव, अनात्मानुजमिव, अभक्त- मिव, अदृष्टदोषमपि श्रोत्रियमिव सुरापाने, सद्भूत्यमिव स्वामिद्रोहे, सज्जनमिव नीचोपसर्पणे, सुकलत्रमिव व्यभिचारे, अतिदुष्करे कर्मणि समादिष्टवान् । तदेतत्तावदनुरूपं यच्छौर्योन्मादमदिरोन्मत्तसमस्तसाम- न्तमण्डलसमुद्रमथनमंदरे तादृशि पितरि मृते तपोवनं वा गम्यते वल्कलानि वा गृह्यन्ते तपांसि वा सेव्यन्ते । या तु मयि राजाज्ञा सा श्रोत्रियो वेदपारगः । धन्वनि मरौ । धन्वन्यपि दग्धे राजाज्ञापि दाहकारिणी । यह इनके चित्त की व्याकुलता है । या आर्य यह नहीं हो सकते, क्या यही बात है कि आर्य ने कुछ दूसरा ही कहा और शोक के कारण शब्दग्रहण की क्षमता से रहित कर्णेन्द्रिय से रहित मैंने कुछ दूसरा ही सुना । आर्य ने कुछ दूसरी बात कहना चाहा और मुँह से कुछ दूसरी बात निकल गई । अथवा विधिने सारे वंश के विनाश के लिए ध्वंस का उपाय रचा है । या मेरे सारे पुण्यों के क्षीण हो जाने का यह प्रसंग है ? या प्रतिकूल होकर एकत्र हुए सारे ग्रहों के ये काम हैं । या तात के अब न रहने से कलिकाल निःशंक होकर क्रीड़ा कर रहा है जिससे किसी किसी के समान आर्य ने स्वेच्छा से आचरण करने वाले मुझे अत्यन्त दुष्कर कार्य करने के लिए उस प्रकार आदेश दिया है जैसे मैं पुष्यभूति के वंश में उत्पन्न ही नहीं, तात का पुत्र ही नहीं, अपना भाई ही नहीं, या सेवक ही नहीं । बिना किसी दोष के ही श्रोत्रिय के समान सुरापान में, सद्भूत्य के समान स्वामिद्रोह में, सज्जन के समान नीच के पास जाने में, कुलकलत्र के समान व्यभिचार में जैसे मुझे लगा दिया है । यह तो अच्छा ही है जो शौर्य के उन्माद की मदिरा से उन्मत्त समस्त सामन्तमण्डल का मंदर के समान मंथन करने वाले तात की मृत्यु के बाद तपोवन में रहा जाय, या वल्कल धारण किया जाय, या तपस्या की जाय ।

षष्ठ उच्छ्वासः ३११ दग्धेऽपि दाहकारिणी मय्यवप्रहग्लपिते धन्वनीवाङ्गारवृष्टिः । तदसद्दश- मिदमार्यस्य । यद्यपि च विभुरनभिमानः, द्विजातिरनेषणः, मुनिररोषणः, कपिरचपलः कविरमत्सरः, वणिगतस्करः, प्रियजानिरकुहनः, साधुर- दरिद्रः, द्रविणवानखलः, कीनाशोऽनक्षितगतः, मृगयुरहिंस्रः, पाराशरी ब्राह्मण्यः, सेवकः सुखी, कितवः कृतज्ञः, परिव्राडबुभुक्षुः, नृशंसः प्रिय- वाक्, अमात्यः सत्यवादी, राजसूनुरदुर्विनीतश्च जगति दुर्लभः, तथापि ममार्य एवाचार्यः । को हि नाम तद्विधे निपतिते राजगन्धकुञ्जरे जनयि- तरि चेदृशे विफलीकृतविशालशिलास्तम्भोरुभुजे भूपुजि भ्रातरि त्यक्त- राज्ये ज्यायसि नववयसि तपोवनं गच्छति सकललोकलोचनजलपाता- पवित्रं मृद्रोलकं वसुधाभिधानं धनमदखेलनिखिलखलमुखविकारलक्षणा- ख्यायमाननीचाचरणां श्रीसंज्ञिकां सुभटकुटुम्बकर्मकुम्भदासीं चण्डालोऽपि अनेषणो निरभिलाषः । प्रिया जाया यस्य । 'जायाया निङ्' । कुहना ईर्ष्या, शङ्का वा । कीनाशः क्षुद्रः । उक्तं च—'कृतान्ते पुंसि कीनाशः क्षुद्रकार्षिकयोस्त्रिषु' । अ- नक्षितगतः प्रियः । मृगयुर्व्याधः । पाराशरी भिक्षुः । कितवो द्यूतकृत् । गोप्यो दासः । जो राज्य करने की मुझ पर आज्ञा है वह अनावृष्टिसे सूखा पड़े हुए मरु के समान स्वयं दग्ध और विघ्नों से क्षीण मुझ पर दाह करने वाली अङ्गार की वर्षा है। तो यह कथन आर्य के सदृश न था। यद्यपि जिसमें अभिमान न हो ऐसा अधिकारी, जिसमें एषणा न हो ऐसा द्विजाति, जिसमें रोष न हो ऐसा मुनि, जिसमें चपलता न हो ऐसा कपि, जिसमें मत्सर न हो ऐसा कवि, जो बेईमानी न करे ऐसा वणिक्, जो छलिया न हो ऐसा प्रिय, जो दरिद्र न हो ऐसा सज्जन, जो खल न हो ऐसा धनी, जो द्वेष न करता हो ऐसा क्षुद्र, जो हिंसा न करता हो ऐसा शिकारी, जो ब्राह्मणद्वेषी न हो ऐसा पाराशरी भिक्षु, जो सेवक हो ऐसा सुखी, जो धूर्त हो ऐसा कृतज्ञ, जो भीख मांगता न हो ऐसा परिव्राट्, जो प्रिय बोलता हो ऐसा क्रूर, जो सत्यवादी हो ऐसा कूटनीतिज्ञ मंत्री, और जो दुर्विनीत न हो ऐसा राजपुत्र संसार में दुर्लभ है। मेरे उपदेशक आचार्य तो आर्य ही हैं। कौन ऐसा है जो उन गन्धहस्ती के समान महाराज पिता श्री के चले जाने पर और शिलास्तम्भ के समान विशाल भुज को विफल करके राज्य छोड़ कर बड़े भाई के तपोवन चले जाते समय लोगों के आँसू से अपवित्र पृथिवी नामक मिट्टी के गोले को एवं धनमद की क्रीड़ा में निखिल दुष्टजनों के मुख को विकृत कर देने से विख्यात नीच आचरण वाली लक्ष्मीसंज्ञक सुभटों के काम करने वाली कुम्भदासी (पनभरिन) की चाण्डाल होकर

कामयेत । कथमिव संभावितमत्यन्तमनुचितमिदमार्येण । किमुपलक्षित- मनवदातमिदं मयि । किं वास्य चेतसश्च्युतः सौमित्रिर्विस्मृता वा वृकोदरप्रभृतयः । अनपेक्षितभक्तजना स्वार्थैकनिष्पादननिष्ठा नासीदि- यमार्यस्येदृशी प्रभाविष्णुता । अपि चार्ये तपोवनं गते जिजीविषुः को मनसापि महीं ध्यायेत् । कुलिशशिखरखरनखरप्रचयप्रचण्डचपेटापाटित- मत्तमातङ्गोत्तमाङ्गमदच्छटाच्छुरितचारुकेसरभारभास्वरमुखे केसरिणि वनविहाराय विनिर्गते निवासं गिरिगुहां कः पाति पृष्ठतः । प्रतापसहाया हि सत्त्ववन्तः । कश्चपलां राजलक्ष्मीं प्रत्यनुरोधोऽयमार्यस्य यदियमपि न चीवरान्तरितकुचा कुशकुसुमसमित्पलाशपूलिकां वहन्ती तत्रैव तपोवने वनमृगीव नीयते जराजालिनी । किंवा ममानेन वृथा बहुधा विकल्पितेन तूष्णीमेवार्यमनुगमिष्यामि । गुरुवचनातिक्रमकृतं च किल्विषमेतत्तपोवने तप एवापास्यति ।' इत्यवधार्य मनसा प्रथमतनं गतस्तपोवनमधोमुख- स्तूष्णीमवातिष्ठत् । राजसूनुर्दुर्विनीतश्चेत्येतत्प्रस्तावेन तदुक्तम् । खेलाः सविलासाः । अनवदातं निर्म- लम् । सौमित्रिर्लक्ष्मणः । वृकोदरो भीमसेनः । प्रचयः समूहः । चपेटा करतला- घातः । वनमृग्यपि कुशादि वहति । जालिनी मायिनी । कामना करे ? कैसे इस अत्यन्त अनुचित विचार को आर्य ने स्वीकार कर लिया ? क्या उनके मन में लक्ष्मण नहीं रहे, या भीम आदि छोटे भाई विस्मृत हो गए ? अपने भक्तजनों की परवाह न करने वाली, अपने ही स्वार्थ के निष्पादन करने में निष्ठुर आर्य की यह प्रभुता पहले न थी । अगर आर्य तपोवन में चले जाते हैं तब जीने की इच्छा रखने वाला कौन मन से भी पृथिवी की चिन्ता रखे ! वज्र के समान अपने नखों के प्रचण्ड चाँटे से मतवाले हाथी के मस्तक को विदीर्ण कर देने से उत्पन्न मदधारा से भींग हुए केसर के कारण भास्वर मुख वाले सिंह के वन-विहार के लिए निकल जाने पर पीछे कौन उसके निवासस्थान कन्दरा की रक्षा करे ? महानुभाव लोग प्रताप की सहायता लेते हैं । चंचल स्वभाव वाली राजलक्ष्मी के प्रति आर्य का कैसा यह आग्रह है कि चीवर से ढंके स्तनों वाली और कुश, कुसुम, समिधा एवं पलाश की पूली ढोने वाली वन- मृगी के समान अति जर्जर इसे वहीं तपोवन में साथ नहीं ले जाते ? इस तरह के मेरे बहुत संकल्प-विकल्प से क्या मतलब ? मैं तो चुपचाप आर्य के पीछे चल दूँगा । गुरु- वचनों के पालन न करने से उत्पन्न पाप को तपोवन में तप ही दूर करेगा ।' ऐसा निश्चय करके मन से तपोवन में पहले ही पहुँचे हुए हर्ष मुँह नीचा किए चुपचाप बैठे रहे ।

षष्ठ उच्छ्वासः ३१३ अत्रान्तरे पूर्वादिष्टेनेव रुदता वस्त्रकर्मान्तिकेन समुपस्थापितेषु वल्क- लेषु, निर्दयकरतलताडनभियेव कापि गते हृदये, रटति राजस्त्रैणे, तारम- ब्रह्मह्ययमूर्ध्वदोषिण विरुदति विप्रजने, पादप्रणतिपरे फूत्कुर्वति पौरवृन्दे, विद्राति विद्रुतचेतसि चिरंतने परिजने, परिजनाव लम्बिते, गते वर्षीयसि, वेपमानवपुषि, पर्याकुलवाससि, शोकगद्गदवचसि, विगलितनयनपयसि, निवारणोद्यतमनसि, विशति बन्धुवर्गे, निराशेषु नखलिखितमणिकुट्टि- मेष्ववाङ्मुखेषु निःश्वसत्सु सामन्तेषु, सबालवृद्धासु तपोवनाय प्रस्थितासु सर्वासु प्रजासु सहसैव प्रविश्य शोकविक्लवः प्रक्षरन्नयनसलिलो राज्यश्रियः परिचारकः संवादको नाम प्रज्ञाततमो विमुक्ताक्रन्दः सदस्या- त्मानमपातयत् । अथ संभ्रान्तो भ्रात्रा सह स्वयं देवो राज्यवर्धनस्तं पर्यपृच्छत्—'भद्र ! भण भग किमस्मद्व्यसनव्यवसायवर्धनबद्धधृतिः, अवनिपतिमरणमुदित- अत्रेत्यादौ । संवादको नाम सदस्यात्मानमपातयदि ति संबन्धः । कर्मान्तिको- ऽधिकृतः । करतलताडनेति । करतलताडनं हृदये वा । स्त्रैणे स्त्रीसमूहे । 'अब्रह्मण्यम- वध्योक्तौ ।' फूत्करणमुद्दामरोदध्वनिः । विद्रातिः कुत्सितः । गते प्राप्ते । वर्षीयसि वृद्धतरे । इसी बीच पहले ही संहजे हुए वस्त्रकर्मान्तिक ( सरकारी तोशेखाने का अधिकारी ) ने रोते हुए वल्कल हाजिर किया । हृदय मानों हाथों के निर्दय ताड़न के डर से कहीं चला गया । महल की स्त्रियाँ चिल्लाने लगीं । ब्राह्मण लोग हाथ उठा कर जोर से 'हमारा त्याग न करो' इस प्रकार पुकारने लगे । नागरिक लोग पैर पर बार-बार गिर-गिर कर घिघियाने लगे । पुराने सेवक विचलित मन से दौड़ पड़े । बड़े-बूढ़े बाँधव लोगों ने भीतर प्रवेश किया, उन्हें परिजनों ने सम्हाल रखा था, उनके शरीर कांप रहे थे, वस्त्र भी इधर-उधर गिर रहा था, शोक से उनकी वाणी गद्गद थी, नेत्रों से आँसू ढल रहे थे, राज्य- वर्धन को रोकने के लिए उनके मन में व्यग्रता थी । सामन्त लोग निराश होकर मुँह नीचा किए नख से मणिकुट्टिम पर कुछ लिख रहे थे और आह भर रहे थे । लड़के से बूढ़े तक सारी प्रजा तपोवन में जाने के लिए प्रस्थान करने लगी । उसी समय सहसा शोक से व्याकुल, नेत्र से आँसू ढालता हुआ राज्यश्री का संवादक नाम का अत्यन्त परिचित परिचारक रोता-पीटता सभा में आकर गिर पड़ा । तब भाई के साथ घबड़ा कर देव राज्यवर्धन ने उससे पूछा—'हमारे दुःख के व्यापार को बढ़ाने में निश्चल धैर्यवाला, राजा की मृत्यु से प्रसन्न विधि अधीर बना देने वाला

३१४ हर्षचरितम् मतिः, अद्युतिकरमपरमधिकतरमितो दुःखातिशयं समुपनेति विधिः' इति । स कथं कथमप्यकथयत्—'देव ! पिशाचानामिव नीचात्मनां चरितानि छिद्रप्रहारीणि प्रायशो भवन्ति । यतो यस्मिन्नहन्यवनिपति- रुपरत इत्यभूद्वार्त्ता तस्मिन्नेव देवो ग्रहवर्मा दुरात्मना मालवराजेन जीव- लोकमात्मनः सुकृतेन सह त्याजितः । भर्तृदारिकापि राज्यश्रीः कालायस- निगडयुगलचुम्बितचरणा चोराङ्गनेव संयता कान्यकुब्जे कारायां निक्षिप्ता । किंवदन्ती च यथा किलाऽनायकं साधनं मत्वा जिघृक्षुः सुदुर्मतिरेतामपि भुवमाजिगमिषति । इति विज्ञापिते' प्रभुः प्रभवतीति । ततश्च तादृशमनुपेक्षणीयमसंभावितमाकस्मिकमुपरि व्यतिकरमाकर्ण्या- श्रुतपूर्वत्वात्परिभवस्य, परपरिभवासहिष्णुत्या च स्वभावस्य, दर्पबहुलत- या च नवयौवनस्य, वीरक्षेत्रसंभवाच्च जन्मनः, कृपाभूमिभूतायाश्च स्वसुः स्नेहात्स तादृशोऽपि बद्धमूलोऽप्यत्यन्तगुरुनेकपद एवास्य ननाश शोकावेगः । विवेश च सहसा केसरीव गिरिगुहागृहं गभीरहृदयं भयंकरः कोपावेगः । केशिनिषूदनशङ्काकुलकालियकुलभङ्गुरभ्रूभङ्गत रङ्गिणी श्यामायमाना यम- कारायां बन्धने । किंवदन्ती लोकवार्ता । केशिनिषूदनः कृष्णः । यमस्वसा यमुना । सापि कालियाकुला सतरङ्गा, इससे बढ़ कर भी क्या दुःखातिशय उपस्थित कर रहा है ?' उसने किसी प्रकार कहा— 'देव, नीच आत्मा वाले व्यक्ति पिशाचों की तरह छिद्र देख कर प्रहार करते हैं। इसी कारण जिस दिन 'महाराज शान्त हुए' यह समाचार फैला उसी दिन दुरात्मा मालवराज ने देव गृहवर्मा को अपने पुण्य के साथ जीवलोक से हटा दिया। भर्तृदारिका राज्यश्री को भी लोहे की बेड़ियों में जकड़ कर चोर स्त्री के समान कान्यकुब्ज के कारावास में डाल दिया है। यह खबर उड़ रही है कि सेना को नायकहीन जानकर वह दुर्बुद्धि आक्रमण करने के लिए इस ओर भी आना चाहता है। मेरे इस निवेदन में अब आप ही समर्थ हैं।' तब उस प्रकार के अपने ऊपर उपेक्षा न करने योग्य, जिसकी कोई सम्भावना न थी ऐसे आकस्मिक व्यसन को सुन कर अपना परिभव पहले पहल सुनने के कारण, दूसरे द्वारा किया गया अपना परिभव न सहन करने वाले स्वभाव के कारण, कृपा के पात्र बहन के स्नेह से राज्यवर्धन का बद्धमूल भी अत्यन्त गुरुभूत उस प्रकार का शोकावेग एक ही क्षण में नष्ट हो गया। जैसे सिंह पर्वत की कन्दरा में प्रवेश करता है उसी प्रकार उनके हृदय में भयंकर कोप का आवेग प्रविष्ट हुआ। कृष्ण के भय से व्याकुल कालियनाग

षष्ठ उच्छ्वासः ३१५

स्वस्रेव प्रथीयसी ललाटपट्टे भीषणा भ्रुकुटिरुदभिद्यत । दर्पात्परामृशन्नख- किरणसलिलनिर्झरैः समरभारसंभावनामभिषेकमिव चकार दिक्नागकुम्भ- कूटविकटस्य बाहुशिखरकोशस्य वामः पाणिरुल्लवः । संगलत्स्वेदसलिल- पूरितोदरो निर्मूलं मालवोन्मूलनाय गृहीतकेश इव दुर्मदश्रीकचग्रहोत्क- ण्ठयेव च कम्पमानः पुनरपि समुत्ससर्प भीषणं कृपाणं पाणिरपरः शस्र- ग्रहणमुदितराजलक्ष्मीक्रियमाणदिष्टवृद्धिविधुतसिन्दूरधूलिरिव कपिलः कपो- लयोरदृश्यत रोषरागः । समाासन्नसकलमहीपालचूडामणिचक्राक्रमणजाता- हंकार इव च समारुरोह वाममूरुदण्डमुत्तानितश्चरणो दक्षिणः । निष्ठुरा-

श्यामायमाना च । परामृशन्नित्यर्थाद्बाहुशिखरमेव । कोशो दिव्यम् । उक्तं च— 'कोशोऽस्त्री कुड्‌मले खङ्गपिधानेऽर्थौघदिव्ययोः' इति कोशकारः । पाणिः सलिलपू- रितोदरो भवति । कचाः केशाः । यश्च कामी कामिनीकचग्रहणं प्रत्युत्कण्ठते स

के रूप में भङ्गुर अभ्रङ्ग रूपी तरङ्गों वाली श्यामवर्ण यमुना नदी के समान भीषण भ्रुकुटि उद्भिन्न हो गई । उनका बायाँ पाणिपल्लव दिग्गज के कुम्भ कूट के समान विकट स्कन्ध- देश के खड्ग कोश का स्पर्श करता हुआ युद्धभार के ग्रहण से पूर्व नखकिरणों की जल- धार से मानों अभिषेक करने लगा¹ । उसका दाहिना हाथ पसीने से भर गया और मालव के निर्मूल विनाश के लिए मानों दुर्मद श्री के बालों को पकड़ने की उत्कंठा से काँपता हुआ भीषण कृपाण की ओर बार-बार बढ़ने लगा । उनके कपोलों पर कपिल वर्ण का रोषराग इस प्रकार दिखाई पड़ने लगा मानों उसके शस्त्रग्रहण से प्रसन्न राज्यलक्ष्मी अपनी भाग्यवृद्धि मान कर सिन्दूर की धूल उड़ाने लगी हो । उसका दाहिना चरण पास में बैठे हुए समस्त राजाओं की चूड़ामणियों पर प्रतिबिम्ब के रूप में आक्रमण करने से

१. श्री अग्रवाल जी ने इस कूटश्लेष के तीन अर्थ किए हैं—(१) म्यान के पक्ष में- राज्यवर्धन का बायाँ हाथ दाहिनी ओर कमर में खोंसी हुई भुजाली की मूठ पर गया जो गजमस्तक के अलंकरण से सुशोभित थी । यों उस हाथ की नखकिरणों ने युद्ध का बोझा उठाने में समर्थ उस म्यानबंद भुजाली का मानों जलधाराओं से सम्मानपूर्ण अभिषेक किया । (२) दिव्यपरीक्षा के पक्ष में—गजमस्तक की तरह विकट मुट्ठा बँधा हुआ बायाँ हाथ दिव्यपरीक्षा के समय दाहिना मुट्ठा को अपनी नखकिरणों से मानों मरणपर्यन्त दंड की सम्भावना का अभिषेक करा रहा था । (३) अभिधर्मकोशग्रन्थ के पक्ष में—दिक्नाग के मस्तक की कूटकल्पनाओं से विकट बना हुआ जो वसुबन्धु का अभिधर्मकोश ग्रन्थ का भावनामय (विचारों के द्वारा) ऐसा ज्ञान कराता था जिससे शास्त्रार्थरूपी युद्धों के मचने से रसहीनता आ जाती थी । (पृ. १२१-१२३ हर्ष. सां. अ.)

३१६ हर्षचरितम् क्षुब्धकर्षणनिष्ठ्यूतधूमलेखो निर्वीरोर्वीकरणाय विमुक्तशिख इव लिलेख मणिकुट्टिममितरः पादपद्मः । दर्पस्फुटितसरसव्रणोच्छलितरुधिरच्छटाव- सेकैः शोकविषप्रसुप्तं प्रबोधयन्निव पराक्रममनुजमवादीत्—'आयुष्मन् ! इदं राजकुलम्, अमी बान्धवाः, परिजनोऽयम्, इयं भूमिः, भूपतिभुज- परिघपालिताश्चैताः प्रजाः, गतोऽहमद्यैव मालवराजकुलप्रलयाय । इदमेव तावद्वल्कलग्रहणमिदमेव तपः शोकापगमोपायश्चायमेव यदत्यन्ताविनीता- रिनिग्रहः । सोऽयं कुरङ्गकैः कचग्रहः केसरिणः, भेकैः करपातः कालस- र्पस्य, वत्सकैर्बन्दिग्रहो व्याघ्रस्य, अलगर्देर्गलग्रहो गरुडस्य, दारुभिर्दाहा- देशो दहनस्य, तिमिरैस्तिरस्कारो रवेः, यो मौरवराणां मालवैः परिभवः पुष्यभूतिवंशस्य । अन्तरितस्तापो मे महीयसा मन्युना । तिष्ठन्तु सर्वे एव राजानः करिणश्च त्वयैव सार्धम् । अयमेको भण्डिरयुतमात्रेण तुरङ्ग- माणामनुयातु माम् ।' इत्यभिधाय चानन्तरमेव प्रयाणपटहमादिदेश । कम्पते स्वेदवांश्च भवति । दिष्टमानन्दः । विमुक्तेति । धीराः किल रोषेण केशसंयम- नमाऽरातिपरिभवप्रतीकारं न कुर्वंते । भेको मण्डूकः । करपातश्चपेटादानम् । अलगर्दैर्जलसर्पैः । मानों उत्पन्न अहंकार के कारण बायें ऊरुदण्ड पर उत्तान होकर चढ़ गया । बायें पैर के अंगूठे को कस के दबा कर रगड़ने से मानों पृथिवी को वीरविहीन करने के लिए धूम- शिखा उत्पन्न करता हुआ मणिकुट्टिम को कुरेदने लगा । शोक के कारण विष से मूर्च्छित होकर पड़े हुए अपने पराक्रम को मानों दर्प के स्फोट से उत्पन्न उछाल मारते हुए रुधिर के छींटे डाल कर जगाते हुए छोटे भाई हर्ष से बोल उठे—'आयुष्मन्, यह राजकुल है, ये भाई-बन्धु हैं, ये परिजन हैं, यह पृथिवी है, महाराज के भुजदण्ड से पालित ये प्रजाएँ हैं, इन्हें सम्हालो, अब मैं मालवराज के वंश का नाश करने के लिए आज ही चला । मेरे लिए यही वल्कल का धारण और यही तप है और यही शोक को दूर करने का उपाय भी है कि अत्यन्त अविनीत इस शत्रु का दमन करूँ । हिरन शेर की मूंछ मरोड़ना चाहता है, मेढ़क काले सांप को तमाचा लगाना चाहता है, बछड़ा बाघ को बंदी बनाना चाहता है, डोडबा सांप गरुड़ की गर्दन टीपना चाहता है, ईंधन स्वयं अग्नि को जलाना चाहता है, अन्धकार सूर्य का तिरस्कार करना चाहता है—यह जो मालवों ने पुष्यभूति- वंश का अपमान किया है । इस महान् क्रोध के कारण अब मेरा ताप मिट गया है । समस्त राजगण और हाथी तुम्हारे साथ ही रहें । अकेला यह भंडी दश हजार घोड़ों

षष्ठ उच्छ्वासः ३१७ तं च तथा समादिशन्तमाकर्ण्य जामिजामातृवृत्तान्तविज्ञानप्रकोपा- धानदूयमाने मनसि निर्वर्तनादेशेन दूरप्ररूढप्रणयपीड इव प्रोवाच देवो हर्षः—‘कमिव हि दोषं पश्यत्यार्यो ममानुगमनेन ? यदि बाल इति नितरां तर्हि न परित्याज्योऽस्मि । रक्षणीय इति भवद्भुजपञ्जरो रक्षास्था- नम्, अशक्त इति क परीक्षितोऽस्मि, संवर्धनोय इति वियोगस्तनूकरोति, अक्लेशसह इति स्त्रीपक्षे निक्षिप्तोऽस्मि, सुखमनुभवत्विति त्वयैव सह तत्प्रयाति, महानध्वनः क्लेश इति विरहाग्निरविषह्यतरः, कलत्रं रक्षत्विति श्रीस्ते निस्त्रिंशेऽधिवसति, पृष्ठतः शून्यमिति तिष्ठत्येव प्रतापः, राजकमन- धिप्रितमिति तत्सुबद्धमार्यगुणैः, न बाह्यः सहायो महत इति व्यतिरिक्त- मेव मां गणयति, प्रलघुपारकरः प्रयामीति पादरजसि कोऽतिभारः, द्वयो- र्गमनमसांप्रतमिति मामनुगृहाण गमनाज्ञया, कातरो भ्रातृस्नेह इति जामिर्भगिनी । न बाह्य इति । किल य एव त्वं स एवाहमिति । कोऽसौ सहायो- ऽस्य । आत्मंभरिता स्वार्थमात्रपरता । की सेना लेकर मेरे साथ चलेगा।' यह कह कर उन्होंने तुरत ही कूच का डंका बजाने का हुक्म दिया । इस प्रकार राज्यवर्धन के आदेश को सुन कर बहन और बहनोई के वृत्तान्त से प्रचण्ड प्रकोप द्वारा आविष्ट, अपने रुक जाने के आदेश से बढ़ी हुई प्रणय की पीड़ा से मानो युक्त देव हर्ष ने कहा—'मेरे अनुगमन से आर्य कौन-सा दोष देखते हैं ? यदि मैं नाबालिग हूँ तो मैं परित्याग के योग्य नहीं । यदि रक्षणीय हूँ तो आर्य का भुजपंजर ही मेरी रक्षा का स्थान है । यदि मुझे असमर्थ कहें तो आर्य ने मेरी कहाँ परीक्षा ली ? संवर्धन के योग्य हूँ तो आपका वियोग मुझे क्षीण कर डालता है। क्लेश को सह नहीं पाता हूँ तो यह कह कर मुझे स्त्रियों की श्रेणी में रख रहे हैं। 'सुख से रहो' यह यदि आपकी आज्ञा है तो मेरा सुख आप ही के साथ जाने के लिए तत्पर है । 'मार्ग का कष्ट महान् है' यह कहें तो आपके विरह की अग्नि ही मेरे लिए असह्य है । 'स्त्रियों की रक्षा करो' यह कहें तो आपके ही खड्ग् में वह श्री निवास करती है जिससे उनकी रक्षा हो । 'पीछे कुछ नहीं' यह कहें तो आप का प्रताप पीछे-पीछे है ही । 'राजसमूह नायकहीन है' यह कहें तो आर्य के गुणों से ही वह अपने अधीन बना रहेगा । 'वीरों का सहायक कोई बाहरी नहीं होता' यदि यह कहें तो आप मुझे अलग समझ रहे हैं। 'कुछ थोड़े से ही लोगों को साथ लेकर जा रहा हूँ' अगर यह बात है तो पैर की धूल का क्या बोझ है ? 'दो भाइयों का साथ जाना ठीक नहीं' तो मुझे ही जाने की आज्ञा देकर अनुगृहीत करें । 'भाई

३१८ हर्षचरितम् सहशो दोषः । का चेयमात्मंभरिता भुजस्य ते यदेकाकी क्षीरोदफेनपट- लपाण्डुरममृतमिव यशः पिपासति । अवञ्चितपूर्वोऽस्मि प्रसादेषु । तत्प्रसीदत्वार्यो नयतु मामपि' इत्यभिधाय क्षितितलविनिहितमौलिः पादयोरपतत् । तमुत्थाप्य पुनरग्रजो जगाद—'तात ! किमेवमतिमहारम्भपरिग्रहेण गरिमाणमारोप्यते बलादतिलघीयानप्यहितः । हरिणार्थमतिहेपणः सिंह- संभारः । तृणानामुपरि कति कवचयन्त्याशुशुक्षणयः । अपि च तवाष्टा- दशद्वीपराष्ट्रमङ्गलकमालिनी मेदिन्यस्त्येव विक्रमस्य विषयः । नहि कुल- शैलनिवहवाहिनो वायवः संनह्यन्त्यतितरले तूलराशौ । न सुमेरुवप्रप्रणय- प्रगल्भा वा दिक्करिणः परिणमन्त्यणीयसि वल्मीके । ग्रहीष्यसि सकल- पृथ्वीपतिप्रलयोत्पातमहाधूमकेतुं मांधातेव चारुचामीकरपङ्कपत्रलतालं- काराङ्ककायं कार्मुकं ककुभां विजये । मम तु दुर्निवारायामस्यां विपक्ष- क्षपणक्षुधि क्षुभितायां क्षम्यतामयमेकाकिनः कोपकवल एकः । तिष्ठतु अतिहेपणोऽत्यन्तलज्जाकारी । कवचयन्ति संनह्यन्ति । आशुशुक्षणयोऽग्नयः । अष्टमङ्गलं कङ्कणमित्यन्ये । तूलं कार्पासः । परिणमन्ति तटाघातक्रीडां न कुर्वन्ति । का स्नेह भय उत्पन्न कर रहा है' यह तो हम दोनों के लिए बराबर है। आपके भुजदण्ड की यह कौन सी स्वार्थपरता है जो अकेले ही क्षीरसमुद्र के फेनपटल के समान उज्ज्वल अमृत रूप यश को पी जाना चाहता है। पहले कभी भी आपने अपने प्रसाद से मुझे वञ्चित नहीं किया। अतः आर्य प्रसन्न हों और मुझे भी साथ ले चलें।' यह कहकर पृथिवी पर सिर टेकते हुए उनके चरणों पर गिर गए । बड़े भाई ने उनको उठाकर फिर कहा—'तात, इस प्रकार बहुत बड़ी तैयारी करके बल की दृष्टि से अत्यन्त हीन उस शत्रु को बड़ाई क्यों दे रहे हो ? हिरन मारने के लिए शेरों का झुण्ड ले जाना लज्जास्पद है। तिनकों को जलाने के लिए कितनी अग्नियों कवच धारण करेंगी। और फिर, तुम्हारे पराक्रम के लिए अठारह द्विपों की अष्टमङ्गलक माला पहनने वाली पृथिवी उपयुक्त विषय है। कुलपर्वतों को उड़ा ले जाने वाले मारुत थोड़ी सी रूई की ढेर में कमर नहीं कसते । सुमेरु से टक्कर लेने वाले दिग्गज कभी बाम्बी से नहीं भिड़ते । मान्धाता के समान दिशाओं की विजय में समस्त राजाओं के विनाश के लिये उत्पात की सम्भावना करने वाला धूमकेतु रूप और सुवर्ण की पत्रलताओं से रचित धनुष अपने हाथ से पकड़ोगे । शत्रु के विनाश को तड़फड़ा देने वाले अकेले मेरी दुर्निवार

षष्ठ उच्छ्वासः ३१६ भवान्।' इत्यभिधाय च तस्मिन्नेव वासरे निर्जगामाभ्यमित्रम् । अथ तथागते भ्रातरि, उपरते च पितरि, प्रोषितजीविते च जामातरि, मृतायां च मातरि, संयतायां च स्वसरि, स्वयूथभ्रष्ट इव वन्यः करी देवो हर्षः कथं कथमप्येकाकी कालं तमनेषीत् । अतिक्रान्तेषु बहुषु वासरेषु कदाचित्तयैव भ्रातृगमनदुःखासिकाया दत्तप्रजागरस्त्रिभागशेषायां त्रिया- मायां यामिकेन गीयमानामिमामार्यां शुश्राव— द्वीपोपगीतगुणमपि समुपार्जितरत्नराशिसारमपि । पोतं पवन इव विधिः पुरुषमकाण्डे निपातयति ॥ ३ ॥ तां च श्रुत्वा सुतरामनित्यताभावनया दूयमानहृदयः प्रक्षीणभूयिष्ठायां क्षपायां क्षणमिव निद्रामलभत । स्वप्ने चाभ्रंलिहं लोहस्तम्भं भज्यमान- मपश्यत् । उत्कम्पमानहृदयश्च पुनः प्रत्यबुध्यत । अचिन्तयच्च—'किं नु खलु मामेवममी सततमनुबध्नन्ति दुःस्वप्नाः । स्फुरति च दिवानिश- अणीयस्यतिस्वल्पे । वल्मीके पिपीलिकोत्खाते मृत्स्थले । अभ्यमित्रं शत्रुसंमुखम् । यामिकेन जागरणियुक्तेन । रत्नराशीर्मणिसमूहः, अधिध्यक्ष । तस्य साराः श्रेष्ठरत्नानि । पोतं यानपात्रम् । निपातयति व्यापादयति । अत्युन्नतमभ्रंलिहं इस भूल में क्रोध के केवल एक ग्रास के लिए क्षमा करो, रुक जाओ ।' यह कहकर राज्यवर्धन उसी दिन शत्रु की ओर निकल पड़े । इस प्रकार भाई चले गये, पिताजी की मृत्यु हो गई, बहनोई ग्रहवर्मा भी न बच रहे, माता मृत्यु को प्राप्त हुई, बहन कैद में पड़ गई तो देव हर्ष ने अपने यूथ से भटके हुए बनैले गज की भाँति किसी किसी प्रकार वह समय व्यतीत किया । बहुत दिनों के बाद किसी समय भाई के चले जाने के दुःख की चिन्ता में मग्न होकर जगे-जगे उन्होंने रात के तीसरे पहर में पहरुवे द्वारा गाई हुई इस आर्या को सुना— 'सारे द्वीपों में जिसके गुणों की प्रशंसा होतो है, रत्नसमूह का जो उपार्जन कर लेता है ऐसे पुरुष को विधि असमय में उस प्रकार पटक देता है जैसे वायु जहाज को ।' यह सुनकर उनका हृदय अनित्यता की भावना से दुखी होने लगा । अभी रात कुछ बच रही थी कि क्षण भर उन्हें नींद आ गई । स्वप्न में बहुत लम्बे एक लौहस्तम्भ को टूटते हुए देखा । उनका हृदय काँपने लगा और फिर नींद टूट गई—'क्यों ये दुःस्वप्न हमेशा मेरे ही पीछे लगे हैं ! अशुभ की सूचना देने वाली मेरी बायीं आँख दिन-रात फरकती रहती है । किसी बड़े राजा के नाश को सूचित करने वाले ये दारुण उत्पात

३२० हर्षचरितम्

मकल्याणाख्यानविचक्षणमदक्षिणमक्षि। सुदारुणाश्चाक्षुद्रक्षितिपक्षयमाच- क्षाणाः क्षणमपि न शाम्यन्ति पुनरुत्पाताः। प्रत्यहं राहुरविकलकायबन्ध इव कबन्धवति ब्रध्नबिम्बे घटमानो विभाव्यते। तपःकरणकालकवलि- तानिव धूसरितसमग्रग्रहानुद्विरन्ति धूमोद्गारान्सप्तर्षयः। दिने दिने दारुणा दिशां दाहा दृश्यन्ते। दिग्दाहभस्मकणनिकर इव निपतति नभस्तलात्तारागणः। तारापातशुचेव निष्प्रभः शशी। निशि निशि इतस्ततः प्रज्वलिताभिरुल्काभिरुग्रं ग्रहयुद्धमिव वियति विलोकयन्ति विलोलतारकाः ककुभः। राज्यसंचारसूचकः संचारयतीव क्ष्मां क्वापि वहद्बहलरजःपटलकलिलशर्कराशकलसूत्कारी मारुतः। न कुशलमिव पश्यामि लग्नस्य। अस्मिन्नसमद्वंशे करीण इव करीरं कोमलमपि कलयतः कृतान्तस्य कः परिपन्थी ? सर्वथा स्वस्ति भवत्वार्याय।' इति चिन्त- यित्वा च अन्तर्भिन्नं भ्रातृस्नेहकातरं द्रवदिव हृदयं कथं कथमपि संस्त- भ्योत्थाय यथाक्रियमाणं क्रियाकलापमकरोत्।


नभःस्पृशम्। अक्षुद्रः प्रधानभूतः। राहोरविकलकायबन्धनं कबन्धयोगात्। कव- न्धदर्शनं चोत्पातसूचकम्। विलोलतारका इति। स्त्रीणां च, युद्धदर्शनवशादक्ष्णोश्च लोलत्वं भवति। कलिलानि व्याप्तानि। वंशो वेणुरपि। करीरो वंशाङ्कुरः। अपिशब्दः कृतान्तस्येत्यतः परं योज्यः। परिपन्थी रोधकः। परिपूर्व्यपर्यायः परि- पन्थशब्दोऽस्तीति ज्ञापितम्।


अब भी शान्त नहीं हो रहे हैं। प्रतिदिन सूर्य में कबन्ध दिखाई पड़ता है। सशरीर के समान होकर राहु सूर्य पर झपटता हुआ लगता है। सप्तर्षि तारे तपस्या करने के अवसर में किए धूम्रपान को अब मुँह से उगलते हैं जिससे आकाश के समस्त तारे धुँधले लग रहे हैं। प्रतिदिन दारुण दिग्दाह दिखाई पड़ते हैं। दिग्दाहों के भस्मकण के रूप में तारे आकाश से गिरते नजर आते हैं। तारों के गिरने के मानों शोक से चन्द्रमा निष्प्रभ लगता है। प्रत्येक रात में उग्र रूप में इधर-उधर उल्कायें जलती रहती हैं, चञ्चल तारों वाली दिशाएँ आकाश में मानों ग्रहयुद्ध देखा करती हैं। धूल और आँकड़-पाथर से भरा हुआ, साँय-साँय की ध्वनि से युक्त एवं राज्य के विलयन की सूचना देने वाला पवन पृथिवी को मानों कहीं उड़ाकर ले जाने की कोशिश करता है। शुभ लग्न को भी उपस्थित नहीं देखता हूँ। हाथी के लिये जैसे कोमल बाँस का कौपल होता है उसी प्रकार हमारे इस वंश में यमराज का अब कौन शत्रु है। सब प्रकार से आर्य का कल्याण हो।' यह सोच