हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ हर्षचरितम् ध्यमानं बबन्ध बन्धाविव विबुद्धबन्धूकभासि भास्वति सास्त्रां दृशं चक्र- वाकचक्रवालम् । संचरन्त्याः समधुकररवं कैरवाकरं कलहंसरमणीरमणीयं माणिक्यकाञ्चीकिङ्किणीजालमिवाचकाण श्रियः । प्रकटकलङ्कमुदयमानं विशङ्कटविषाणोत्कीर्णपङ्कसंकरशंकरबर्कुरशकरककुदकूटसंकाशमकाशताका- शे शशाङ्कमण्डलम् । अस्यां च वेलायामनतिक्रमणीयवचनैरुपसृत्य प्रधानसामन्तैर्विज्ञाप्य- मानः कथं कथमप्यभुक्त । प्रभातायां च शर्वर्यां सर्वेषु प्रविष्टेषु राजसु समीपस्थितं हर्षदेवमुवाच—'तात ! भूमिरसि गुरुनियोगानाम् । शैशव एवाग्राहि गुणवत्पताकेव भवता तातस्य चित्तवृत्तिः । यतो भवन्तमेवं- विधं विधेयं विधिविधानोपनतनैर्घृण्यमिदं किमपि विभणिषति मे हृदयम् । नावलम्बनीया बालभावसुलभा प्रेमविलोमा वामता। वैधेय इव मा कृथाः 'कादम्बः कलहंसः स्यात्' । आचकाण चुकूज । कैरवाकरं संचरन्त्याः श्रियः किङ्कि- णीजालमिव चुकूजेत्युत्प्रेक्षा । विशङ्कटो विशालः । बर्कुरस्तरुणः । शकरो दान्तः । भानुं प्रवृत्ता प्रभाता तस्याम् । नियोग आदेशः । विधेयमायत्तम् । विभणिषति कथयितुमिच्छति । विलोमाऽननुकूला । वामता प्रतिकूलता । वैधेयो मूर्खः । गए शरीर वाले, निकलते हुए रुधिर और मांस से लाल, मंजीठे के समान वर्ण वाले सूर्य पश्चिम के जल में डूबने लगे । कमल के सरोवर में भौंरे बंद होनी हुई कमलिनी के कोश में विकल होकर आवाज करने लगे । निकट में होने वाले विरहरूपी व्याधि से पीड़ित अपनी पत्नियों को देख कर दुखी चक्रवाक पक्षियों ने विकसित बन्धूक के समान लाल वर्ण वाले बन्धु की भाँति सूर्य में अपनी डबडबाई आँखें लगा दीं । भौरों की गुंजार और कलहंसियों की आवाज से भरा हुआ कुमुद का सरोवर ऐसा लग रहा था मानों वहाँ संचरण करती हुई लक्ष्मी की माणिक्यकांची में गुथी हुई किंकिणियाँ बज रही हों । आकाश में स्पष्ट कलंक वाला चन्द्रमण्डल कठोर सींग से उछाली हुई मिट्टी से सने हुए शिवजी के तगड़े वृषभ की पीठ पर के ककुद ( टाट ) की भाँति उदित होने लगा । इसी अवसर पर प्रधान सामन्तों ने जिनकी बात टाली नहीं जाती थी, पहुँच कर बड़ा समझाया-बुझाया तो राज्यवर्धन ने किसी किसी प्रकार भोजन किया । रात बीती तो सब राजा लोग जुट आए और तब उन्होंने समीप में बैठे हुए देव हर्ष से कहा—'तात, भारी आदेशों के तुम योग्य हो । शैशवकाल में गुणवान् जनों की पताका के समान तात की चित्तवृत्ति को तुमने प्रभावित कर लिया था। इसीलिए इस प्रकार के आयत्त रहने वाले तुम से दैव की इच्छा से प्राप्त वैराग्य वाला मेरा यह हृदय कुछ कहना चाहता है।