हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ उच्छ्वासः ३०७ प्रत्यूहमीहितेऽस्मिन् । शृणु न खलु न जानासि लोकवृत्तम् । लोकत्रय- त्रातरि मांधातरि मृते किं न कृतं पुरुकुत्सेन ? भ्रूलतादिष्टाष्टादशद्वीपे दिलीपे वा रघुणा । महासुरसमरमध्थाध्यासितत्रिदशरथे दशरथे वा रामेण । गोष्पदीकृतचतुरुदन्वदन्ते दुष्यन्ते वा भरतेन । तिष्ठन्तु तावत्ते तातेनैव शतसमधिकाधिगताध्वरधूमबिसरधूसरितवासववयसि सुगृहीतनाम्नि तत्रभवति परासुतां गते पितरि किं नाकारि राज्यम् ? यं च किल शोकः समभिभवति तं कापुरुषमाचक्षते शास्त्रविदः । स्त्रियो हि विषयः शुचाम् । तथापि किं करोमि । स्वभावस्य सेयं कापुरुषता वा स्त्रैणं वा यदेवमास्पदं पितृशोकहुतभुजो जातोऽस्मि । मम हि भूभृति पर्यस्ते निरवशेषतः प्रस्स्र- वणानीव स्रुतान्यश्रूण्यस्तमिते महति तेजस्यन्धकारीभूतदशाशस्य प्रनष्टः प्रज्ञालोकः, प्रज्वलितं हृदयम् , आत्मदाहभीत इव स्वप्नेऽपि नोपसर्पति विवेकः, बलीयसा संतापेन जातुषमिव विलीनमखिलं धैर्यम , पदे पदे धूमेन मलिनीक्रियते । स्त्रैणे स्त्रीत्वे । परासुता मरणम् । मम हेत्यादिवाक्यद्वये श्लेषो व्याख्येयः । प्रस्स्रवणानि निर्झराः । जतुनो विकारो जातुषम् । 'त्रपुजतुनोः षुक्' । बालभाव में सुलभ होने वाली प्रतिकूलता का अवलम्बन न करना । मेरी इस चाह में विचारमूढ़ के समान विघ्न न उत्पन्न करना । सुनो, क्या लोकव्यवहार नहीं जानते ? त्रिभुवन की रक्षा करने वाले मान्धाता के मरने पर पुरुकुत्स ने क्या नहीं किया? या भ्रूभङ्ग के द्वारा अट्ठारह द्वीपों को आदेश देने वाले दिलीप के बाद रघु ने क्या नहीं किया ? या दैत्यों के साथ युद्ध के बीच देवरथ को स्थापित करने वाले राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात् राम ने क्या नहीं किया ? चारों समुद्रों के छोर को गोष्पद बनानेवाले दुष्यन्त के बाद भरत ने क्या नहीं किया ? उन लोगों की बात जाने दो, सैकड़ों यज्ञों के धूम से इन्द्र की आयु को धूसरित कर देनेवाले सुगृहीतनाम अपने पूज्य पिताजी की मृत्यु के बाद हमारे पिताजी ने क्या राज्य नहीं किया ? जिस व्यक्ति को शोक अभिभूत कर देता है उसे शास्त्रज्ञ लोग कायर कहते हैं। शोक स्त्रियों में उत्पन्न होता है । तब भी मैं क्या करूं ! मेरे स्वभाव की यह कायरता हो या मेरा स्त्रीभाव हो, मैं तात की शोकाग्नि में पड़ गया हूँ । राजा के अस्त होने पर मेरे आँसू झरने के समान झरते रहे । महान् तेज के अस्त हो जाने पर मेरे लिए दिशाओं में अंधेरा छा गया और मेरा प्रज्ञालोक जाता रहा । मेरा हृदय जल गया । मेरा विवेक अपने भी जल जाने के भय से मानों स्वप्न में भी पास नहीं आता । प्रबल संताप के कारण मेरा सारा धैर्य लाह की भांति गल गया । मेरी मति पदे-पदे विषैले बाण से हती हुई हरिणी के समान मूर्च्छित