हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ हर्षचरितम् दिग्धरोपहतेव हरिणी मुह्यति मतिः, पुरुषद्वेषिणीव दूरत एव भ्रमति परिहरन्ती स्मृतिः, अम्बेव तातेनैव सह गता धृतिः, वार्धुषिकप्रयुक्तानीव धनानीव प्रतिदिवसं वर्धन्ते दुःखानि, शोकानलधूमसंभारसंभूताम्भोघर- भरितमिव वर्षति नयनवारिधाराविसरं शरीरम्। सर्वः पञ्चजनः पञ्चत्व- मुपगतः प्रयाति। वितथमेतद्वदति बालो लोकः। तातो हुताशनतामेव केवलामापन्नोऽपि नैवं दहति माम्। अन्तस्तदेवमिदमसांपरायिकमिव हृदयमवष्टभ्य व्युत्थितः शोको दुर्निवारो वाडव इव वारिराशिम्, पविरिव पर्वतम्, क्षय इव क्षपाकरम्, राहुरिव रविम्, दहति दारयति तनूकरोति कवलयति च माम्। कामं न शक्नोति मे हृदयं तादृशस्य सुमेरुकल्पस्य कल्पमहापुरुषस्य विनिपातमश्रुबिन्दुभिरेव केवलैरतिवाहयितुम्। राज्ये पदे शब्दे, क्रमे च। दिग्धो विप्रलिप्तः शरः। उक्तं च—‘बाणे विषाक्ते दिग्धलिसकौ’ इति। मेरुर्महीधरवद्रोपशब्दः प्रशंसार्थः। वृद्ध्या जीवति वार्धुषिकः वणिक्। वृद्वेर्वृधुषीभावः। पञ्चजनः पञ्चमहाभूतानि, मनुष्यश्च। उक्तं च—‘स्युः पुमांसः पञ्चजनाः पुरुषाः पूरुषा नराः’ इति। पञ्चत्वं मरणम्। वितथमिति। पञ्चसु पृथिव्या- दिषु लयात्पुरुषस्ताद्रूप्यं प्रतिपद्यत इत्यलीकम्। यतस्तत इत्याद्यग्रिमाञप्रतिबद्ध- कार्यदर्शनादित्यर्थः। आपत्कष्टम्। क्लेश इत्यर्थः। संपरायः सङ्ग्रामः। तस्मै यन्न भवति तदसांपरायिकम्। सभयं यः किल भीतः स कथं व्युत्थितं निवारयेत्। वाडव इत्यादयो दहतीत्यादिभिर्यथाक्रमं योज्याः। पविर्वज्रः। कल्पतेऽस्मादभीष्टार्थ हो रही है। मेरी स्मृति मुझे छोड़ कर दूर ही दूर चक्कर मार रही है मानो पुरुष से उसका द्वेष हो। अम्बा के समान मेरी धृति पिता के साथ ही चली गई। बनिया के धन के समान मेरे दुःख बढ़ते ही जा रहे हैं। शोक की अग्नि का धूमसम्भार मेघ के रूप में शरीर में भर गया है और आंखों से जलधारा बरस रही है। सारे महाभूत अपने-अपने भाग में मिलते जारहे हैं। यह बालप्रकृति के लोग मिथ्या बोलते हैं। तात केवल अग्नि में मिल कर ही मुझे नहीं जला रहे हैं। भीतर ही भीतर लड़ने में असमर्थ के समान मेरे हृदय को दबा कर उठा हुआ दुर्निवार शोक उस प्रकार जला रहा है जैसे वडवानल समुद्र को, उस प्रकार विदीर्ण कर रहा है जैसे वज्र पर्वत को, उस प्रकार कृश कर रहा है जैसे क्षय चन्द्रमा को, उस प्रकार निगल रहा है जैसे राहु सूर्य को। निश्चय ही सुमेरुसदृश उस प्रकार के युगपुरुष के विनाशजन्य शोक को मेरा हृदय केवल आँसू की बूँदों से कम नहीं कर सकता। चकोर के समान मेरी आँखें विष- तुल्य राज्य से विरक्त हो गईं। राज्यलक्ष्मी को उस प्रकार त्याग देने का मन करता है