भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 356

षष्ठ उच्छ्वासः ३०६ विष इव चकोरस्य मे विरक्तं चक्षुः । बहुमृतपटावगुण्ठनां रङ्गितरङ्गां जनंगमानामिव वंशबाह्यामनार्या श्रियं त्यक्तुमभिलषति मे मनः । क्षणमपि दग्धगृहे शकुनिरिव न पारयामि स्थातुम् । सोऽहमिच्छामि मनसि वाससीव सुलग्नं स्नेहमलमिदममलैः शिखरिशिखरप्रस्रवणैः स्वच्छस्रो- तोम्बुभिः प्रक्षालयितुमाश्रमपदे । यतस्त्वमन्तरितयौवनसुखामनभिमता- मपि जरामिव पुरुराज्ञया गुरोर्गृहाण मे राज्यचिन्ताम् । त्यक्तसकलवाल- क्रीडेन हरियेव दीयतामुरो लक्ष्म्यै । परित्यक्तं मया शस्त्रम् ।' इत्यभिधाय च खङ्गग्राहिणो हस्तादादाय निजं निस्त्रिंशमुत्ससर्ज धरण्याम् । अथ तच्छ्रुत्वा निशितशिखेन शूलेनेवाहतः प्रविदीर्णहृदयो देवो इति कल्पः । चकोरः क्रकचः । तस्य विषे दृष्टे अक्षिणी विरज्येते । मृतस्य पटः । अवगुण्ठनं मस्तकाच्छादनम् । रङ्गः समाजः । जनंगमश्चण्डालः । उक्तं च— 'चण्डालप्लवमातङ्गदिवाकीर्तिजनंगमाः । निषादश्वपचान्तेवासिचण्डालपुक्कसाः ॥' इति । वंशोऽभिजननं प्रबन्धो वेणुश्च । बाह्या बहिर्भूता, वहनीया च । शकुनिर्गृह- चटिका । गृहशारिकेत्यन्ये । स्नेहः प्रेम, तैलादिश्च । यतस्त्वमिति । पुरा ययातिः शुक्रदुहितरं देवयानीमवमन्य देवयान्या दासीभूतां शर्मिष्ठामसकृन्मिथ्याकामयानेन शुक्रेण जरां यास्यसीति शप्तः, प्राप्तजरादुःखो विषयलम्पटोऽन्यपुत्रैरगृहीतां जरां पुरौ स्वपुत्रे कृताभ्युपगमे संक्रामयांबभूवेति वार्ता । जराप्यन्तरितयौवनसुखा- ऽनभिमता च । गुरोर्ययातेरपि । मामन्तरेण मां विना, मय्यसंनिहित इत्यर्थः । जैसे बहुत से मरे लोगों के रंग-बिरंगे कफन के घूंघट से सजाई हुई, लोगों का मन बहलाने वाली, बाँस के ऊपर लगी हुई टेसू को पुतली को डोम लोग फेंक देते हैं । इस जले हुए घर में पक्षी के समान मैं क्षण भर भी नहीं रह सकता । आश्रम में रह कर मैं मन के वस्त्र में लगे हुए स्नेह जैसे इस मल को पर्वतों के शिखर से प्रवाहित होते हुए निर्मल झरनों के जल से धो देना चहता हूं। जैसे पुरु ने पिता की आज्ञा से यौवनसुख से रहित और अप्रिय वार्धक्य को स्वीकार किया उसी प्रकार तुम मेरी राज्यचिन्ता ग्रहण कर लो । कृष्ण के समान सारी बालकीड़ाओं को अब छोड़ कर दाबने के लिए लक्ष्मी को अपनी जाँघ दो। मैने शस्त्र का अब परित्याग ही कर दिया ।' यह कह कर उन्होंने दाहिने हाथ से उठाकर अपनी तलवार जमीन पर रख दी । यह सुनते ही चोखे शूल से आहत हुए की तरह देवहर्ष का हृदय विदीर्ण हो गया । उनके मन में अनेक प्रकार के विचारों का तूफान उठ खड़ा हुआ—'क्या मेरी अनुपस्थिति में डाह के कारण देख न पाने वाले किसी खल ने आर्य से मेरे प्रति कुछ कह दिया, जिससे कुपित हों । या इस प्रकार मेरी परीक्षा ले रहे हैं । या तात के शोक से उत्पन्न