हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० हर्षचरितम् हर्षः समचिन्तयत्—'किं नु खलु मामन्तरेणार्यः केनचिदसहिष्णुना किंचिद्ग्राहितः कुपितः स्यात् । उतानया दिशा परीक्षितुकामो माम् । उत तातशोकजन्मा चेतसः समाक्षेपोऽयमस्य । आहोस्विदार्य एवायं न भवति, किं वार्येणान्यदेवाभिहितमन्यदेवाश्रावि मया शोकशून्येन श्रवणेन्द्रियेण । आर्यस्य चान्यद्विवक्षितमन्यदेवापतितं मुखेन । अथवा सकलवंशविनाशाय निपातनोपायोऽयं विधेः । मम वा निखिलपुण्यपरिक्ष- योपक्षेपः । कर्मणामनुकूलसमग्रग्रहचक्रवालविलसितं वा । अथवा तातविनाशनिःशङ्ककलिकालक्रीडितं येनायं यः कश्चिदिव यत्किंचनकारिणं मामपुष्यभूतिवंशसंभूतमिव, अताततनयमिव, अनात्मानुजमिव, अभक्त- मिव, अदृष्टदोषमपि श्रोत्रियमिव सुरापाने, सद्भूत्यमिव स्वामिद्रोहे, सज्जनमिव नीचोपसर्पणे, सुकलत्रमिव व्यभिचारे, अतिदुष्करे कर्मणि समादिष्टवान् । तदेतत्तावदनुरूपं यच्छौर्योन्मादमदिरोन्मत्तसमस्तसाम- न्तमण्डलसमुद्रमथनमंदरे तादृशि पितरि मृते तपोवनं वा गम्यते वल्कलानि वा गृह्यन्ते तपांसि वा सेव्यन्ते । या तु मयि राजाज्ञा सा श्रोत्रियो वेदपारगः । धन्वनि मरौ । धन्वन्यपि दग्धे राजाज्ञापि दाहकारिणी । यह इनके चित्त की व्याकुलता है । या आर्य यह नहीं हो सकते, क्या यही बात है कि आर्य ने कुछ दूसरा ही कहा और शोक के कारण शब्दग्रहण की क्षमता से रहित कर्णेन्द्रिय से रहित मैंने कुछ दूसरा ही सुना । आर्य ने कुछ दूसरी बात कहना चाहा और मुँह से कुछ दूसरी बात निकल गई । अथवा विधिने सारे वंश के विनाश के लिए ध्वंस का उपाय रचा है । या मेरे सारे पुण्यों के क्षीण हो जाने का यह प्रसंग है ? या प्रतिकूल होकर एकत्र हुए सारे ग्रहों के ये काम हैं । या तात के अब न रहने से कलिकाल निःशंक होकर क्रीड़ा कर रहा है जिससे किसी किसी के समान आर्य ने स्वेच्छा से आचरण करने वाले मुझे अत्यन्त दुष्कर कार्य करने के लिए उस प्रकार आदेश दिया है जैसे मैं पुष्यभूति के वंश में उत्पन्न ही नहीं, तात का पुत्र ही नहीं, अपना भाई ही नहीं, या सेवक ही नहीं । बिना किसी दोष के ही श्रोत्रिय के समान सुरापान में, सद्भूत्य के समान स्वामिद्रोह में, सज्जन के समान नीच के पास जाने में, कुलकलत्र के समान व्यभिचार में जैसे मुझे लगा दिया है । यह तो अच्छा ही है जो शौर्य के उन्माद की मदिरा से उन्मत्त समस्त सामन्तमण्डल का मंदर के समान मंथन करने वाले तात की मृत्यु के बाद तपोवन में रहा जाय, या वल्कल धारण किया जाय, या तपस्या की जाय ।