भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 358

षष्ठ उच्छ्वासः ३११ दग्धेऽपि दाहकारिणी मय्यवप्रहग्लपिते धन्वनीवाङ्गारवृष्टिः । तदसद्दश- मिदमार्यस्य । यद्यपि च विभुरनभिमानः, द्विजातिरनेषणः, मुनिररोषणः, कपिरचपलः कविरमत्सरः, वणिगतस्करः, प्रियजानिरकुहनः, साधुर- दरिद्रः, द्रविणवानखलः, कीनाशोऽनक्षितगतः, मृगयुरहिंस्रः, पाराशरी ब्राह्मण्यः, सेवकः सुखी, कितवः कृतज्ञः, परिव्राडबुभुक्षुः, नृशंसः प्रिय- वाक्, अमात्यः सत्यवादी, राजसूनुरदुर्विनीतश्च जगति दुर्लभः, तथापि ममार्य एवाचार्यः । को हि नाम तद्विधे निपतिते राजगन्धकुञ्जरे जनयि- तरि चेदृशे विफलीकृतविशालशिलास्तम्भोरुभुजे भूपुजि भ्रातरि त्यक्त- राज्ये ज्यायसि नववयसि तपोवनं गच्छति सकललोकलोचनजलपाता- पवित्रं मृद्रोलकं वसुधाभिधानं धनमदखेलनिखिलखलमुखविकारलक्षणा- ख्यायमाननीचाचरणां श्रीसंज्ञिकां सुभटकुटुम्बकर्मकुम्भदासीं चण्डालोऽपि अनेषणो निरभिलाषः । प्रिया जाया यस्य । 'जायाया निङ्' । कुहना ईर्ष्या, शङ्का वा । कीनाशः क्षुद्रः । उक्तं च—'कृतान्ते पुंसि कीनाशः क्षुद्रकार्षिकयोस्त्रिषु' । अ- नक्षितगतः प्रियः । मृगयुर्व्याधः । पाराशरी भिक्षुः । कितवो द्यूतकृत् । गोप्यो दासः । जो राज्य करने की मुझ पर आज्ञा है वह अनावृष्टिसे सूखा पड़े हुए मरु के समान स्वयं दग्ध और विघ्नों से क्षीण मुझ पर दाह करने वाली अङ्गार की वर्षा है। तो यह कथन आर्य के सदृश न था। यद्यपि जिसमें अभिमान न हो ऐसा अधिकारी, जिसमें एषणा न हो ऐसा द्विजाति, जिसमें रोष न हो ऐसा मुनि, जिसमें चपलता न हो ऐसा कपि, जिसमें मत्सर न हो ऐसा कवि, जो बेईमानी न करे ऐसा वणिक्, जो छलिया न हो ऐसा प्रिय, जो दरिद्र न हो ऐसा सज्जन, जो खल न हो ऐसा धनी, जो द्वेष न करता हो ऐसा क्षुद्र, जो हिंसा न करता हो ऐसा शिकारी, जो ब्राह्मणद्वेषी न हो ऐसा पाराशरी भिक्षु, जो सेवक हो ऐसा सुखी, जो धूर्त हो ऐसा कृतज्ञ, जो भीख मांगता न हो ऐसा परिव्राट्, जो प्रिय बोलता हो ऐसा क्रूर, जो सत्यवादी हो ऐसा कूटनीतिज्ञ मंत्री, और जो दुर्विनीत न हो ऐसा राजपुत्र संसार में दुर्लभ है। मेरे उपदेशक आचार्य तो आर्य ही हैं। कौन ऐसा है जो उन गन्धहस्ती के समान महाराज पिता श्री के चले जाने पर और शिलास्तम्भ के समान विशाल भुज को विफल करके राज्य छोड़ कर बड़े भाई के तपोवन चले जाते समय लोगों के आँसू से अपवित्र पृथिवी नामक मिट्टी के गोले को एवं धनमद की क्रीड़ा में निखिल दुष्टजनों के मुख को विकृत कर देने से विख्यात नीच आचरण वाली लक्ष्मीसंज्ञक सुभटों के काम करने वाली कुम्भदासी (पनभरिन) की चाण्डाल होकर