भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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कामयेत । कथमिव संभावितमत्यन्तमनुचितमिदमार्येण । किमुपलक्षित- मनवदातमिदं मयि । किं वास्य चेतसश्च्युतः सौमित्रिर्विस्मृता वा वृकोदरप्रभृतयः । अनपेक्षितभक्तजना स्वार्थैकनिष्पादननिष्ठा नासीदि- यमार्यस्येदृशी प्रभाविष्णुता । अपि चार्ये तपोवनं गते जिजीविषुः को मनसापि महीं ध्यायेत् । कुलिशशिखरखरनखरप्रचयप्रचण्डचपेटापाटित- मत्तमातङ्गोत्तमाङ्गमदच्छटाच्छुरितचारुकेसरभारभास्वरमुखे केसरिणि वनविहाराय विनिर्गते निवासं गिरिगुहां कः पाति पृष्ठतः । प्रतापसहाया हि सत्त्ववन्तः । कश्चपलां राजलक्ष्मीं प्रत्यनुरोधोऽयमार्यस्य यदियमपि न चीवरान्तरितकुचा कुशकुसुमसमित्पलाशपूलिकां वहन्ती तत्रैव तपोवने वनमृगीव नीयते जराजालिनी । किंवा ममानेन वृथा बहुधा विकल्पितेन तूष्णीमेवार्यमनुगमिष्यामि । गुरुवचनातिक्रमकृतं च किल्विषमेतत्तपोवने तप एवापास्यति ।' इत्यवधार्य मनसा प्रथमतनं गतस्तपोवनमधोमुख- स्तूष्णीमवातिष्ठत् । राजसूनुर्दुर्विनीतश्चेत्येतत्प्रस्तावेन तदुक्तम् । खेलाः सविलासाः । अनवदातं निर्म- लम् । सौमित्रिर्लक्ष्मणः । वृकोदरो भीमसेनः । प्रचयः समूहः । चपेटा करतला- घातः । वनमृग्यपि कुशादि वहति । जालिनी मायिनी । कामना करे ? कैसे इस अत्यन्त अनुचित विचार को आर्य ने स्वीकार कर लिया ? क्या उनके मन में लक्ष्मण नहीं रहे, या भीम आदि छोटे भाई विस्मृत हो गए ? अपने भक्तजनों की परवाह न करने वाली, अपने ही स्वार्थ के निष्पादन करने में निष्ठुर आर्य की यह प्रभुता पहले न थी । अगर आर्य तपोवन में चले जाते हैं तब जीने की इच्छा रखने वाला कौन मन से भी पृथिवी की चिन्ता रखे ! वज्र के समान अपने नखों के प्रचण्ड चाँटे से मतवाले हाथी के मस्तक को विदीर्ण कर देने से उत्पन्न मदधारा से भींग हुए केसर के कारण भास्वर मुख वाले सिंह के वन-विहार के लिए निकल जाने पर पीछे कौन उसके निवासस्थान कन्दरा की रक्षा करे ? महानुभाव लोग प्रताप की सहायता लेते हैं । चंचल स्वभाव वाली राजलक्ष्मी के प्रति आर्य का कैसा यह आग्रह है कि चीवर से ढंके स्तनों वाली और कुश, कुसुम, समिधा एवं पलाश की पूली ढोने वाली वन- मृगी के समान अति जर्जर इसे वहीं तपोवन में साथ नहीं ले जाते ? इस तरह के मेरे बहुत संकल्प-विकल्प से क्या मतलब ? मैं तो चुपचाप आर्य के पीछे चल दूँगा । गुरु- वचनों के पालन न करने से उत्पन्न पाप को तपोवन में तप ही दूर करेगा ।' ऐसा निश्चय करके मन से तपोवन में पहले ही पहुँचे हुए हर्ष मुँह नीचा किए चुपचाप बैठे रहे ।