भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 360

षष्ठ उच्छ्वासः ३१३ अत्रान्तरे पूर्वादिष्टेनेव रुदता वस्त्रकर्मान्तिकेन समुपस्थापितेषु वल्क- लेषु, निर्दयकरतलताडनभियेव कापि गते हृदये, रटति राजस्त्रैणे, तारम- ब्रह्मह्ययमूर्ध्वदोषिण विरुदति विप्रजने, पादप्रणतिपरे फूत्कुर्वति पौरवृन्दे, विद्राति विद्रुतचेतसि चिरंतने परिजने, परिजनाव लम्बिते, गते वर्षीयसि, वेपमानवपुषि, पर्याकुलवाससि, शोकगद्गदवचसि, विगलितनयनपयसि, निवारणोद्यतमनसि, विशति बन्धुवर्गे, निराशेषु नखलिखितमणिकुट्टि- मेष्ववाङ्मुखेषु निःश्वसत्सु सामन्तेषु, सबालवृद्धासु तपोवनाय प्रस्थितासु सर्वासु प्रजासु सहसैव प्रविश्य शोकविक्लवः प्रक्षरन्नयनसलिलो राज्यश्रियः परिचारकः संवादको नाम प्रज्ञाततमो विमुक्ताक्रन्दः सदस्या- त्मानमपातयत् । अथ संभ्रान्तो भ्रात्रा सह स्वयं देवो राज्यवर्धनस्तं पर्यपृच्छत्—'भद्र ! भण भग किमस्मद्व्यसनव्यवसायवर्धनबद्धधृतिः, अवनिपतिमरणमुदित- अत्रेत्यादौ । संवादको नाम सदस्यात्मानमपातयदि ति संबन्धः । कर्मान्तिको- ऽधिकृतः । करतलताडनेति । करतलताडनं हृदये वा । स्त्रैणे स्त्रीसमूहे । 'अब्रह्मण्यम- वध्योक्तौ ।' फूत्करणमुद्दामरोदध्वनिः । विद्रातिः कुत्सितः । गते प्राप्ते । वर्षीयसि वृद्धतरे । इसी बीच पहले ही संहजे हुए वस्त्रकर्मान्तिक ( सरकारी तोशेखाने का अधिकारी ) ने रोते हुए वल्कल हाजिर किया । हृदय मानों हाथों के निर्दय ताड़न के डर से कहीं चला गया । महल की स्त्रियाँ चिल्लाने लगीं । ब्राह्मण लोग हाथ उठा कर जोर से 'हमारा त्याग न करो' इस प्रकार पुकारने लगे । नागरिक लोग पैर पर बार-बार गिर-गिर कर घिघियाने लगे । पुराने सेवक विचलित मन से दौड़ पड़े । बड़े-बूढ़े बाँधव लोगों ने भीतर प्रवेश किया, उन्हें परिजनों ने सम्हाल रखा था, उनके शरीर कांप रहे थे, वस्त्र भी इधर-उधर गिर रहा था, शोक से उनकी वाणी गद्गद थी, नेत्रों से आँसू ढल रहे थे, राज्य- वर्धन को रोकने के लिए उनके मन में व्यग्रता थी । सामन्त लोग निराश होकर मुँह नीचा किए नख से मणिकुट्टिम पर कुछ लिख रहे थे और आह भर रहे थे । लड़के से बूढ़े तक सारी प्रजा तपोवन में जाने के लिए प्रस्थान करने लगी । उसी समय सहसा शोक से व्याकुल, नेत्र से आँसू ढालता हुआ राज्यश्री का संवादक नाम का अत्यन्त परिचित परिचारक रोता-पीटता सभा में आकर गिर पड़ा । तब भाई के साथ घबड़ा कर देव राज्यवर्धन ने उससे पूछा—'हमारे दुःख के व्यापार को बढ़ाने में निश्चल धैर्यवाला, राजा की मृत्यु से प्रसन्न विधि अधीर बना देने वाला