भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 361

३१४ हर्षचरितम् मतिः, अद्युतिकरमपरमधिकतरमितो दुःखातिशयं समुपनेति विधिः' इति । स कथं कथमप्यकथयत्—'देव ! पिशाचानामिव नीचात्मनां चरितानि छिद्रप्रहारीणि प्रायशो भवन्ति । यतो यस्मिन्नहन्यवनिपति- रुपरत इत्यभूद्वार्त्ता तस्मिन्नेव देवो ग्रहवर्मा दुरात्मना मालवराजेन जीव- लोकमात्मनः सुकृतेन सह त्याजितः । भर्तृदारिकापि राज्यश्रीः कालायस- निगडयुगलचुम्बितचरणा चोराङ्गनेव संयता कान्यकुब्जे कारायां निक्षिप्ता । किंवदन्ती च यथा किलाऽनायकं साधनं मत्वा जिघृक्षुः सुदुर्मतिरेतामपि भुवमाजिगमिषति । इति विज्ञापिते' प्रभुः प्रभवतीति । ततश्च तादृशमनुपेक्षणीयमसंभावितमाकस्मिकमुपरि व्यतिकरमाकर्ण्या- श्रुतपूर्वत्वात्परिभवस्य, परपरिभवासहिष्णुत्या च स्वभावस्य, दर्पबहुलत- या च नवयौवनस्य, वीरक्षेत्रसंभवाच्च जन्मनः, कृपाभूमिभूतायाश्च स्वसुः स्नेहात्स तादृशोऽपि बद्धमूलोऽप्यत्यन्तगुरुनेकपद एवास्य ननाश शोकावेगः । विवेश च सहसा केसरीव गिरिगुहागृहं गभीरहृदयं भयंकरः कोपावेगः । केशिनिषूदनशङ्काकुलकालियकुलभङ्गुरभ्रूभङ्गत रङ्गिणी श्यामायमाना यम- कारायां बन्धने । किंवदन्ती लोकवार्ता । केशिनिषूदनः कृष्णः । यमस्वसा यमुना । सापि कालियाकुला सतरङ्गा, इससे बढ़ कर भी क्या दुःखातिशय उपस्थित कर रहा है ?' उसने किसी प्रकार कहा— 'देव, नीच आत्मा वाले व्यक्ति पिशाचों की तरह छिद्र देख कर प्रहार करते हैं। इसी कारण जिस दिन 'महाराज शान्त हुए' यह समाचार फैला उसी दिन दुरात्मा मालवराज ने देव गृहवर्मा को अपने पुण्य के साथ जीवलोक से हटा दिया। भर्तृदारिका राज्यश्री को भी लोहे की बेड़ियों में जकड़ कर चोर स्त्री के समान कान्यकुब्ज के कारावास में डाल दिया है। यह खबर उड़ रही है कि सेना को नायकहीन जानकर वह दुर्बुद्धि आक्रमण करने के लिए इस ओर भी आना चाहता है। मेरे इस निवेदन में अब आप ही समर्थ हैं।' तब उस प्रकार के अपने ऊपर उपेक्षा न करने योग्य, जिसकी कोई सम्भावना न थी ऐसे आकस्मिक व्यसन को सुन कर अपना परिभव पहले पहल सुनने के कारण, दूसरे द्वारा किया गया अपना परिभव न सहन करने वाले स्वभाव के कारण, कृपा के पात्र बहन के स्नेह से राज्यवर्धन का बद्धमूल भी अत्यन्त गुरुभूत उस प्रकार का शोकावेग एक ही क्षण में नष्ट हो गया। जैसे सिंह पर्वत की कन्दरा में प्रवेश करता है उसी प्रकार उनके हृदय में भयंकर कोप का आवेग प्रविष्ट हुआ। कृष्ण के भय से व्याकुल कालियनाग