भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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षष्ठ उच्छ्वासः ३१५

स्वस्रेव प्रथीयसी ललाटपट्टे भीषणा भ्रुकुटिरुदभिद्यत । दर्पात्परामृशन्नख- किरणसलिलनिर्झरैः समरभारसंभावनामभिषेकमिव चकार दिक्नागकुम्भ- कूटविकटस्य बाहुशिखरकोशस्य वामः पाणिरुल्लवः । संगलत्स्वेदसलिल- पूरितोदरो निर्मूलं मालवोन्मूलनाय गृहीतकेश इव दुर्मदश्रीकचग्रहोत्क- ण्ठयेव च कम्पमानः पुनरपि समुत्ससर्प भीषणं कृपाणं पाणिरपरः शस्र- ग्रहणमुदितराजलक्ष्मीक्रियमाणदिष्टवृद्धिविधुतसिन्दूरधूलिरिव कपिलः कपो- लयोरदृश्यत रोषरागः । समाासन्नसकलमहीपालचूडामणिचक्राक्रमणजाता- हंकार इव च समारुरोह वाममूरुदण्डमुत्तानितश्चरणो दक्षिणः । निष्ठुरा-

श्यामायमाना च । परामृशन्नित्यर्थाद्बाहुशिखरमेव । कोशो दिव्यम् । उक्तं च— 'कोशोऽस्त्री कुड्‌मले खङ्गपिधानेऽर्थौघदिव्ययोः' इति कोशकारः । पाणिः सलिलपू- रितोदरो भवति । कचाः केशाः । यश्च कामी कामिनीकचग्रहणं प्रत्युत्कण्ठते स

के रूप में भङ्गुर अभ्रङ्ग रूपी तरङ्गों वाली श्यामवर्ण यमुना नदी के समान भीषण भ्रुकुटि उद्भिन्न हो गई । उनका बायाँ पाणिपल्लव दिग्गज के कुम्भ कूट के समान विकट स्कन्ध- देश के खड्ग कोश का स्पर्श करता हुआ युद्धभार के ग्रहण से पूर्व नखकिरणों की जल- धार से मानों अभिषेक करने लगा¹ । उसका दाहिना हाथ पसीने से भर गया और मालव के निर्मूल विनाश के लिए मानों दुर्मद श्री के बालों को पकड़ने की उत्कंठा से काँपता हुआ भीषण कृपाण की ओर बार-बार बढ़ने लगा । उनके कपोलों पर कपिल वर्ण का रोषराग इस प्रकार दिखाई पड़ने लगा मानों उसके शस्त्रग्रहण से प्रसन्न राज्यलक्ष्मी अपनी भाग्यवृद्धि मान कर सिन्दूर की धूल उड़ाने लगी हो । उसका दाहिना चरण पास में बैठे हुए समस्त राजाओं की चूड़ामणियों पर प्रतिबिम्ब के रूप में आक्रमण करने से

१. श्री अग्रवाल जी ने इस कूटश्लेष के तीन अर्थ किए हैं—(१) म्यान के पक्ष में- राज्यवर्धन का बायाँ हाथ दाहिनी ओर कमर में खोंसी हुई भुजाली की मूठ पर गया जो गजमस्तक के अलंकरण से सुशोभित थी । यों उस हाथ की नखकिरणों ने युद्ध का बोझा उठाने में समर्थ उस म्यानबंद भुजाली का मानों जलधाराओं से सम्मानपूर्ण अभिषेक किया । (२) दिव्यपरीक्षा के पक्ष में—गजमस्तक की तरह विकट मुट्ठा बँधा हुआ बायाँ हाथ दिव्यपरीक्षा के समय दाहिना मुट्ठा को अपनी नखकिरणों से मानों मरणपर्यन्त दंड की सम्भावना का अभिषेक करा रहा था । (३) अभिधर्मकोशग्रन्थ के पक्ष में—दिक्नाग के मस्तक की कूटकल्पनाओं से विकट बना हुआ जो वसुबन्धु का अभिधर्मकोश ग्रन्थ का भावनामय (विचारों के द्वारा) ऐसा ज्ञान कराता था जिससे शास्त्रार्थरूपी युद्धों के मचने से रसहीनता आ जाती थी । (पृ. १२१-१२३ हर्ष. सां. अ.)