भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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३१६ हर्षचरितम् क्षुब्धकर्षणनिष्ठ्यूतधूमलेखो निर्वीरोर्वीकरणाय विमुक्तशिख इव लिलेख मणिकुट्टिममितरः पादपद्मः । दर्पस्फुटितसरसव्रणोच्छलितरुधिरच्छटाव- सेकैः शोकविषप्रसुप्तं प्रबोधयन्निव पराक्रममनुजमवादीत्—'आयुष्मन् ! इदं राजकुलम्, अमी बान्धवाः, परिजनोऽयम्, इयं भूमिः, भूपतिभुज- परिघपालिताश्चैताः प्रजाः, गतोऽहमद्यैव मालवराजकुलप्रलयाय । इदमेव तावद्वल्कलग्रहणमिदमेव तपः शोकापगमोपायश्चायमेव यदत्यन्ताविनीता- रिनिग्रहः । सोऽयं कुरङ्गकैः कचग्रहः केसरिणः, भेकैः करपातः कालस- र्पस्य, वत्सकैर्बन्दिग्रहो व्याघ्रस्य, अलगर्देर्गलग्रहो गरुडस्य, दारुभिर्दाहा- देशो दहनस्य, तिमिरैस्तिरस्कारो रवेः, यो मौरवराणां मालवैः परिभवः पुष्यभूतिवंशस्य । अन्तरितस्तापो मे महीयसा मन्युना । तिष्ठन्तु सर्वे एव राजानः करिणश्च त्वयैव सार्धम् । अयमेको भण्डिरयुतमात्रेण तुरङ्ग- माणामनुयातु माम् ।' इत्यभिधाय चानन्तरमेव प्रयाणपटहमादिदेश । कम्पते स्वेदवांश्च भवति । दिष्टमानन्दः । विमुक्तेति । धीराः किल रोषेण केशसंयम- नमाऽरातिपरिभवप्रतीकारं न कुर्वंते । भेको मण्डूकः । करपातश्चपेटादानम् । अलगर्दैर्जलसर्पैः । मानों उत्पन्न अहंकार के कारण बायें ऊरुदण्ड पर उत्तान होकर चढ़ गया । बायें पैर के अंगूठे को कस के दबा कर रगड़ने से मानों पृथिवी को वीरविहीन करने के लिए धूम- शिखा उत्पन्न करता हुआ मणिकुट्टिम को कुरेदने लगा । शोक के कारण विष से मूर्च्छित होकर पड़े हुए अपने पराक्रम को मानों दर्प के स्फोट से उत्पन्न उछाल मारते हुए रुधिर के छींटे डाल कर जगाते हुए छोटे भाई हर्ष से बोल उठे—'आयुष्मन्, यह राजकुल है, ये भाई-बन्धु हैं, ये परिजन हैं, यह पृथिवी है, महाराज के भुजदण्ड से पालित ये प्रजाएँ हैं, इन्हें सम्हालो, अब मैं मालवराज के वंश का नाश करने के लिए आज ही चला । मेरे लिए यही वल्कल का धारण और यही तप है और यही शोक को दूर करने का उपाय भी है कि अत्यन्त अविनीत इस शत्रु का दमन करूँ । हिरन शेर की मूंछ मरोड़ना चाहता है, मेढ़क काले सांप को तमाचा लगाना चाहता है, बछड़ा बाघ को बंदी बनाना चाहता है, डोडबा सांप गरुड़ की गर्दन टीपना चाहता है, ईंधन स्वयं अग्नि को जलाना चाहता है, अन्धकार सूर्य का तिरस्कार करना चाहता है—यह जो मालवों ने पुष्यभूति- वंश का अपमान किया है । इस महान् क्रोध के कारण अब मेरा ताप मिट गया है । समस्त राजगण और हाथी तुम्हारे साथ ही रहें । अकेला यह भंडी दश हजार घोड़ों