भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 364

षष्ठ उच्छ्वासः ३१७ तं च तथा समादिशन्तमाकर्ण्य जामिजामातृवृत्तान्तविज्ञानप्रकोपा- धानदूयमाने मनसि निर्वर्तनादेशेन दूरप्ररूढप्रणयपीड इव प्रोवाच देवो हर्षः—‘कमिव हि दोषं पश्यत्यार्यो ममानुगमनेन ? यदि बाल इति नितरां तर्हि न परित्याज्योऽस्मि । रक्षणीय इति भवद्भुजपञ्जरो रक्षास्था- नम्, अशक्त इति क परीक्षितोऽस्मि, संवर्धनोय इति वियोगस्तनूकरोति, अक्लेशसह इति स्त्रीपक्षे निक्षिप्तोऽस्मि, सुखमनुभवत्विति त्वयैव सह तत्प्रयाति, महानध्वनः क्लेश इति विरहाग्निरविषह्यतरः, कलत्रं रक्षत्विति श्रीस्ते निस्त्रिंशेऽधिवसति, पृष्ठतः शून्यमिति तिष्ठत्येव प्रतापः, राजकमन- धिप्रितमिति तत्सुबद्धमार्यगुणैः, न बाह्यः सहायो महत इति व्यतिरिक्त- मेव मां गणयति, प्रलघुपारकरः प्रयामीति पादरजसि कोऽतिभारः, द्वयो- र्गमनमसांप्रतमिति मामनुगृहाण गमनाज्ञया, कातरो भ्रातृस्नेह इति जामिर्भगिनी । न बाह्य इति । किल य एव त्वं स एवाहमिति । कोऽसौ सहायो- ऽस्य । आत्मंभरिता स्वार्थमात्रपरता । की सेना लेकर मेरे साथ चलेगा।' यह कह कर उन्होंने तुरत ही कूच का डंका बजाने का हुक्म दिया । इस प्रकार राज्यवर्धन के आदेश को सुन कर बहन और बहनोई के वृत्तान्त से प्रचण्ड प्रकोप द्वारा आविष्ट, अपने रुक जाने के आदेश से बढ़ी हुई प्रणय की पीड़ा से मानो युक्त देव हर्ष ने कहा—'मेरे अनुगमन से आर्य कौन-सा दोष देखते हैं ? यदि मैं नाबालिग हूँ तो मैं परित्याग के योग्य नहीं । यदि रक्षणीय हूँ तो आर्य का भुजपंजर ही मेरी रक्षा का स्थान है । यदि मुझे असमर्थ कहें तो आर्य ने मेरी कहाँ परीक्षा ली ? संवर्धन के योग्य हूँ तो आपका वियोग मुझे क्षीण कर डालता है। क्लेश को सह नहीं पाता हूँ तो यह कह कर मुझे स्त्रियों की श्रेणी में रख रहे हैं। 'सुख से रहो' यह यदि आपकी आज्ञा है तो मेरा सुख आप ही के साथ जाने के लिए तत्पर है । 'मार्ग का कष्ट महान् है' यह कहें तो आपके विरह की अग्नि ही मेरे लिए असह्य है । 'स्त्रियों की रक्षा करो' यह कहें तो आपके ही खड्ग् में वह श्री निवास करती है जिससे उनकी रक्षा हो । 'पीछे कुछ नहीं' यह कहें तो आप का प्रताप पीछे-पीछे है ही । 'राजसमूह नायकहीन है' यह कहें तो आर्य के गुणों से ही वह अपने अधीन बना रहेगा । 'वीरों का सहायक कोई बाहरी नहीं होता' यदि यह कहें तो आप मुझे अलग समझ रहे हैं। 'कुछ थोड़े से ही लोगों को साथ लेकर जा रहा हूँ' अगर यह बात है तो पैर की धूल का क्या बोझ है ? 'दो भाइयों का साथ जाना ठीक नहीं' तो मुझे ही जाने की आज्ञा देकर अनुगृहीत करें । 'भाई