भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 365

३१८ हर्षचरितम् सहशो दोषः । का चेयमात्मंभरिता भुजस्य ते यदेकाकी क्षीरोदफेनपट- लपाण्डुरममृतमिव यशः पिपासति । अवञ्चितपूर्वोऽस्मि प्रसादेषु । तत्प्रसीदत्वार्यो नयतु मामपि' इत्यभिधाय क्षितितलविनिहितमौलिः पादयोरपतत् । तमुत्थाप्य पुनरग्रजो जगाद—'तात ! किमेवमतिमहारम्भपरिग्रहेण गरिमाणमारोप्यते बलादतिलघीयानप्यहितः । हरिणार्थमतिहेपणः सिंह- संभारः । तृणानामुपरि कति कवचयन्त्याशुशुक्षणयः । अपि च तवाष्टा- दशद्वीपराष्ट्रमङ्गलकमालिनी मेदिन्यस्त्येव विक्रमस्य विषयः । नहि कुल- शैलनिवहवाहिनो वायवः संनह्यन्त्यतितरले तूलराशौ । न सुमेरुवप्रप्रणय- प्रगल्भा वा दिक्करिणः परिणमन्त्यणीयसि वल्मीके । ग्रहीष्यसि सकल- पृथ्वीपतिप्रलयोत्पातमहाधूमकेतुं मांधातेव चारुचामीकरपङ्कपत्रलतालं- काराङ्ककायं कार्मुकं ककुभां विजये । मम तु दुर्निवारायामस्यां विपक्ष- क्षपणक्षुधि क्षुभितायां क्षम्यतामयमेकाकिनः कोपकवल एकः । तिष्ठतु अतिहेपणोऽत्यन्तलज्जाकारी । कवचयन्ति संनह्यन्ति । आशुशुक्षणयोऽग्नयः । अष्टमङ्गलं कङ्कणमित्यन्ये । तूलं कार्पासः । परिणमन्ति तटाघातक्रीडां न कुर्वन्ति । का स्नेह भय उत्पन्न कर रहा है' यह तो हम दोनों के लिए बराबर है। आपके भुजदण्ड की यह कौन सी स्वार्थपरता है जो अकेले ही क्षीरसमुद्र के फेनपटल के समान उज्ज्वल अमृत रूप यश को पी जाना चाहता है। पहले कभी भी आपने अपने प्रसाद से मुझे वञ्चित नहीं किया। अतः आर्य प्रसन्न हों और मुझे भी साथ ले चलें।' यह कहकर पृथिवी पर सिर टेकते हुए उनके चरणों पर गिर गए । बड़े भाई ने उनको उठाकर फिर कहा—'तात, इस प्रकार बहुत बड़ी तैयारी करके बल की दृष्टि से अत्यन्त हीन उस शत्रु को बड़ाई क्यों दे रहे हो ? हिरन मारने के लिए शेरों का झुण्ड ले जाना लज्जास्पद है। तिनकों को जलाने के लिए कितनी अग्नियों कवच धारण करेंगी। और फिर, तुम्हारे पराक्रम के लिए अठारह द्विपों की अष्टमङ्गलक माला पहनने वाली पृथिवी उपयुक्त विषय है। कुलपर्वतों को उड़ा ले जाने वाले मारुत थोड़ी सी रूई की ढेर में कमर नहीं कसते । सुमेरु से टक्कर लेने वाले दिग्गज कभी बाम्बी से नहीं भिड़ते । मान्धाता के समान दिशाओं की विजय में समस्त राजाओं के विनाश के लिये उत्पात की सम्भावना करने वाला धूमकेतु रूप और सुवर्ण की पत्रलताओं से रचित धनुष अपने हाथ से पकड़ोगे । शत्रु के विनाश को तड़फड़ा देने वाले अकेले मेरी दुर्निवार