भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

षष्ठ उच्छ्वासः ३१६ भवान्।' इत्यभिधाय च तस्मिन्नेव वासरे निर्जगामाभ्यमित्रम् । अथ तथागते भ्रातरि, उपरते च पितरि, प्रोषितजीविते च जामातरि, मृतायां च मातरि, संयतायां च स्वसरि, स्वयूथभ्रष्ट इव वन्यः करी देवो हर्षः कथं कथमप्येकाकी कालं तमनेषीत् । अतिक्रान्तेषु बहुषु वासरेषु कदाचित्तयैव भ्रातृगमनदुःखासिकाया दत्तप्रजागरस्त्रिभागशेषायां त्रिया- मायां यामिकेन गीयमानामिमामार्यां शुश्राव— द्वीपोपगीतगुणमपि समुपार्जितरत्नराशिसारमपि । पोतं पवन इव विधिः पुरुषमकाण्डे निपातयति ॥ ३ ॥ तां च श्रुत्वा सुतरामनित्यताभावनया दूयमानहृदयः प्रक्षीणभूयिष्ठायां क्षपायां क्षणमिव निद्रामलभत । स्वप्ने चाभ्रंलिहं लोहस्तम्भं भज्यमान- मपश्यत् । उत्कम्पमानहृदयश्च पुनः प्रत्यबुध्यत । अचिन्तयच्च—'किं नु खलु मामेवममी सततमनुबध्नन्ति दुःस्वप्नाः । स्फुरति च दिवानिश- अणीयस्यतिस्वल्पे । वल्मीके पिपीलिकोत्खाते मृत्स्थले । अभ्यमित्रं शत्रुसंमुखम् । यामिकेन जागरणियुक्तेन । रत्नराशीर्मणिसमूहः, अधिध्यक्ष । तस्य साराः श्रेष्ठरत्नानि । पोतं यानपात्रम् । निपातयति व्यापादयति । अत्युन्नतमभ्रंलिहं इस भूल में क्रोध के केवल एक ग्रास के लिए क्षमा करो, रुक जाओ ।' यह कहकर राज्यवर्धन उसी दिन शत्रु की ओर निकल पड़े । इस प्रकार भाई चले गये, पिताजी की मृत्यु हो गई, बहनोई ग्रहवर्मा भी न बच रहे, माता मृत्यु को प्राप्त हुई, बहन कैद में पड़ गई तो देव हर्ष ने अपने यूथ से भटके हुए बनैले गज की भाँति किसी किसी प्रकार वह समय व्यतीत किया । बहुत दिनों के बाद किसी समय भाई के चले जाने के दुःख की चिन्ता में मग्न होकर जगे-जगे उन्होंने रात के तीसरे पहर में पहरुवे द्वारा गाई हुई इस आर्या को सुना— 'सारे द्वीपों में जिसके गुणों की प्रशंसा होतो है, रत्नसमूह का जो उपार्जन कर लेता है ऐसे पुरुष को विधि असमय में उस प्रकार पटक देता है जैसे वायु जहाज को ।' यह सुनकर उनका हृदय अनित्यता की भावना से दुखी होने लगा । अभी रात कुछ बच रही थी कि क्षण भर उन्हें नींद आ गई । स्वप्न में बहुत लम्बे एक लौहस्तम्भ को टूटते हुए देखा । उनका हृदय काँपने लगा और फिर नींद टूट गई—'क्यों ये दुःस्वप्न हमेशा मेरे ही पीछे लगे हैं ! अशुभ की सूचना देने वाली मेरी बायीं आँख दिन-रात फरकती रहती है । किसी बड़े राजा के नाश को सूचित करने वाले ये दारुण उत्पात