भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

३२० हर्षचरितम्

मकल्याणाख्यानविचक्षणमदक्षिणमक्षि। सुदारुणाश्चाक्षुद्रक्षितिपक्षयमाच- क्षाणाः क्षणमपि न शाम्यन्ति पुनरुत्पाताः। प्रत्यहं राहुरविकलकायबन्ध इव कबन्धवति ब्रध्नबिम्बे घटमानो विभाव्यते। तपःकरणकालकवलि- तानिव धूसरितसमग्रग्रहानुद्विरन्ति धूमोद्गारान्सप्तर्षयः। दिने दिने दारुणा दिशां दाहा दृश्यन्ते। दिग्दाहभस्मकणनिकर इव निपतति नभस्तलात्तारागणः। तारापातशुचेव निष्प्रभः शशी। निशि निशि इतस्ततः प्रज्वलिताभिरुल्काभिरुग्रं ग्रहयुद्धमिव वियति विलोकयन्ति विलोलतारकाः ककुभः। राज्यसंचारसूचकः संचारयतीव क्ष्मां क्वापि वहद्बहलरजःपटलकलिलशर्कराशकलसूत्कारी मारुतः। न कुशलमिव पश्यामि लग्नस्य। अस्मिन्नसमद्वंशे करीण इव करीरं कोमलमपि कलयतः कृतान्तस्य कः परिपन्थी ? सर्वथा स्वस्ति भवत्वार्याय।' इति चिन्त- यित्वा च अन्तर्भिन्नं भ्रातृस्नेहकातरं द्रवदिव हृदयं कथं कथमपि संस्त- भ्योत्थाय यथाक्रियमाणं क्रियाकलापमकरोत्।


नभःस्पृशम्। अक्षुद्रः प्रधानभूतः। राहोरविकलकायबन्धनं कबन्धयोगात्। कव- न्धदर्शनं चोत्पातसूचकम्। विलोलतारका इति। स्त्रीणां च, युद्धदर्शनवशादक्ष्णोश्च लोलत्वं भवति। कलिलानि व्याप्तानि। वंशो वेणुरपि। करीरो वंशाङ्कुरः। अपिशब्दः कृतान्तस्येत्यतः परं योज्यः। परिपन्थी रोधकः। परिपूर्व्यपर्यायः परि- पन्थशब्दोऽस्तीति ज्ञापितम्।


अब भी शान्त नहीं हो रहे हैं। प्रतिदिन सूर्य में कबन्ध दिखाई पड़ता है। सशरीर के समान होकर राहु सूर्य पर झपटता हुआ लगता है। सप्तर्षि तारे तपस्या करने के अवसर में किए धूम्रपान को अब मुँह से उगलते हैं जिससे आकाश के समस्त तारे धुँधले लग रहे हैं। प्रतिदिन दारुण दिग्दाह दिखाई पड़ते हैं। दिग्दाहों के भस्मकण के रूप में तारे आकाश से गिरते नजर आते हैं। तारों के गिरने के मानों शोक से चन्द्रमा निष्प्रभ लगता है। प्रत्येक रात में उग्र रूप में इधर-उधर उल्कायें जलती रहती हैं, चञ्चल तारों वाली दिशाएँ आकाश में मानों ग्रहयुद्ध देखा करती हैं। धूल और आँकड़-पाथर से भरा हुआ, साँय-साँय की ध्वनि से युक्त एवं राज्य के विलयन की सूचना देने वाला पवन पृथिवी को मानों कहीं उड़ाकर ले जाने की कोशिश करता है। शुभ लग्न को भी उपस्थित नहीं देखता हूँ। हाथी के लिये जैसे कोमल बाँस का कौपल होता है उसी प्रकार हमारे इस वंश में यमराज का अब कौन शत्रु है। सब प्रकार से आर्य का कल्याण हो।' यह सोच