हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 368, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ उच्छ्वासः ३२१ आस्थानगतश्च सहसैव प्रविशन्तम्, अनुप्रविशता विषण्णवदनेन लोकेनानुगम्यमानम्, असह्यदुःखोष्णनिःश्वासधूमरक्ततन्तुनेव मलिनेन पटेन प्रावृतवपुषम्, जीवितधारणलज्जयेवावनतमुखम्, नासावंशस्याग्रे ग्रथितदृष्टिम्, दुःखदूरप्ररूढरोम्णा मूकेनापि मुखेन स्वामिव्यसनमवि- च्छिन्नैरश्रुबिन्दुभिर्विज्ञापयन्तं कुन्तलं नाम बृहदश्ववारम्, राज्यवर्धनस्य प्रसादभूमिमभिज्ञाततमं ददर्श। दृष्ट्वा च जाताशङ्कश्चक्षुषि सलिलेन, मुख- शशिनि श्वसितेन, हृदये हुताशनेन, उत्सङ्गे भुवा, दारुणाप्रियश्रवणसमये सममिव सर्वेष्वङ्गेष्वगृह्यत लोकपालैः। तस्माच्च हेलानिर्जितमालवानीक- मपि गौडाधिपेन मिथ्योपचारोपचितविश्वासं मुक्तशस्त्रमेकाकिनं विश्रब्धं स्वभवन एव भ्रातरं व्यापादितमश्रौषीत्। श्रुत्वा च महातेजस्वी प्रचण्डकोपावकप्रसरपरिचीयमानशोकावेगः सहसैव प्रजज्वाल। ततश्चामर्षविधुतशिरःशीर्यमाणशिखामणिशकलाङ्गार- अप्रियंने। अप्रियग्रहणकाले च दुःखं सर्वाङ्गेषु गृह्यते। तत इत्यादौ। परां भीषणतामयामीदिति संबन्धः। कर भाई के स्नेह से कातर हो मानों द्रवीभूत होते हुए अपने हृदय को किसी प्रकार रोककर हर्ष ने अपने नित्य कार्य किए। आस्थानमण्डप में पहुँचते ही उन्होंने राज्यवर्धन का प्रसाद-पात्र और अपने भी अति परिचित कुन्तल नामक प्रधान सवार को प्रवेश करते हुए देखा। उसके पीछे पीछे विषाद से मरे लोग प्रवेश कर रहे थे। उसके शरीर का वस्त्र मलिन हो गया था मानों असह्य दुःख के कारण निकला हुआ उष्ण निःश्वास का धुँवा लग गया था। प्राण धारण की लज्जा से मानों वह मुँह नीचा किए था। नाक के अग्रभाग में उसकी दृष्टि लगी हुई थी। दुःख के कारण रोमाञ्च से भरे हुए उसके मुख से आवाज नहीं निकल रही थी, फिर भी अपने स्वामी के आकस्मिक व्यसन को बेरोक-टोक ढलते हुए आँसुओं से सूचित कर रहा था। उसे देखकर वे शंकित हो गये, तभी उनको आँख में जल (जल देवता वरुण), मुख में श्वास (वायु देवता), हृदय में अग्नि (अग्नि देवता), उत्सङ्ग में पृथिवी (भूदेवता), आदि लोकपाल देवताओं ने दुसह अप्रिय समाचार के सुनने के अवसर में उन्हें मिलकर सम्हाल लिया। उसने खबर दी कि राज्यवर्धन ने मालव की सेना को खेल ही खेल में जीत लिया था, किन्तु गौड़ाधिपति की दिखावटी आवभगत का विश्वास करके वह अकेला शस्त्रहीन दशा में अपने ही भवन में मारा गया। यह सुनते ही महातेजस्वी हर्ष का शोकावेग प्रचण्ड कोपाग्नि के धधकने से और भी बढ़ गया और वे सहसा प्रज्वलित हो उठे। क्रोध से काँपते हुए उनके मस्तक की २१ ह० च०