हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ हर्षचरितम् किताङ्कमिव रोषाग्निमुद्वमन्ननवरतस्फुरितेन पिबन्निव सर्वतेजस्विनामा- यूंषि, रोषनिर्भुग्नेन दशनच्छदेन लोहितायमानलोचनालोकविक्षेपैर्दिग्दा- हानिव दर्शयन्, रोषानलेनाप्यसह्यसहजशौर्योष्मदहनदह्यमानेनेव वित- न्यमानस्वेदसलिलशीकरासारदुर्दिनः, स्वावयवैरप्यदृष्टपूर्वप्रकोपभीतैरिव कम्पमानैरुपेतः, हर इव कृतभैरवाकारः, हरिरिव प्रकटितनरसिंहरूपः, सूर्यकान्तशैल इवापरतेजःप्रसरदर्शनप्रज्वलितः, क्षयदिवस इवोदितद्वादश- दिनकरदुर्निरीक्ष्यमूर्तिः, महोत्पातमरुत इव सकलभूभृत्प्रकम्पकारी, विन्ध्य इव वर्धमानविग्रहोत्सेधः, महाशीविष इव दुर्नरेन्द्राभिभवरोषितः, निर्भुग्नेन वक्रीकृतेन । दह्यमानेनेति । दाहभीतेन च सलिलकणा वितन्यन्ते । भैरवो भीषणोऽपि । प्रशस्तो नरो नरसिंहः । इत्थं च—'स्युरुत्तरपदे व्याघ्रपुंगवर्षभ- कुंजराः । सिंहशार्दूलनागाद्याः पुंसि श्रेष्ठार्थवाचकाः ॥' इति । नृसिंहरूपी च हरिरिति । तेजो क्षमता, आतपश्च, दिनकरवत्तैश्च दुर्निरीक्षणः । भूभृतो राजानोऽ- पि, गिरयश्च । वर्धमानेन देहेन उत्सेध औन्नत्यं यस्य । नरेन्द्रो मन्त्रज्ञः, राजापि । परीक्षिति दग्धे जनमेजयः पितृपरिभवेन सर्पसत्रे भोगिनां क्षयार्थं ययाजेति वार्ता । शिखामणियाँ टुकड़े-टुकड़े होकर अङ्गार के रूप में छटकने लगीं, मानों वे रोष की अग्नि को उगल रहे हों । उनके ओठ इस तरह लगातार फड़फड़ा रहे थे मानों समस्त तेजस्वियों की आयु पी रहे हों । रोष के कारण ओठ कट जाने से आँखों की किरणें लाल होकर फैल रही थीं मानों दिग्दाह के दृश्य उत्पन्न कर रहे हों । उनके अपने क्रोधानल से भी कहीं अधिक ताप वाला स्वाभाविक शौर्य इस प्रकार उद्दीप्त हो उठा कि उनके शरीर से स्वेद जल की वर्षा होने लगी । मानों उनके अपने ही अङ्गों ने पहले कभी ऐसा कोप नहीं देखा था इसलिए काँपने लगे । उनकी आकृति शिव के समान भैरव (भीषण) हो गई । विष्णु के समान उन्होंने नरसिंह का रूप धारण कर लिया । सूर्यकान्त मणि के पर्वत के समान दूसरे का तेज देखते ही प्रज्वलित हो उठे । महोत्पात के समय पर्वतों को कम्पित करने वाले वायु के समान समस्त राजाओं को उन्होंने कँपा दिया । विन्ध्यपर्वत के समान उनका विग्रहमद बढ़ने लगा (विन्ध्य का विग्रह अर्थात् शरीर बढ़ा था) । दुष्ट सपेरे (नरेन्द्र) द्वारा कोपित महासर्प के समान दुष्ट राजा के द्वारा किए गए अपने अभिभव से कुपित थे । परीक्षित राजा के पुत्र जनमेजय के समान समस्त भोगियों (धनवानों, सर्पों) को जला डालने के लिये तैयार हो गए । भीम के समान शत्रु के खून के प्यासे हो गये । शत्रुहाथी को देखकर दौड़ पड़ने वाले ऐरावत के समान शत्रु के