भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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षष्ठ उच्छ्वासः ३२३ पारीक्षित इव सर्वभोगिदहनोद्यतः, वृकोदर इव रिपुरुधिरतृषितः, सुरगज इव प्रतिपक्षवारणप्रधावितः, पूर्वागम इव पौरुषस्य, उन्माद इव मदस्य, आवेग इत्रावलेपस्य, तारुण्यावतार इव तेजसः, सर्वोद्योग इव दर्पस्य, युगागम इव यौवनोष्मणः, राज्याभिषेक इव रणरसस्य, नीराजनदिवस इवासहिष्णुतायाः परां भीषणतामयासीत् । अवादीच्च गौडाधिपाधममपहाय कस्तादृशं महापुरुषं तत्क्षण एव निर्व्याजभुजवीर्येनिर्जितसमस्तराजकं मुक्तशस्त्रं कलशयोनिमिव कृष्णव- र्मप्रसूतिरीदृशेन सर्ववीरलोकविगर्हितेन मृत्युना शमयेद्देवमार्यम् । अनार्यं च तं मुक्त्वा भागीरथीफेनपटलपाण्डुराः केषां मनःसु सरःसु राजहंसा इव परशुरामपराक्रमस्मृतिकृतो न कुर्युरायंशौर्यगुणाः पक्षपातम् । कथ- मिवात्युग्रस्यास्यार्यजीवितहरणे निदाघखेरिव कमलाकरसलिलशोषणेऽ- भोगिनो राजानः । वृकोदरो भीमसेनः । वारणं निषेधः, हस्ती च वारणः । अव- लेपस्य दर्पस्य । नीराजनं शान्तिकर्मविशेषः । कलशयोनिं द्रोणाचार्यम् । कृष्णवर्त्मप्रसूतिः पापमार्गप्रवर्तकः । धृष्टद्युम्नश्चा- भिजातः, कृष्णवर्त्मा वह्निः । भागीरथीत्यादि परशुराम इत्यादि च हंसानामपि विशेषणम् । रामेण हि हंसमार्गः कैलासे कृत इति हंसास्तत्कीर्ति स्मारयन्ति । पक्षपातं स्नेहम्, पक्षैर्गमनं च । अत्युग्रस्यातिक्रूरस्य, अतिचण्डस्य च । अत्रार्यस्य विनाश के लिये चल पड़े । मानो पराक्रम इस रूप में पहली बार उपस्थित हुआ । मद के उन्माद के समान, अवलेप के आवेग के समान, तेज के चढ़ते हुए यौवन के समान, दर्प के समस्त उद्योग के समान, यौवन ताप के युगागम के समान, युद्ध रस के राज्याभिषेक के समान, असहनशीलता के नीराजन के समान वे अत्यन्त भयङ्कर हो गये । वे बोले—'गौड़ाधिपति को छोड़कर कौन है जो बिना किसी छल-कपट के समस्त राजाओं को पराजित करने वाले वैसे महापुरुष को शस्त्रहीन अवस्था में ऐसी मृत्यु से मारे जिसे वीर लोग निन्दा की दृष्टि से देखते हैं । जिस प्रकार धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य को शस्त्रहीन देखकर मार डाला था । उस अनार्य को छोड़कर गंगा के फेनपटल के समान उज्ज्वल और परशुराम के पराक्रम की स्मृति उत्पन्न करने वाले आर्य के शौर्यगुण सरोवर में राज-हंसो के समान किसके मन में पक्षपात नहीं करते ? जैसे ग्रीष्मकाल में प्रखर तेज वाले सूर्य की किरणें सरोवर का जल सोख लेती हैं उसी प्रकार अत्यन्त उग्र स्वभाव वाले उस गौडाधिप की प्रीति की बिलकुल अपेक्षा न रखने वाले हाथ आर्य के प्राण हरने के लिये कैसे फैल गए ? उसकी क्या गति होगी ? किस योनि में प्रवेश