भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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३२४ हर्षचरितम्

नपेक्षितप्रीतयः प्रसृताः कराः । कां तु गतिं गमिष्यति, कां वा योनिं प्रवे- द्यति, कस्मिन्वा नरके निपत्तिष्यति । श्वपाकोऽपि क इदमाचरेत् । नामापि च गृह्णतोऽस्य पापकारिणः पापमलेन लिप्यत इव मे जिह्वा । किं वाङ्गीकृत्य कार्यमार्यस्तेन क्षुद्रेणानुप्रविश्य विगतघृणेन घुणेनेव सक- लभुवनाह्लादनचतुरश्चन्दनस्तम्भः क्षयमुपनीतः । नूनं नानेन मूढेन मधु- रसास्वादलुब्धेन मध्विवार्यजीवितमाकर्षता भावी दृष्टः शिलीमुखसंपातो- पद्व्रवः । निजगृहदूषणं जालमार्गप्रदीपकेन कज्जलमिवातिमलिनं केवल- मयशः संचितं गौडाधमेन । नत्वाश्वेवास्तमुपगतवत्यपि त्रिभुवनचूडामणौ सवितरि वेधसादिष्टः सत्पथशत्रोरन्धकारस्य निग्रहाय ग्रहषण्डविहारैक- हरिणाधिपः शशी । विनयविधायिनि भग्नेऽपि चाङ्कुशे विद्यत एव व्याल- वारणस्य विनयाय सकलमत्तमातङ्गकुम्भस्थलस्थिरशिरोभागभिदुरः खर- कमलाकरेणोपमा । लक्ष्म्यायानादिगुणयुक्तत्वात् । करा हस्ताः, रश्मयश्च । क्षुद्रेण क्रूरेण, परिचितपरिपणेन च । अनुप्रविश्य विश्वासं नीत्वान्तर्भूय च । घुणेन काष्ठ- कृमिणा । शिलीमुखाः शराः, भ्रमराश्च । जालस्य कुसृतेर्मार्गं दीपयति यस्तेन गवाक्षमार्गेण यः प्रदीपः स यथा कजलं संचिनुते नत्वाशु इत्यप्रस्तुतप्रशंसा बोद्धव्या । विशेषेण हरणं विहारो, विच्छायीकरणं गमनं च । षण्डे हि सिंहो गमनं करोति । व्यालवारणस्य दुष्टदन्तिनः । स्थिरो दृढः शिरोभागो यस्य । यं प्राप्तवैव करेगा ? या किस नरक में गिरेगा ? चाण्डाल भी कौन है जो ऐसा करे ? उस पापी के नाम लेने से भी मेरी जिह्वा में पाप जैसे लिपट जाता है । क्या सोचकर उसने ऐसा किया ? जैसे छोटा सा घुन प्रवेश करके चन्दन के स्तम्भ को समाप्त कर डालता है उसी प्रकार उस घृणाहीन क्षुद्र ने सारे जगत् को आह्लादित करने वाले आर्य को उनके भवन में प्रवेश करके मार डाला । निश्चय ही मधुरस के चखने के लोलुप उस मूर्ख ने मधु के समान आर्य के प्राणों को चूसते हुए यह नहीं सोचा कि शिलीमुख ( बाण या भौंरे ) मुझ पर टूट पड़ेंगे । जैसे किसी झरोखे में रखा हुआ दीपक कालिख से घर को दूषित कर देता है उसी प्रकार अपने ही दोष के रूप में उस गौड़ाधम ने अत्यन्त मलिन अपने अयश को केवल सञ्चित किया । इस प्रकार शीघ्र त्रिभुवन के चूड़ामणि सूर्य ( राज्यवर्धन ) के अस्त हो जाने पर क्या विधाता ने सन्मार्ग के शत्रु अन्धकार ( गौड़ाधिप ) के निग्रह के लिये ग्रहों के वनखण्ड में विचरण करने वाले सिंह के रूप में चन्द्र ( हर्षवर्धन ) को आदेश नहीं दिया है ? दुष्ट हाथी को विनय की सीख देने वाले अङ्कुश के टूट जाने पर भी समस्त मतवाले हाथियों के कुम्भस्थल के भेदन में समर्थ और अत्यन्त तीक्ष्ण सिंह