हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ उच्छ्वासः ३२५ त्तरः केसरिनखरः । तादृशाः कुवैकटिका इव तेजस्विरत्नविनाशकाः कस्य न वध्याः । केदानीं यास्यति दुर्बुद्धिः ?' इत्येवमभिदधत एवास्य पितुरपि मित्रं सेनापतिः समग्रविग्रहप्राग्रहरो हरितालशैलावदातदेहः परिणतप्रगु- णसालप्रकाण्डप्रकाशः प्रांशुः, अतिशौर्योष्मणेव परिपाकमागतो गतभूयिष्ठे वयसि वर्तमानः, बहुशरशयनसुप्रोत्थितोऽपि हसन्निव शान्तनवमतिदी- र्घेणायुषा, दुरभिभवशरीरतया जरयापि भीतभीतयेव प्रकटितप्रकम्पया परामृष्टः कथमपि सारमयेषु शिरोरुहेषु शशिकरनिकरसितसरलशिरो- रुहसटालां सैंहीमिव निष्कपटपराक्रमरसरचितां संक्रान्तो जीवन्नेव जातिम्, अपरामपरस्वामिमुखदर्शनमहापातकपरिजहीर्षयैव भ्रूयुगलेन वलितशिथिलप्रलम्बचर्मणा स्थगितदृष्टिः, धवलस्थूलगुञ्जापिच्छप्रच्छा- दितकपोलभागभास्वरेण वमन्निव विक्रमकालमकालेऽपि विकाशिकाश- तस्य स्वयं विदारणं भवतीत्यर्थः । वैकटिको रत्नबन्धकः । इत्येवमादौ । सेनापतिः सिंहनादनामा संनिधावेव समुपविष्टो विज्ञापितवानिति संबन्धः । विग्रहाः संङ्ग्रामास्तेषु प्राग्रहरोऽग्रेसरः । प्रगुणं स्पष्टम् । काण्डं स्कन्धः । शान्तनवं भीष्मम् । वलयोऽस्य सन्ति वलिनम् । गुञ्जोत्तरोष्ठोपरि रोमराजिः । विक्रमकालमिति । शरदारम्भविशेषणम् । तत्र शत्रुपु जययात्रा विधेयेति । का नख तो विद्यमान ही है। उसी प्रकार से रत्न के निकृष्ट पारखो जो तेजस्वी रत्नों को नष्ट कर डालते हैं किसके वध्य नहीं ? वह दुर्बुद्धि गौड़ाधिप अब बच कर कहाँ जायगा ?" प्रभाकरवर्धन का मित्र सिंहनाद नाम का सेनापति पास में बैठा हुआ था । युद्ध के अवसरों में वह सबसे आगे रहने वाला था । हरिताल के समान उसकी देह उज्ज्वलवर्ण की और बढ़े हुए सालवृक्ष के समान लम्बी थी । शौर्य की अधिक गर्मी से मानों वह पक गया था, जिससे उसकी आयु का अधिक अंश बीत चुका था । मानों वह भी अनेक बाणों के बने हुये शयन पर सोकर उठा था और अपनी आयु से भीष्म को भी हँस रहा था । उसके कष्ट से अभिभव प्राप्त करने के कारण वृद्धावस्था भी डर कर मानों शरीर में कम्प उत्पन्न करती हुई उसका स्पर्श किए थी । चन्द्र की किरणों के समान सफेद और सीधे सादे एवं दृढ़ उसके बाल ऐसे प्रतीत होते थे कि मानों वह अपने निष्कपट पराक्रम रस के कारण जीते जी ही सिंह की जाति को प्राप्त कर चुका था । उसकी आँख पर चमड़ी शिथिल होकर इस प्रकार नीचे झूल रही थी कि भौंहों से उसकी आँखें ढँक गई थीं । उसके भीमाकृति मुख के सफेद गलगुच्छे गालों पर छाये हुए थे, मानों असमय में भी युद्ध के लिये उचित, फूले हुये काश वनों से उज्ज्वल शरत्काल के आरम्भ को उगल रहा