भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

काननविशदं शरदारम्भं भीमेन मुखेन, मृतमपि हृदयस्थितं स्वामिनमिव सितचामरेण वीजयन्नाभिलम्बेन कूर्चकलापेन, परिणामेऽपि धौतासिधा- राजलपानतृषितैरिव विवृतवदनैर्बृहद्भिर्व्रणविदारैर्विषमितविशालवक्षाः, नि- शितशस्त्रटङ्ककोटिकुट्टितबहुबृहद्वर्णाक्षरपङ्क्तिनिरन्तरतया च सकलसमर- विजयपर्वगणनाभिव कुर्वन्पूर्वपर्वत इव पादचारी, विविधवीररसवृत्तान्त- रामणीयेकन महाभारतर्माप लघयन्निव, प्रतिपक्षक्षपणातिनिबन्धेन पर- शुराममपि शिक्षयन्निव, अब्धिश्रमणेनानादरश्रीसमाकर्षणविभ्रमेण मन्दर- मपि मन्दयन्निव, वाहिनीनायकमर्यादानुवर्तनेनाम्भोधिमप्यभिभवन्निव, स्थैर्यकार्कश्योन्नतिभिरचलानपि हेपयन्निव, सहजप्रचण्डतेजःप्रसरपरि- स्फुरणेन सवितारमपि तृणीकुर्वन्निव, ईश्वरभारोद्वहनघृष्टपृष्ठतया हरवृष- कूर्चकलापः श्मश्रुः। परिणामे वृद्धत्वे । तृषितोऽपि जलं पातुं विवृतवदनो भवति । विदारैः स्फोटैः । शस्त्राण्येव टङ्काः छेदनभाण्डानि कुट्टितानि छिन्नानि । पूर्ववृत्तान्तः पूर्वप्रशस्तिः । अब्धिश्रमणं समुद्रयात्रा, जले परिवर्तनमपि । ताभ्योऽनादरेण यल्लक्ष्मीसमाकर्षणं तदर्थं यो विविधो भ्रमस्तेन । वाहिनी सेना, नदी च । स्थैर्य व्यवसायादचलनमपि। कार्कश्यं परविषयं निर्दयत्वमपि । उन्नतिरभिमानोऽपि । तेज उन्नतिः, क्षमा, घर्मश्च । ईश्वरो देवो हरोऽपि । कार्येषु क्षुण्णो लोकेषु धृष्टपृष्ठ हो। सफेद झालदार दाढ़ो नाभि तक इस प्रकार लटक रही थी मानों मरने पर भी हृदय में स्थित अपने स्वामी (प्रभाकर वर्धन) को उज्ज्वल चँवर से झल रहा हो। उसकी ऊबड़खाबड़ चौड़ी छाती पर मुँह बाये घावों के बड़े बड़े निशान इस प्रकार थे मानों वृद्धावस्था में भी तलवार के धाराजल के लिये तृषित हो रहे थे। उसके शरीर पर शस्त्र की तीक्ष्ण टाँकियों से व्रण राश्मियाँ टङ्कित थीं मानों समस्त युद्धों के विजय पर्व की गणना करता हो। उदयाचल के समान पृथिवी को चरणों से आक्रान्त करके बैठा था। वीररस के अनेक वृत्तान्तों के कारण महाभारत से भी बढ़कर वह रमणीय हो रहा था। शत्रुओं के संहार की प्रवृत्ति से वह परशुराम को भी मानों सीख दे रहा था। समुद्रभ्रमण के द्वारा श्री (लक्ष्मी या वैभव सम्पत्ति) को खींच लाने की अद्भुत सामर्थ्य से अपने सामने मन्दराचल को भी कम कर रहा था। वाहिनीनायक (सेनापति) की मर्यादा का अनुसरण करने से (वाहिनी नायक अर्थात् सरित्पति) समुद्र को भी अभिभूत कर रहा था। स्थिरता, कर्कशता और ऊँचाई से पर्वतों को भी लज्जित कर रहा था। स्वाभाविक प्रचण्ड तेजके स्फुरित होने से अपने सामने सूर्य को भी तृण के समान मान रहा था। पीठ पर स्वामी (ईश्वर) का बोझ ढोने से ईश्वर को भी हँस रहा था। क्रोधरूपी अग्नि की