भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 506 में से

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षष्ठ उच्छ्वासः ३२७ भमपि हसन्निव, अरणिरमर्षाग्नेः, ऐश्वर्यं शौर्यस्य, मदो मदस्य, विसर्पो दर्पस्य, हृदयं हठस्य, जीवितं जिगीषुतायाः, समुच्छ्वसितमुत्साहस्य, अङ्कुशो दुर्मदानाम्, नागदमनो दुष्टभोगिनाम्, विरामो वरमनुष्यतायाः, कुल- गुरुर्वीरगोष्ठीनाम्, तुला शौर्यशालिनाम्, सीमान्तदृश्वा शास्त्रग्रामस्य, निर्वोढा प्रौढवादानाम्, संस्तम्भयिता भग्नानाम्, पारगः प्रतिज्ञायाः, मर्मज्ञो महाविग्रहाणाम्, आघोषणापटहः समरार्थिनाम्, संनिधावेव समुपविष्टः सिंहनादनामा स्वरेणैव दुन्दुभिघोषगम्भीरेण सुभटानां सम- ररसमानयन्विज्ञापितवान्— 'देव ! न क्वचित्कृताश्रयया मलिनया मलिनतराः कोकिलया काका इव कापुरुषा हतलक्ष्म्या विप्रलभ्यमानमात्मानं न चेतयन्ते । श्रियो हि दोषा अन्धतादयः कामलाविकाराः । छत्रच्छायान्तरितरवयो विस्मर- उच्यते । नागदमनो गजमर्दनः, गरुडश्च । भोगिनो राजानः, सर्पाश्च । यथा आघोषणापटहः समरार्थिनामुत्साहं जनयति तथाऽसावपीत्यर्थः । देवेत्यादौ । कापुरुषाः हतलक्ष्म्या विप्रलभ्यमानं वञ्च्यमानमात्मानं न चेतयन्ते इति योजना । न क्वचित्कृताश्रयया सर्वत्र चाञ्चल्यात्कस्मान्तान्हतलक्ष्मीर्विप्रलभत इत्याह—श्रियो हि दोषा अन्धतादयः । कामलाविकारा इति । हि यस्माच्छ्रियो ये वह अरणि, शौर्य का ऐश्वर्य, मद का मद, दर्प का प्रसर, हठ का हृदय, विजय की इच्छा का जीवन, उत्साह का उच्छ्वसित, दुर्मदों का अंकुश, दुष्ट राजाओं का दमन करने वाला, श्रेष्ठ मनुष्यता का विराम, वीर गोष्ठियों का कुलगुरु, शौर्यशील लोगों की उपमा, शास्त्रों का पारदर्शी, उद्धत विवादों का समुचित उत्तर देने वाला, शत्रु के भय से भागने वालों को रोक रखने वाला, महासमरों का मर्मज्ञ, एवं युद्ध को चाहने वालों के लिए घोषणा पटह था । दुन्दुभि के घोष के समान गम्भीर आवाज में योद्धाओं के मन में युद्ध का कुतूहल उत्पन्न करते हुए उसने निवेदन किया । 'देव, कोयल के समान किसी स्थान पर स्थिर होकर न रहने वाली और मलिन दुष्ट लक्ष्मी के द्वारा प्रतारित होते हुए अपने आपको कौवे के समान मलिन प्रकृति के कायर पुरुष नहीं समझ पाते । कामला आदि आँखों के विकार के समान अन्धता आदि श्री के दोष हैं । छत्र की छाया में सूर्य को व्यवहित कर देने वाले मूढ़ लोग दूसरे तेजस्वी को बिल्कुल भूल जाते हैं। वह वराक गौड़ाधिप क्या करे ? अत्यन्त डरपोक स्वभाव के कारण हमेशा मुँह फेरे रहने वाले उसने सबको अभिभूत कर देने वाले शौर्यातिशय के

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