भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 506 में से

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३२८ हर्षचरितम् न्यन्यं तेजस्विनं जडधियः । किं वा करोतु वराकः येनातिभीरुतया नित्यपराङ्मुखेन नतु दृष्टान्येव सर्वातिशायिशौर्यातिशयश्वयथुकपिलक- पोलपुलकपल्लवितकोपानलानि कुपितानां तेजस्विनां मुखानि । नासौ तपस्वी जानात्येवं यथाभिचारा इव विप्रकृताः सद्यः सकलकुलप्रलयमुपा- हरन्ति मनस्विन इति । जलेऽपि ज्वलन्ति ताडितास्तेजस्विनः । सकल- वीरगोष्ठीबाह्यस्य तस्यैवेदमुचितमनुत्तारनिरयनिपातनिपुणं कर्म । मन- स्विनां हि प्रधनप्रधानधने धनुषि ध्रियमाणे सति च कमलाकलहंसी- केलिकुवलयकानने कृपाणे कृपणोपायाः पयोधिमथनप्रभृतयोऽपि श्रीसमु- त्थानस्य किं पुनरीदृशाः । येषां च धात्रा धरित्रीं त्रातुं नियुक्ताः स्वयमसम- र्था इव कुलिशकर्कशभुजपरिघप्रहरणहेतोरुद्विरन्ति गिरयोऽपि लोहानि ते कथमिव बाहुशालिनो मनसापि विमलयशोबान्धवा ध्यायेयुरकार्यम् । स- दोषा अन्धतादयो विकारास्ते हि कामलाः कमलसंबन्धिनः । कमलानां दोषायां रात्रौ अन्धता संकोचः । तन्निवासश्च लक्ष्म्या अपि । स विकारश्चान्यं विप्रलभते । रागादयस्तैरन्धतेवान्धता सत्कार्यानालोचनम् । अथ च पाण्डू रोगभेदः । तेन शङ्खादौ पीतत्वादिज्ञानं तद्विकाराश्च रात्र्यन्धतादयो दोषा भवन्ति । सर्वातिशायिना शौर्यातिशयेन श्वयथुर्यैषां तानि । ततो विशेषणसमासः । विप्रकृता उपद्रुताः । विप्रैर्द्विजैः कृताः । जले तेऽपि ताडिता आहता वैद्युताश्च तेजस्विनोऽग्नयोऽपि । गोष्ठी बाह्यश्च न जानाति धर्मं वृद्धासेवित्वात् । प्रधनं रणः । गिरयो लोहान्युद्गि- संवर्धन से लाल कपोलों पर रोमांच के रूप में उत्पन्न होते हुए कोपानल वाले कुपित तेजस्वी पुरुषों का मुख बिलकुल नहीं देखा है। वह बेचारा जानता ही नहीं कि मारण मन्त्र के समान मनस्वी पुरुष तिरस्कृत होने पर शीघ्र ही सारे वंश का उच्चाटन कर डालते हैं। तेजस्वी लोग बिजली के समान आघात पाकर जल में भी प्रज्वलित रहते हैं। वीर- गोष्ठियों से बाहर उसके लिए उद्धार न पाने वाले नरक में गिरा देने वाला यह कर्म उचित ही है। मनस्वी पुरुष के द्वारा युद्ध के लिए धनुष धारण किये जाने पर और उनके पास लक्ष्मी रूपी कलहंसी की क्रीडा के लिए कुवलयवनरूपी कृपाण के विद्यमान रहने पर श्री को प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन प्रभृति उपाय भी तुच्छ हो जाते हैं तो ऐसे उपायों की क्या गणना ? वज्र के समान कर्कश जिनकी बाहु द्वारा परिघ नामक अस्त्र के प्रहार के लिए विधाता की आज्ञा पाकर स्वयं असमर्थ होकर पर्वत लोहा उत्पन्न करते हैं ऐसे बाहु-वीर्यशाली और निर्मल यश के प्रेमी मन से भी कैसे किसी अकार्य का ध्यान कर

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